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उम्मीद के फूल

इतना कुछ सुन्दर है आपके जीवन में लेकिन फिर भी जो तलाश है क्या वो बेमानी नहीं?

क शाम एक हसीन फूल
ने खिड़की खटखटायी
बच्चे ने खिड़की का पल्ला खोला
गहरी भूरी बिल्लोरी आँखें
कौतूहल, दोस्ती, शंका भरे
पानी में तैरते कंचे सी आँखें
वो देर तक फूल की ओर देखता रहा
पहचानने की नाकाम कोशिश

 

फूल उसे देख मुस्कुराता रहा
फिर बच्चे ने गुनगुनाना शुरू कर दिया
फूल ने भी बच्चे का साथ दिया
कई दिन बीते
इनकी यारी की ख़ुश्बू
दूर तक महकी
बच्चे की मम्मी ने
प्यार से कहा एक रोज़
तुमने भी न कैसा फूल चुना है
पंखुड़ियाँ गिर चुकी हैं
ज़रा भी सुन्दरता नहीं बाक़ी इनमें

 

बच्चे की आँखों के पानी में
सोच की लकीरें उग आयीं
मम्मी ने कहा है तो सही ही होगा
लेकिन मन नहीं माना कहीं
रात को सो नहीं पाता
सोचता रहता पड़े पड़े
मम्मी तो कह के भूल चुकी थी
लेकिन एक सुबह जब जगाने आई तो
बच्चे ने पूछा
सुन्दरता क्या होती है मम्मी?
फूल और मैं एक दूसरे के साथ गाते हैं
झूमते हैं. मुझे तो बहुत अच्छा लगता है
लेकिन आप भी सही ही होंगी
सुन्दर क्या होता है?

 

मम्मी तब तो कमरे से चली गयी
जल्दी तैयार होने की हिदायत दे कर
लेकिन बाद में बहुत देर तक आईना देखती रही
छत की मुंडेर पर खड़ी रही
भूखी-प्यासी लेटी हुई छत देखती कभी
न खाना बनाया, न खाया
शाम को मोहल्ले के मोड़ पर
बच्चे को स्कूल से लौटते हुए
इंतज़ार करती मिली
बस्ता अपने कंधे टाँगा
उँगली थामी, चलने लगी और बोली
मैं ग़लत थी बच्चे
मैं अपना सवाल वापस लेती हूँ
मुझे नहीं पता सुन्दरता क्या होती है
मुझे नहीं पता रात सुन्दर है
या सुबह या गर्मी या बरसात
मैं अपनी परिभाषाओं में घिरी हूँ
क़ैद हूँ अपनी समझ में
मेरी आँखों ने तय नहीं किया
कि सुन्दर या अच्छा या बुरा क्या होता है
ये सब मुझे बताया गया है
मेरे सपने भी मेरे नहीं
मुझे दिए गए हैं
मेरे मापदण्ड मेरे नहीं
क्या सुख है, क्या दुःख है यह भी मैंने अनुभवों से नहीं
बाहर की दुनिया से सीखा है
तुम बड़े मत होना बच्चे
बड़ा हो कर कुछ भी अपना नहीं होता
बड़े अपनी तौर पर नहीं
पहले से परिभाषित दुनिया के हिसाब से जीते हैं
इसीलिए अमूमन दुःखी रहते हैं
नहीं जानते क्यों और कितना कमाना है
कितनी और किस ओर दौड़ है
आज मुझे कुछ भी नहीं पता कि
किस बात की बैचेनी छाई रहती है
कौन सी होड़ है..

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मम्मी देर से पार्क की बेंच पर बैठी थी
बच्चे को कुछ समझ नहीं आया
कि मम्मी क्या कह रही थी
न ही जानने की कोई जिज्ञासा थी
बाद में जब वो चुप हुई तो
बच्चे ने उसकी उँगली कस के पकड़ी
और मुस्कुरा कर कहा, तो आइसक्रीम खाने चलें?

 

मम्मी हँस कर उठ खड़ी हुई
बच्चा जाते हुए पूछ रहा था
फूल के लिए भी लाएँगे न?

 

* * *

 

सुन्दरता के बारे में इन लोगों ने क्या कहा सुनिए. विचार कीजिये फिर, अपनी पूरी ज़िन्दगी देखिए – आप कौन हैं. कहाँ जा रहे हैं. कहाँ जाना चाहिए. क्या हासिल होगा कहीं पहुँच भी गए तो. या नहीं पहुँचे तो क्या चला जाएगा.. आज से पचास साल पहले जो थे उनसे सीखिए. अपने दुःख और बेचैनी को कैसे गले लगा कर रखा है. इतना कुछ सुन्दर है आपके जीवन में लेकिन फिर भी जो तलाश है क्या वो बेमानी नहीं?

 

शनिवार की चाय के साथ ढेर सारे सवाल आपकी गोद में रख रहा हूँ. इनसे आँखें न चुराइये. और ये रहा आज का हिन्दी कविता का वीडियो आपको सकारात्मक ऊर्जा से भरने के लिए

 


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Written by मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.

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