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इस दंपति ने 6, 000 न्यूज़पेपर रीसायकल कर बनाई 10, 000 इको-फ्रेंडली पेंसिल!

पूरी दुनिया में 20 अरब पेंसिल बनाने के लिए एक साल में लगभग 80 लाख पेड़ काटे जाते हैं।

चपन में जैसे ही हमारी पेंसिल छोटी हो जाती थी या फिर किसी वजह से टूट जाती थी तो हम बेहिचक उसे फेंक देते थे। क्योंकि पहले तो छोटी पेंसिल से लिखना मुश्किल होता था और फिर सब यही करते थे तो हम क्यों न करें।

वैसे भी बच्चों को यह बात समझाना इतना आसान नहीं कि पूरी दुनिया में 20 अरब पेंसिल बनाने के लिए एक साल में लगभग 80 लाख पेड़ काटे जाते हैं। बच्चे ही क्या, पर्यावरण की यह गंभीर स्थिति कई बार बड़ों की भी समझ में नहीं आती। तभी तो आज हम इस कगार पर पहुँच गये हैं, जहां से प्राकृतिक संसाधनों के लिए भविष्य में सिर्फ़ अँधेरा नज़र आता है।

पर बंगलुरु के अक्षता भाद्रन्ना और राहुल पागड को जब इन बातों का पता चला, तो उन्होंने इस दिशा में कुछ करने की ठानी। शायद उनकी जगह कोई और होता तो सोचता कि मेरे अकेले के कुछ करने से क्या हो जायेगा? पर इन दोनों पति-पत्नी ने चाहे छोटे स्तर पर ही सही, पर पर्यावरण के लिए कुछ करने का फ़ैसला किया।

 

अक्षता और राहुल ने सितम्बर 2018 में ‘Dopolgy- Green Alternatives’ की शुरुआत की। यह एक ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म है जहाँ से आप इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स खरीद सकते हैं।

अक्षता और राहुल

बंगलुरु से पहले यह दम्पति इंडोनेशिया में रहता था। जब वे वापिस भारत आये तो उनका सारा सामान प्लास्टिक की पैकेजिंग में इंडोनेशिया से भारत भेजा गया। उनके घर का हर सामान – उनके कपड़े, जूते, घर का छोटा-मोटा सजावट का सामान और यहाँ तक कि हर एक चम्मच भी प्लास्टिक में लिपटा हुआ था।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए अक्षता कहती है, “इंडोनेशिया में प्लास्टिक का इस्तेमाल इस कदर है कि प्लास्टिक-प्रदुषण के मामले में वह दुनिया में दूसरे नंबर पर है। पर हैरानी कि बात है कि इस बात की गंभीरता का एहसास हमें भारत लौटने पर हुआ। वहां से आई हमारी हर चीज़, यहाँ तक कि एक-एक चम्मच भी प्लास्टिक में पैक किया गया था। बस यहीं से हमने अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने की ठानी!”

इसके बाद अक्षता और राहुल ने अपनी दिनचर्या में कुछ ऐसे बदलाव किये जिससे उन्हें प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करना पड़े। उन्होंने प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल करना बिल्कुल ही छोड़ दिया और धीरे-धीरे उन्हें इसकी इतनी आदत पड़ गयी कि वे पूरी तरह से इको-फ्रेंडली चीज़े इस्तेमाल करने लगे।

अब वे बैग, साबुन, कटलरी, गिलास, लूफ़ा आदि लेते हुए भी यह ध्यान रखते कि ये सभी चीज़े पर्यावरण के अनुकूल हों।  साथ ही उन्होंने अपने घर से निकलने वाले गीले कचरे से खाद बनाना भी शुरू कर दिया।

इसी दौरान उन्हें पता चला कि अक्सर इको-फ्रेंडली चीज़ों की कीमत इतनी ज्यादा होती है कि चाहते हुए भी हर किसी के लिए इन्हें खरीदना संभव नहीं हो पाता।

“200 रूपये का एक बैम्बू-टूथब्रश (बांस का बना टूथब्रश) हर चार महीने में खरीदना हर किसी के लिए संभव नहीं है। दुर्भाग्यवश इनकी ज्यादा कीमतों की वजह से इको-फ्रेंडली चीज़ों को हमारे देश में एक लक्ज़री समझा जाता है। पर हम इसे आम-आदमी की पहुँच में लाना चाहते थे और इसीलिए हमने अपनी बचत के पैसों से ‘डोपॉलजी’ की शुरुआत की।”

इको-फ्रेंडली टूथब्रश

 

शुरू में उन्होंने लूफ़ा, पेंसिल, टूथब्रश जैसे कुछ इको-फ्रेंडली चीज़े कम कीमत पर सीधे उत्पादकों से ख़रीदे और इन्हें अपनी वेबसाइट पर बेचा। इतना ही नहीं, वे कुछ ऑफलाइन इवेंट्स में भी अपने प्रोडक्ट लेकर गये। इन इवेंट्स में भी उन्हें काफ़ी सफलता मिली।

इसी सफलता ने उन्हें खुद अपने प्रोडक्ट बनाकर बेचने की प्रेरणा दी। राहुल ने अपनी मार्केटिंग कि अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर, प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग और हैंडलिंग पर ध्यान दिया। उन्होंने चीन से एक मशीन मंगवाई जिससे कि अख़बार से पेंसिल बनायीं जा सके।

सबसे पहले पेंसिल बनाने के पीछे उनके उद्देश्य के बारे में बताते हुए राहुल ने कहा, “हर एक उम्र के लोग पेंसिल का इस्तेमाल करते हैं और यह वह छोटा-सा प्रोडक्ट है जिसे आसानी से बदला जा सकता है बिना किसी हिचक के।”

Promotion

 

साथ ही, जब उन्हें पता चला कि सिर्फ़ पेंसिल बनाने के लिए 80 लाख पेड़ एक साल में काटे जाते हैं तो उन्होंने इसका विकल्प ढूंढने की कोशिश की। जो उन्हें न्यूज़पेपर रीसाइक्लिंग में दिखा और बस उनका सफ़र शुरू हो गया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)

बनाने का तरीका :

1. सबसे पहले अख़बार को 18×18 सेंटीमीटर के आकार में काटा जाता है। इसमें पेंसिल लेड को हाथ से रोल किया जाता है और फिर इसे रोलिंग मशीन में डाल दिया जाता है। फिर इन पेंसिलों को 30 मिनट के लिए प्राकृतिक रूप से सूखने के लिए रखा जाता है।

2. इस सूखी हुई पेंसिल को फिर एक बार 220 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ड्रायर में डाला जाता है।

3. फिर पोलिशिंग मशीन से इसे फाइनल टच दिया जाता है। और फिर इसे कटिंग मशीन में डालकर एक स्टैण्डर्ड साइज़ में काट लिया जाता है।

4. इस पूरी प्रक्रिया को पर्यावरण के अनुकूल रखने के लिए इस पेंसिल को पैक भी कम्पोस्टेबल क्राफ्ट पेपर से बने बॉक्स में किया जाता है।

 

अब तक यह दंपति 6, 000 न्यूज़पेपर को रीसायकल करके लगभग 10, 000 पेंसिल बना चुका है।

 

इसके अलावा उन्होंने अलग-अलग किस्म के बीज जैसे जैस्मिन, गेंदा, धनिया और प्याज़ आदि के सीड पेपर से कार्ड बनाना भी शुरू किया है। वे शादी का कार्ड, निमंत्रण पत्र, बिज़नेस कार्ड, पोस्टकार्ड आदि बना रहे हैं।

उन्हें एक कॉर्पोरेट कंपनी से महिला दिवस पर एक बहुत ही अच्छा प्रोजेक्ट मिला। कंपनी ने उनसे लगभग 150 सीड कार्ड बनाने के लिए कहा। इन सीड-कार्ड्स में कंपनी की महिला कर्मचारियों से उनके सबसे बड़े डर और चिंता के विषय में लिखने के लिए कहा गया। फिर इन सीड कार्ड्स को फाड़ दिया गया और बीजों को बो दिया गया।

इस एक्सरसाइज का उद्देश्य यह था कि वे अपनी चिंता और डर को बीजों की मदद से मिट्टी में दबा दें। इससे उन्हें बहुत राहत और सुकून मिला। अक्षता कहती हैं कि यह समाज को कुछ अच्छा वापिस करने का एक तरीका है।

राहुल और अक्षता के प्रोडक्ट्स अब दिल्ली, मुंबई, पंचकुला और अमृतसर जैसे शहरों में भी अपनी पहचान बना रहे हैं। इस दंपति की आगे की योजना है कि अब वे और भी अलग प्रोडक्ट्स का उत्पादन शुरू करें। फ़िलहाल वे वेस्ट टेट्रापैक से शार्पनर (पेंसिल की कटर) और रीसायकल प्लास्टिक से रूलर (स्केल) बनाने पर काम कर रहे हैं।

 

आज ज़्यादा से ज़्यादा लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं और अपने रहन-सहन में ज़रूरी बदलाव भी कर रहे हैं। पर फिर भी बदलाव की यह राह बहुत लम्बी है, जिस पर निरंतर चलते रहने से ही आपको मंजिल मिलेगी। इसलिए कदम चाहे छोटा हो या फिर बड़ा, पर ज़रूर उठायें और इस बदलाव में भागीदार बनें।

अक्षता और राहुल के इको-फ्रेंडली प्रोडक्ट्स देखने और खरीदने के लिए द बेटर इंडिया-शॉप पर जाएँ। साथ ही, इस दंपति से संपर्क करने के लिए dopolgy@gmail.com पर मेल कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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