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दिव्यांग होने के बावजूद इस फ़ौजी ने बनाया विश्व रिकार्ड, संवार रहे हैं सैकड़ों ग़रीब बच्चों का जीवन!

“एक सैनिक हमेशा एक सैनिक ही रहता है। वर्दी में वह अपने लोगों की हिफाजत के लिए लड़ता है। मैं अब सामाजिक सैनिक हूँ इसलिए गरीबी, भूखमरी और बच्चों की बेहतर शिक्षा की लड़ाई लड़ रहा हूँ।”

अपनी संस्था के बच्चों के साथ नवीन गुलिया

ह कहानी है एक ऐसे पैरा कमांडो की जो अपने ट्रेनिंग पीरियड में ही दुर्घटना का शिकार हो जाता है। घटना में रीढ़ व गले ही हड्डी टूट जाती है। दो साल तक लंबे इलाज के बाद वह मौत के मुंह से बाहर आता है। डॉक्टर्स हंड्रेड परसेंट डिसएबल्ड डिक्लेयर कर देते हैं। लेकिन वह हार नहीं मानता। फिर उठ खड़ा होता है उसी सेवा व जज्बे के साथ और बन जाता है उन हजारों लोगों के लिए मिसाल जो पैरालाइज होने के बाद हिम्मत हार चुके होते हैं।

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नवीन गुलिया।

लेकिन इनका यह सफर इतना आसान नहीं रहा। सोचिए, उस समय किसी इंसान के दिमाग में क्या आता होगा जब उसे एक दुर्घटना के बाद यह बताया जाए कि चोट की वजह से वह शत प्रतिशत विकलांग हो गया है। उसे जीवन में ​हर काम के लिए दूसरों के भरोसे रहना होगा। हम और आप शायद ठीक-ठीक अनुमान भी नहीं लगा सकते। लेकिन दिल को दहला देने वाली यह बात साल 1997 में अस्पताल से छुट्टी लेते वक्त उनसे कही गई थी। डॉक्टर्स द्वारा कहे यह शब्द उन्हें परेशान कर रहे थे। उनके जानने वाले भी परेशान थे। लेकिन किसी को क्या पता था कि यह सैनिक इस घटना के बाद भी न सिर्फ एक दिन कीर्तिमान स्थापित करेगा बल्कि गरीब, अनाथ, दिव्यांग और जरूरतमंद बच्चों का सहारा भी बनेगा।

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अपनी संस्था के बच्चों के साथ नवीन गुलिया

इन पूर्व सैनिक का नाम है नवीन गुलिया।गुरुग्राम (गुड़गांव) के रहने वाले नवीन भारतीय सेना में पैरा कमांडो बनने के लिए भर्ती हुए थे। देश सेवा का उनका यह सपना साकार भी हो रहा था। वह पैरा कमांंडो की ट्रेनिंग ले रहे थे। लेकिन साल 1995 के 29 अप्रैल का दिन उनके लिए अच्छा नहीं था। इसी दिन दुर्घटना की वजह से उनकी रीढ़ और गले की हड्डी टूटी थी। उन्हें स्पाइन इंज्युरी हुई और गर्दन से नीचे का शरीर पैरालाइज हो गया। डॉक्टर्स ने उनको हंड्रेड परसेंट डिसएबल्ड डिक्लेयर कर दिया।

 

चार महीने बाद ही व्हीलचेयर पर आए

नवीन का दो साल तक इलाज चला। वह उस धारणा को गलत साबित करना चाहते थे जिसमें कहा जाता है कि हंड्रेड पर्सेंट डिसेबल्ड होने के बाद व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। नवीन ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने व्हीलचेयर पर घूमना सीख लिया। चार महीने बाद ही वे पूरी तरह व्हीलचेयर पर आ गए। उन्होंने किताबें पढ़ना शुरू किया, कम्प्यूटर कोर्स किया, खाली चेस बोर्ड पर शतरंज की प्रैक्टिस की।

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मोटिवेशन स्पीच देते नवीन।

 

नवीन थोड़े और ठीक हुए तो हाथ से चलने वाले एक्सीलेरेटर और ब्रेक के साथ मोडिफाइड कार भी चलानी सीख ली। इसके बाद हैंड कंट्रोल्ड कार डिजाइन की। कार रिजेक्ट हुई तो डिफरेंटली एबल्ड के लिए हैंड कंट्रोल किट डिजाइन की। जब मैंने उनसे यह पूछा कि, इतना सब कैसे कर लिया। इतनी बड़ी घटना के बाद आपको कहाँ से इंस्पिरेशन मिला, इसके जवाब में वे कहते हैं…

”दो साल तक अस्पताल और बिस्तर में संघर्ष करने के दौरान एक ही चीज़ थी जो मुझे इंस्पायर करती थी वो थी लाइफ। आई लव टू लिव। सांस का चलना भी अपने आप में बहुत बड़ी चीज़ है। जो लोग जीवन को व्यर्थ मानते हैं वो केवल दो मिनट के लिए सांसे रोककर देखें, महत्व समझ आ जाएगा। दुनिया की कोई भी चीज आपको मॉटिवेट नहीं कर सकती है। यह व्यक्ति की प्रकृति और उसकी क्षमता पर निर्भर करता है। आप में अगर क्षमता है, आप चीजों को करना चाहते हैं तो आप कर लेते हैं। इसमें किसी से मॉटिवेशन का रोल नहीं रहता।”

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नवीन गुलिया

बनाया लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड

नवीन का सफर यहीं नहीं थमा। उन्होंने वल्र्ड रिकॉर्ड बनाने की ठानी। उनके नाम सबसे कम समय में 18632 फीट ऊंचे व सबसे खतरनाक पहाड़ी दर्रों में से एक, ‘मार्सिमिक ला’ तक गाड़ी ले जाने का रिकॉर्ड है, जो लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। उन्होंने दिल्ली से ‘मार्सिमिक ला’ तक 1110 किमी की दूरी बिना रूके सिर्फ 55 घंटे में तय की थी। नवीन ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति है। वे वहां तक गाड़ी ले जाने का किस्सा याद करते हुए कहते हैं…

“यह साल 2004 के 10 सितंबर की बात है। सुबह के तीन बजे मैंने यह सफर शुरू किया था। मेरे साथ दो पत्रकार भी थे जिन्हें इस यात्रा को डॉक्यूमेंट करना था। मैं 55 घंटे का सफर करके वहां पहुंचा था। वहां पहुंचते ही जब उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो मैंने कहा था, हम सबके मन में शंकाओं और प्रश्नों का एक पहाड़ होता है और उसी पहाड़ पर विजय पाने का नाम जीवन है। मेरे इस अभियान का एक उद्देश्य और भी था, मैंने इस मिशन के जरिए मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था के लिए पैसे भी इकट्ठा किए, ताकि उन जरूरतमंद बच्चों को कुछ सहायता मिल सके।”

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मार्सिमिक ला फतेह करने के बाद नवीन गुलिया

 

नवीन के इस कीर्तिमान की गूंज विश्वभर में सुनाई पड़ी। उन्हें अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें राष्ट्रीय आदर्श के खिताब से नवाजा। लेकिन नवीन के अनुसार उनको सभी सम्मानों से ज्यादा खुशी इस अभियान से दिव्यांग बच्चियों के लिए जुटाई गई मदद उन तक पहुंचाकर मिली थी।

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पुरस्कार के साथ नवीन।

 

नवीन ने साल 2007 में जरूरतमंद बच्चों की मदद करने के लिए ‘अपनी दुनिया अपना आशियाना’ नाम से एनजीओ भी शुरू किया। उन्होंने अपने कार्य की शुरूआत दिल्ली से करीब 55 किलोमीटर दूर हरियाणा के गाँव बहराणा से की। वहां उन्होंने गरीब मजदूर, किसानों के बच्चों को शिक्षा देनी शुरू की। वह उन बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ खेलकूद करवाते हैं और पोष्टिक भोजन भी खिलाते हैं।

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जरूरतमंद बच्चियों को पढ़ाते हुए नवीन

बच्चों की सहायता करने के इस मिशन के बारे में नवीन बताते हैं, “इस कार्य के लिए मैंने हरियाणा को इसलिए चुना क्योंकि यहां का लिंगानुपात बहुत कम है। लड़कियों को बहुत सारे भेदभावों का सामना करना पड़ता है। उनकी छोटी उम्र में ही शादी कर दी जाती है। हमने लगातार कोशिश कर लड़कियों के साथ-साथ उनके परिवारों के साथ काम कर उनकी पढ़ाई सुनिश्चित की। अब तक हमने करीब 1200 बच्चों को पढ़ाई और खेलकूद में मदद की है, जिनमें 700 के करीब केवल लड़कियां हैं। अभी हमारी संस्था की ही दो लड़कियां कुश्ती में नेशनल गेम्स भी खेलने जाएंगी। उन्होंने स्टेट गेम्स में गोल्ड मेडल हासिल किए हैं।”

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गोद ली हुई बच्चियों के साथ नवीन गुलिया।

नवीन ने पिछले दिनों ही 156 लड़कियों को गोद लिया है। वह उनकी पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद का भी खर्चा उठा रहे हैं। उनका कहना है कि वे इन बच्चियों की शादी तक का खर्चा भी खुद उठाएंगे। उनको अच्छा इंसान बनाएंगे। वह कहते हैं, “मेरे से जितना बन पड़ रहा है, उतना मैं लगातार कर रहा हूँ। मैंने लड़कियों के लिए एक होस्टल भी बनाना शुरू कर दिया है, जिसमें अनाथ व दिव्यांग बच्चियों के रहने की सुविधा भी हम करेंगे। इस काम में चुनौतियां बहुत हैं, लेकिन मैं एक सैनिक हूँ इसलिए हार मानने वाला नहीं हूँ।”

हमारी बातचीत के आखिर में नवीन कहते हैं, “एक सैनिक हमेशा एक सैनिक ही रहता है। वर्दी में वह अपने लोगों की हिफाजत के लिए लड़ता है। मैं अब सामाजिक सैनिक हूँ इसलिए गरीबी, भूखमरी और बच्चों की बेहतर शिक्षा की लड़ाई लड़ रहा हूँ।”

नवीन ने ‘In Quest of the Last Victory’ नाम से किताब भी लिखी है। वे बताते हैं कि इस काम के लिए आधी राशि तो वे अपनी पेंशन, किताब की रॉयल्टी और मोटिवेशनल लेक्चर्स से होने वाली कमाई से खर्च करते हैं। बाकी खर्च में दोस्त, परिचित आदि मदद करते हैं। अगर आप भी नवीन के इस नेक काम में उनकी मदद करना चाहते हैं या उनसे सम्पर्क करना चाहते हैं तो उन्हें 098102 45996 पर कॉल कर सकते हैं।

संपादन – भगवतीलाल तेली 


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