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गाँव से 5 किमी दूर पैदल जाया करते थे पढ़ने, अब अमेरिका में बने नामी वैज्ञानिक!

”मैंने भारत सरकार से वादा किया है कि यदि हमारी तकनीक से बने खाद को सरकार लागत मूल्य से आधे पर किसान को उपलब्ध करवाती है तो हम तकनीक का लाइसेंस उनको बिना किसी शुल्क लिए प्रदान करने का प्रयास करेंगे।”

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डॉ . रमेश रलिया।

राजस्थान के जोधपुर जिले के भोपालगढ़ तहसील में एक छोटा सा गाँव है खारिया खंगार। इस गाँव के लोगों ने शायद ही कभी सोचा हो कि यहां के किसान का बेटा अमेरिका की वॉशिंगटन यूनि​वर्सिटी तक पहुंचेगा। लेकिन बेटे ने कर दिखाया। वह न सिर्फ वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी पहुंचा बल्कि वहां पर नैनो टैक्नोलॉजी में आज जाना पहचाना नाम भी है।

सफलता की यह कहानी डॉ. रमेश रलिया की है। किसान परिवार में जन्मे रलिया का बचपन एक आम भारतीय बच्चे की तरह ही गुजरा है। इनके पिता सुखराम रलिया एक किसान है और आज भी खेती-बाड़ी का काम करते हैं। रलिया 10वीं कक्षा तक गाँव के ही सरकारी माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने पैदल जाया करते थे जो उनके घर से करीब पांच किलोमीटर दूर था। विज्ञान विषय से 12वीं भी पास के ही रतकुड़िया गाँव के चौधरी गुल्लाराम सरकारी स्कूल से पास की। गाँव के पथरीले रास्तों के बीच से होते हुए सरकारी स्कूल में पढ़ने जाने वाले इस किसान पुत्र ने इस दौरान ही एक सपनों की दुनिया बसा ली थी। कुछ खास करना है, यह तय कर लिया था।

Dr ramesh Ralia
डॉ रमेश रलिया।

रमेश ने स्कूली शिक्षा के बाद जोधपुर के जय नारायण विश्वविद्यालय से B.Sc. की और फिर Biotechnology में M.Sc. की। बीएससी फर्स्ट ईयर में आने पर पहली बार साइकिल मिली।

‛द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए उन्होंने रोचक किस्से सुनाए। वे बताते हैं, “मैं अपनी क्लास में कभी भी फर्स्ट नहीं आया। हालांकि मुख्य परीक्षाओं में हमेशा 60 से 73 प्रतिशत तक अंक प्राप्त किए। कम्प्युटर का प्रयोग भी पहली बार B.Sc. सेकंड ईयर में किया। 2006 तक तो कृषि वैज्ञानिक बनने की सोची तक नहीं थी।

वे बताते हैं, “मन में सपना जरूर था कि खेतों में जान झोंकने वाले किसानों के जीवन स्तर में सुधार लाया जाए। इसके दो ऑप्शन थे। सिविल सर्विस में जाऊं या फिर एग्रीकल्चर में कुछ करके किसानों के जीवन स्तर को सुधारने में मददगार बनू। तब मैंने एग्रीकल्चर में कुछ करने की सोची। मेरे ज्ञान का फायदा मेरे परिवार के किसानों सहित देश-विदेश के सभी किसानों तक पहुंचे व उनका जीवन स्तर बदल जाए, तभी मैं खुद के कृषि वैज्ञानिक होने को सफल मानूंगा।

 

काजरी में चयन से बदली ज़िंदगी

2009 में उनका चयन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की शाखा काजरी, जोधपुर में कृषि नैनो टेक्नोलॉजी के पहले प्रोजेक्ट में रिसर्च एसोसिएट के रूप में हुआ। वे कहते हैं, उस समय के मेरे सुपरवाइजर डॉ. जेसी तरफ़दा व वहां मेरे निदेशक रहे डॉ. केपीआर विट्ठल व डॉ. एमएम रॉय का आभारी हूँ । जिस लैब में मैंने काम किया, वहां उन्होंने काम करने की पूरी आज़ादी दी। इसी वजह से 4 साल में मैंने 4 पेटेंट फाइल किए व नैनो टेक्नोलॉजी पर करीब 20 पब्लिकेशन और एक किताब भी पब्लिश की।

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डॉ. रमेश रलिया की लैब।

अमेरिका से बुलावा आना बड़ी उपलब्धि

पीएचडी के दौरान वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी, अमेरिका की डिपार्टमेंट हेड मेरी कैरी ने जब उनकी लैब विजिट कर रिसर्च वर्क देखा तो कहने लगी, “यदि वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी जॉइन करना चाहो तो पद मिल सकता है।” रलिया ने उन्हें पीएचडी पूरी करने और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल की परीक्षा देकर आने की बात कही,  जिसे वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ने मान लिया। परीक्षा के दो चरण पास करने के बाद इंटरव्यू देकर वे अमेरिका चले गए।

नैनो खाद का आविष्कार

अमेरिका जाने के बाद वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी की एयरोसोल एवं एयर क्वालिटी रिसर्च लैब में वैज्ञानिक बने डॉ. रमेश ने किसानों के लिए नैनो टेक्नोलॉजी के माध्यम से ऐसी खाद विकसित की जो मात्र कुछ मिलीग्राम देने से खेत की पैदावार कई गुना बढ़ा सकती है। इसमें 80 किग्रा डीएपी की जगह मात्र 640 मिग्रा नैनो फॉस्फेट से ही काम चल जाएगा। इस खाद की विशेषता यह है की यह सीधी पौधे के अंदर जाती है और मिट्टी के लिए हानिकारक नहीं होती ।

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डॉ रमेश रलिया की बनाई नैनो टेक्नोलॉजी से बनाई खाद।

बढ़ता है पैदावार

डॉ. रमेश बताते हैं कि,  नैनो खाद फसल की पैदावार तीन गुना तक बढ़ा देती है। 50 किलो के एक फ़र्टिलाइज़र बैग की कीमत सब्सिडी के बाद करीब 1200 रुपए तक होती है। यह खाद करीब एक हैक्टर में डाली जाती है। अब यदि एक उत्पाद जो नैनो टेक्नोलॉजी से बनाया गया है, जिसका भार करीब 4-5 किलो है और जिसकी कीमत भी 1200 रुपए ही है। उसे भी आप एक हैक्टर खेत में प्रयोग करते हैं। लेकिन जब फसल की हार्वेस्टिंग करते हैं, तो पाते हैं कि जिसमें 4-5 किलो नैनो टेक्नोलॉजी वाला खाद इस्तेमाल किया था वहां फसल 50 किलो वाली खाद की तुलना में करीब तीन गुना तक ज्यादा हुई है। यही नैनो टेक्नोलॉजी का कॉन्सेप्ट है।

वे कहते हैं,“भारत की बहुत सी प्रयोगशालाओं, संस्थाओं में बेहतरीन काम हो रहे हैं। इसे प्रशासनिक और नीतिगत तौर पर और अधिक समन्वय के साथ अवसर को पहचान कर उसको उपयोग करने की जरूरत है। नागरिक हो या नौकरीदार, सभी को अपने काम के प्रति जवाबदेही एवं ज़िम्मेदारी को बहुत अधिक बढ़ाना होगा।

”मैं अब तक करीब 60 से अधिक देशों एवं संस्थानों के अधिकारियों के साथ विभिन्न स्तरों पर कार्य कर चुका हूँ । भारत के लोग बहुत मेहनती हैं, बशर्ते उन्हें उनकी मेहनत का सही मूल्य दिया जाए। विश्व में किसी भी सेक्टर की किसी भी कंपनी के सीनियर मैनेजमेंट को देखिए, उसमें भारतीय ही मिलेंगे। जब सुंदर पिचाई गूगल को और सत्य नडेला माइक्रोसॉफ्ट को अमेरिका में लीड कर सकते हैं तो भारत में क्यों नहीं?”

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एक कार्यक्रम में वक्तव्य देते डॉ. रमेश रलिया।

एक सवाल का जवाब देते हुए वे कहते हैं, “खेती करने वाले प्रमुख देशों में किसानों की संख्या लगातार घटती जा रही है। यह एक चिंतनीय विषय है। ऐसे ज्यादातर देशों में खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता है। इसके प्रमुख कारणों में मशीनीकरण, वैज्ञानिक सोच एवं वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग है। भारत की दृष्टि से कहूं तो यहां अभी भी जमीन की उपलब्धता के हिसाब से पर्याप्त संख्या में किसान मौजूद है। लेकिन भारत में अधिकतर किसान कम या बिल्कुल पढ़े लिखे नहीं हैं। किसान आज भी उसी तरीके से खेती करते हैं, जिससे उनके पूर्वज किया करते थे ।

आज की परिस्थितियों में वैज्ञानिक, पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय अंतर आया है। मिट्टी की क्षमता और पानी की उपलब्धता दर बदल चुकी है। सरकार को चाहिए कि वे युवाओं को खेती करने के लिए आकर्षित करे, जैसा अमेरिका एवं यूरोप में होता है।

”सरकार को इसके लिए कुछ नीतिगत बदलाव करने पड़ेंगे। युवाओं को महसूस करवाना होगा कि खेती सिक्योर फ्यूचर एवं रेस्पेक्ट वाला बिजनेस है। युवा खेती से पलायन कर रहे हैं, वो खेती की बजाय फैक्ट्री के मजदूर बनना पसंद कर रहे हैं। इस मानसिकता को अवसर पैदा करते हुए बदलने की जरूरत है।”

 

यह होती है नैनो टेक्नालॉजी

नैनो टेक्नोलॉजी विज्ञान की एक वह शाखा है, जिसमें ऐसे इंजीनियर्ड अणुओं का अध्ययन किया जाता है, जिनकी आकार संरचना किसी एक स्केल पर एक से सौ नैनोमीटर के मध्य होती है। एक मीटर का एक अरबवां हिस्सा एक नैनोपार्टिकल होता है। एक नैनोमीटर तक के छोटे पार्टिकल्स को देखने के लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी की जरूरत होती है। कुछ नेचुरल नैनोपार्टिकल्स भी होते हैं, जिन्हें वायरस, डस्ट, सॉल्ट के कुछ पार्टिकल्स एवं कोशिकाओं में पाई जानी वाली सरंचनाओं के नाम से भी जाना जाता हैं।

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डॉ रमेश रलिया

 

वरदान साबित होगी नैनो टेक्नोलॉजी

डॉ. रलिया के अनुसार अभी नए शोध में इसका उपयोग फलों एव खाद्य पदार्थों में पैथोजन, डीएनए एवं केमिकल को डिटेक्ट करने के सेंसर एवं न्यूट्रिशन बढ़ाने के लिए हो रहा है। इन सेंसर से आम कस्टमर बड़ी आसानी  से जेनेटिकली मॉडिफाइड और केमिकल फ़र्टिलाइज़र पेस्टिसाइड एवं नूट्रिएशन की मात्रा को जांच सकते हैं। वे बताते हैं कि, ”हमारी लैब में इन विषयों में से कुछ के आरम्भिक स्तर के एवं नैनो बेस्ड फ़र्टिलाइज़र व पेस्टीसाइड्स के एडवांस फील्ड ट्रायल एक्सपेरिमेंट पूरे हो चुके हैं। जिसके बेहतरीन परिणाम मिले हैं जो आने वाले समय में दैनिक जीवन के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे।

भारत में बड़ी उदासीनता

डॉ. रलिया कहते हैं, “नैनो फ़र्टिलाइज़र की शुरुआत मैंने भारत से की लेकिन इसकी एडवांस प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी को अमेरिका में आकर डवलप किया। भारत में इसको लागू करवाने में अभी तक असमर्थ हूँ । उम्मीद करता हूँ किसी दिन हमारी लैब रिसर्च का उपयोग हरेक किसान अपने खेत में कर पाएगा। उससे खेती-पर्यावरण हमेशा के लिए लाभकारी बने रह सकेंगे।

”मैंने भारत सरकार से वादा किया है कि यदि हमारी तकनीक से बने खाद को सरकार लागत मूल्य से आधे पर किसान को उपलब्ध करवाती है तो हम तकनीक का लाइसेंस उनको बिना किसी शुल्क लिए प्रदान करने का प्रयास करेंगे।”

वे कहते हैं, ” सरकार से मंजूरी मिले तो एक साल में प्रोडक्शन शुरू हो सकता है। यदि सरकार इसको नहीं करती तो हम इंटरनेशनल एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम के तहत विभिन्न कंपनियों के माध्यम से इसे किसानों को कम से कम लाभ पर देने का प्रयास करेंगे। इसके लिए हम प्रोडक्शन को स्केलअप एवं फील्ड उपयोग करने का फेसबिलिटी टेस्ट कर रहे हैं।”

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नैनो टेक्नोलॉजी से बनी फर्टिलाइजर।

”मैंने सरकार को दिए सुझाव में यही कहा है कि हर कृषि विज्ञान केंद्र में ऑर्गेनिक तरीके से नैनो फ़र्टिलाइज़र एवं नैनो पेस्टिसाइड यूनिट लगनी चाहिए । किसानों को इसकी ट्रेनिंग दी जाए। इससे न केवल लोकल स्तर पर लोगों को रोजगार मिलेंगे बल्कि खाद इम्पोर्ट करने का लाखों करोड़ रुपए का खर्च भी बच जाएगा। इससे खेती योग्य सस्ता एवं बेहतरीन खाद बनाया जा सकेगा,  फलस्वरुप फसल उत्पादन में कई गुना वृद्धि होगी।’

इस माध्यम से न केवल रासायनिक खादों के अधिक प्रयोग से मुक्ति मिलेगी बल्कि जमीन की उर्वरा शक्ति, जमीन के अंदर एवं बाहर जैव विविधता भी बढ़ेगी। जो फ़ॉर्मूलेशन्स हमने तैयार किए हैं उनको न केवल जीवाणुओं पर बल्कि मधुमखियों, तितलियों, टिड्डी, पक्षियों आदि पर भी प्रभाव परीक्षण किया है। किसान वैज्ञानिक तरीके से सस्टेनेबल नैनो टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हैं तो खेती के लिए यह बेहतर तकनीक साबित होगी।

 

मिले हैं कई मान सम्मान

डॉ. रलिया को ग्लोबल इम्पेक्ट अवार्ड, ग्लोबल बायोटेक्नोलॉजी अवार्ड, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम गोल्ड मैडल, लीप इन्वेंटर चैलेंज अवार्ड, गॉर्डोन रिसर्च कॉन्फ्रेंस चेयर अवार्ड, एग्रीकल्चरल रिसर्च सर्विस,  एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी, भारत ज्योति अवार्ड एंड सर्टिफिकेट ऑफ एक्सीलेंस, आनरेरी फेलो सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं।

किसान और यंग एंटरप्रेन्योर उनसे फ़ेसबुक पर संपर्क कर अधिक जानकारी ले सकते हैं। या फिर उन्हें rameshraliya@wustl.edu पर ईमेल भी कर सकते हैं।

संपादन – भगवतीलाल तेली 


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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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