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बीमार-ज़रूरतमंद लोगों को अपने ऑटो से मुफ़्त में अस्पताल पहुंचता है यह ऑटो वाला!

सुनील अपने ऑटो में दिव्यांग और गरीब लोगों को 1.5 किलोमीटर तक मुफ़्त में सवारी देते हैं।

रूरी नहीं कि हर एक सुपर हीरो के पास अद्भुत शक्तियां ही हों। असल ज़िंदगी में लोग अपनी हिम्मत, जज़्बे और नेक कामों की वजह से सुपर हीरो बनते हैं। मुंबई में ऑटो चलाकर अपना निर्वाह कर रहे सुनील मिश्रा भी ऐसे ही सुपर हीरो हैं।

हमारे और आपके लिए भले ही वो एक साधारण ऑटो वाले हों जो कि अपनी रोज़ी-रोटी के लिए दिन रात मेहनत करते हैं। लेकिन जब भी किसी दुर्घटनाग्रस्त या बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए वे अपने ऑटो को मुफ़्त में एम्बुलेंस बना लेते हैं तो उन लोगों के लिए वे किसी मसीहा से कम नहीं।

मूल रूप से उत्तर-प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में एक छोटे-से गाँव के रहने वाले सुनील रोज़गार की तलाश में सालों पहले मुंबई आये थे और अंबुजवाड़ी स्लम में रहने लगे। नौवीं-दसवीं तक पढ़े सुनील ने किस्तों पर ऑटो-रिक्शा खरीदकर चलाना शुरू किया।

सुनील मिश्रा (साभार: यूट्यूब)

“ऑटो-रिक्शा चलाने से जो भी कमाई होती है, ज़्यादातर घर के खर्च और बच्चों की पढ़ाई में चला जाता है। हमारे ऊपर हमारे माता-पिता, दो भाई, और हमारे बीवी-बच्चों की ज़िम्मेदारी है। पहले तो घर वाले यहीं साथ रहते थे पर फिर  मुंबई जैसे शहर में इतने लोगों का खर्च कैसे चलता इसलिए सबको गाँव शिफ्ट कर दिया। बच्चे भी वहीं गाँव में पढ़ रहे हैं,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए सुनील ने बताया।

अपने जीवन में इतनी कठिनाइयाँ होने के बावजूद सुनील कभी भी किसी ज़रूरतमंद की मदद करने से पीछे नहीं हटते हैं। अंबुजवाड़ी स्लम में एम्बुलेंस या फिर बड़ी गाड़ियाँ आना सम्भव नहीं और ऐसे में, सुनील यह सुनिश्चित करते हैं कि यहाँ पर रहने वाले किसी भी इंसान को ज़रूरत के समय अस्पताल पहुँचने में देरी न हो।

सुनील बताते हैं कि वे अपने ऑटो को ऑटो-कम-एम्बुलेंस के जैसे इस्तेमाल करते हैं। इस स्लम में रहने वाले सभी लोग जैसे-तैसे अपना गुज़ारा कर रहे हैं। इसलिए बीमार होने पर या फिर कोई दुर्घटना होने पर, वे किसी प्राइवेट वाहन में अस्पताल तक जाने का खर्च नहीं उठा सकते। साथ ही, इस इलाके में एम्बुलेंस भी नहीं आती है। इसलिए सुनील बिना कोई पैसे लिए ज़रूरत पड़ने पर इन गरीब लोगों को तुरंत अस्पताल पहुंचाते हैं।

साभार: यूट्यूब

सुनील ने साल 2007 के बाद से यह काम शुरू किया। उन्होंने बताया कि एक बार गाँव में उनकी माँ भी दुर्घटनाग्रस्त हो गयी थीं। किस्मत से उन्हें उस वक़्त समय रहते मदद मिल गयी और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया। इस घटना ने सुनील को काफ़ी प्रभावित किया। उन्हें लगा कि अगर उस समय उनकी माँ की किसी ने मदद न की होती तो शायद परिणाम कुछ और होता।

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“बस उसी दिन से मैंने ठान लिया कि मुझसे जितना भी बन पड़ेगा मैं अपने स्तर पर मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करूँगा। इसलिए मैं सिर्फ़ अपने स्लम के लिए ही नहीं, बल्कि बाहर भी अगर किसी को ज़रूरत हो तो हमेशा मदद करने की कोशिश करता हूँ,” उन्होंने आगे बताया।

सिर्फ़ इतना ही नहीं, सुनील अपने ऑटो में दिव्यांग और गरीब लोगों को 1.5 किलोमीटर तक मुफ़्त में सवारी देते हैं। वे कहते हैं, “अगर मुझे कोई दिव्यांग व्यक्ति दिखता है रोड पर तो मैं उन्हें पूछ लेता हूँ कि अगर मैं उन्हें कहीं आस-पास छोड़ सकता हूँ या फिर कोई बहुत गरीब जो बहुत बार पैसे नहीं दे सकते तो उन्हें भी मैं उनकी मंजिल तक पहुंचने की कोशिश करता हूँ।”

एक साधारण-से ऑटो-ड्राईवर होकर भी सुनील इंसानियत के नाते समाज के लिए इतना कुछ कर रहे हैं। अपने इन नेक कार्यों के बदले वे किसी से अपने लिए कुछ भी नहीं चाहते। हां पर, उनकी इच्छा है कि देश में सामाजिक कार्यों से जुड़ी बड़ी संस्थाएं या फिर बड़े लोग, अगर ऐसे झुग्गी-झोपड़ियों के लिए एम्बुलेंस या फिर मेडिकल कैंप जैसी फल शुरू कर सकें तो बहुत बदलाव आ जायेगा।

“मुझे अपने लिए किसी से कुछ भी नहीं चाहिए। मेरे को भगवान ने इस काबिल बनाया है कि मैं मेहनत करके कमाकर अपना और अपनों का पेट भर सकता हूँ। लेकिन हम सबको मिलकर, थोड़ा-थोड़ा ही सही पर ऐसे लोगों के लिए कुछ करना चाहिए जिन्हें वाकई मदद की ज़रूरत है,” उन्होंने अंत में कहा।

बेशक, सुनील मिश्रा जैसे लोगों के चलते ही आज भी इंसानियत पर विश्वास कायम है। द बेटर इंडिया सुनील की सोच और जज़्बे को सलाम करता है।

यदि आपको यह कहानी पढ़कर प्रेरणा मिली है और आप किसी भी तरह से सुनील की मदद करना चाहते हैं तो आप उन्हें 8291434731 या 9702723627 पर फ़ोन कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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