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पाँच साल में 3500 घायल जानवरों को किया रेस्क्यू; 55 लावारिस कुत्तों को घर में दी शरण!

कस्तूरी और उनकी टीम जानवरों के लिए एक सर्व-सुविधा युक्त अस्पताल और बसेरा बना रही है।

कुछ कर गुजरने का अगर मन में जज़्बा हो तो छोटी उम्र और संसाधन की कमी कभी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती। रायपुर की युवती कस्तूरी बल्लाल ने इसे चरितार्थ कर दिखाया है। बीमार, जख्मी और लावारिस पशुओं की सेवा के लिए कस्तूरी ने इंजीनियर की नौकरी छोड़ दी। जानवरों की देखभाल के लिए ज्यादा समय मिल सके और खर्चा भी चल सके, इसके लिए अब वे बतौर फ्रीलांसर काम करती है।

 

क्या अनोखा काम करती हैं कस्तूरी ?

कस्तूरी बल्लाल

अक्सर हम देखते हैं कि बेज़ुबान जानवर तड़प-तड़प कर मर जाते हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता आज हर आदमी व्यस्त है, बावजूद इसके ऐसे लोग भी हैं जो आवारा कुत्तों की देख-रेख व पालन-पोषण करते हैं। कस्तूरी आवारा कुत्तों की देखभाल ही नहीं करतीं, बल्कि उन्हें अपने परिवार का सदस्य समझती हैं। 

कस्तूरी अपने साथियों के साथ मिलकर पिछले 5 साल से यह काम कर रही हैं। वे आवारा और बीमार कुत्तों के खाने-पीने और इलाज के लिए पैसों की व्यवस्था करती हैं। इस काम से प्रभावित होकर सरकार ने शेल्टर होम के लिए कस्तूरी को 2.5 एकड़ जमीन अलॉट किया है, जहाँ तेज़ी से निर्माण कार्य हो रहा है। कस्तूरी को यह काम शुरू करने पर लोगों की उपेक्षा और आलोचना का सामना करना पड़ा था, फिर धीरे-धीरे आलोचना करने वालों ने इसके महत्व को समझा और वे उनसे जुड़ते चले गये। आज उनके इस काम में काफ़ी लोग सहयोग करने लगे हैं। 

 

बचपन से ही जानवरों से करती हैं प्रेम 


कस्तूरी  कहती हैं, “जानवरों से मेरा लगाव बचपन में ही हो गया था हमारे घर में एक डॉग था और मैं अक्सर उसे बाहर ले जाया करती थी। मेरे पापा मुझे जंगल घुमाने ले जाया करते थे, जहाँ तरह-तरह के जानवरों को बेहद करीब से देखने का मौका मिलता था मेरे अंदर जानवरों के प्रति संवेदना हमेशा से थी मैं जब 12 साल की थी, तब भी बीमार जानवरों की देख-रेख किया करती थी। जानवरों के प्रति मेरी इस संवेदना को देख कर मेरे दादाजी मुझे अक्सर मेनका गांधी को चिट्ठी लिखने कहते और मैं उस समय ढेरों चिट्ठियाँ उन्हें भेजती।“ 

2013 में कस्तूरी को मेनका गांधी की संस्था पीपल फॉर एनिमल्स एवं उनके कार्यों के बारे में पता चला और 2 साल के प्रयास के बाद 2015 में इस संस्था की एक ब्रांच उन्होंने रायपुर में शुरू की वर्तमान में वह इस संस्था की सचिव हैं

 

अपने शहर के जानवरों की सेवा करने के लिए छोड़ दी नौकरी 


इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म करते ही कस्तूरी को अहमदाबाद में नौकरी मिल गयी थी। पर 2015 में जॉब छोड़ कर उन्होंने अपने राज्य के प्राणियों के लिए काम करने का सोचा।

कस्तूरी कहती है, “मैंने अपने शहर रायपुर में सड़क के जानवरों के प्रति बेहद क्रूरता देखी, लापरवाही देखी और सेवा का अभाव देखा। इन जानवरों को न कोई खाना देता, न बैठने की जगह और बीमार पड़ने पर न तो इलाज करवाया जाता था। व्यवस्था की इस कमी ने मेरे मन को झंझोड़ दिया और तब मैंने कम से कम अपने शहर के जानवरों के लिए व्यवस्था बनाने का संकल्प लिया।”

रायपुर आकर कस्तूरी ने एक निजी कंपनी में नौकरी कर ली पर उनके मुताबिक नौकरी के साथ-साथ इन जावारों को समय दे पाना मुश्किल हो रहा था। इधर खर्चा चलाने के लिए काम भी करना ज़रूरी था। ऐसे में कस्तूरी ने नौकरी छोड़कर फ्रीलांसिंग करना शुरू कर दिया। इससे दोनों समस्याओं का हल निकल आया।

अब इस काम को अधिक से अधिक समय देते हुए कस्तूरी ने और लोगों को संस्था से जोड़ना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे उनका कारवां बढ़ता गया।

“पिछले 5 वर्षों में हमने 100 से भी अधिक सदस्य बना लिए है जिसमें से अधिकांश युवा है और उससे से भी ज्यादा महिलाएं है,” कस्तूरी ने बताया।

अपने टीम के इन सदस्यों की मदद से अब तक उन्होंने 3500 से भी अधिक जानवरों को रेस्क्यू कर के सफलता पूर्वक उनका इलाज व ऑपरेशन करवाया है।

 

जागरूकता बढ़ाने के लिए शुरू किया ‘मिशन ज़ीरो’

पप्पी एडॉप्शन ड्राइव

पीपल फॉर एनिमल रायपुर के लिए काम कर रहे कस्तूरी एवं उनकी टीम ने एक अवेयरनेस विंग की शुरुआत की जिसका नाम है मिशन ज़ीरो

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इस मुहीम की शुरुआत जानवरों पर बढ़ते क्रूरता को ध्यान में रखते हुए किया गया। कई जगहों पर लावारिस कुत्तों को जहर देकर मार दिया जाता था। पैसे कमाने के लिए महावत हाथी को परेशान करता था। इस तरह के कई दर्दनाक मामले जब संस्था के सदस्यों के सामने आयें तो उन्होंने ‘मिशन ज़ीरो’ की शुरुआत की। इस पहल के तहत जानवरों के प्रति होने वाली क्रूरता को ज़ीरो करने का टारगेट रखा गया है। समाज के हर वर्ग – स्टूडेंट, टीचर, डॉक्टर, अधिकारी, पुलिस को ट्रेनिंग दी जा रही है कि वे कैसे जानवरों पर होने वाली क्रूरता को कम कर सकते हैं।
कस्तूरी बताती हैं, “मिशन ज़ीरो का मकसद है लोगों को जानकार बनाना ताकि जानवरों के ऊपर कोई अत्याचार न करें। बच्चों को स्कूल में बताया जाता है कि राह चलते जानवरों को बेवजह परेशान न करें। पुलिस को उनके अधिकारो के बारे में ट्रेनिंग दी जाती है कि कैसे क्रूरता करने वालों पर कानून के तहत एक्शन लिया जा सकता है।”
मिशन ज़ीरो के तहत संस्था ने 170 से भी अधिक भारतीय नस्ल के श्वान को गोद दिलाया है और ऐसे तमाम ट्रेनिंग सेशन और अवेर्नेस कैंपेन के माध्यम से जानवरों को क्रूरता से बचाना का काम किया जा रहा है।

 

चार साल के संघर्ष से मिली ढाई एकड़ ज़मीन 


कस्तूरी और उनके साथियों के 4 साल के कठिन परिश्रम के बाद, आखिर राज्य सरकार ने जानवरों के रख-रखाव के लिए 2.5 एकड़ ज़मीन आवंटित कर दी। पर यह सफ़र इतना आसान नहीं था।

“हर रोज़ एक जंग की तरह होता था। सब कहते थे कि यहाँ इंसानों को रहने के लिए घर नहीं मिल रहा है और तुम्हें जानवरों के लिए घर बनाना है। लोग हमारा मजाक उड़ाने लगे थे 2 साल बाद तो मैंने भी उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन फिर भी जब इन जानवरों की आँखों में देखती, तो एक ऊर्जा मिलती और मैं फिर से काम पर लग जाती। लगातार मेहनत के बाद हमें राज्य सरकार से 2.5 एकड़ ज़मीन उपलब्ध हो गई,” कस्तुरी भावुक होते हुए बताती हैं।


जब तक शेल्टर होम का काम पूरा नहीं हो जाता तब तक 55 कुत्ते कस्तूरी के घर में ही रहेंगे। स्टाफ की कमी के कारण अभी कस्तूरी और उनकी टीम ही जानवरों की देखभाल कर रही हैं।

 


कस्तूरी कहती हैं कि उन्हें जीवन में बहुत कठिन स्थितियों का सामना करना पड़ा है। कभी घर वालों ने साथ छोड़ दिया, कभी दोस्तों ने ताने कसे, कभी अपनों ने हंसी उड़ाई और इस बीच नौकरी छूटी। दूसरी नौकरी मिलने में भी बेहद परेशानी हुई। जीवन का तरीका पूरी तरह से बदल चुका था मेहनत करती थी, लेकिन हर रोज़ एक नई समस्या सामने खड़ी हो जाती। लेकिन कहते हैं न कि जब पूरी लगन और ईमानदारी के साथ काम किया जाता है तो सपने सच होने लगते हैं। कस्तुरी ने भी लोगों की आलोचना की परवाह करना छोड़ दिया और पूरी निष्ठा के साथ जानवरों की सेवा करती रहीं और आज आखिर उनकी मेहनत सफल होती नज़र आ रही है।


इंसान वही जो इन बेजुबानों को समझे 


कस्तूरी का मानना है कि हम इसलिए इंसान कहे जाते हैं, क्योंकि हम दूसरों के दर्द को समझ सकते हैं और उनकी मदद कर सकते हैं। जानवरों में हर वो संवेदना है, जो किसी भी इंसान में अपने और अपने परिजनों के लिये होती है। जानवर ज्यादा भावुक और अपने परिवार के रक्षक होते हैं। लेकिन सड़क पर किसी बेज़ुबान जीव के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर लोग मुंह फेर कर निकल जाते हैं। धरती से गिद्ध विलुप्त हो गये और कौआ विलुप्त होने की कगार पर है। कृषि कार्य में कीटनाशक और रासायनिक खाद के उपयोग के अलावा दुधारू जानवरों पर दवा का धड़ल्ले से प्रयोग किया जा रहा है। यह उनके जीवन के लिए संकट का कारण साबित हो रहा है। इको सिस्टम में सभी का महत्व है।

“ज़िंदगी के प्रति हमेशा अपना नज़रिया सकारात्मक रखिए। जानवरों और पक्षियों का प्यार सच्चा प्यार है। उनका प्यार नि:स्वार्थ है। जानवर और पक्षी बहुत भावुक, आज्ञाकारी, उदार और वफ़ादार होते हैं। मेरे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा अंतिम सांस तक इन मूक पशुओं के लिए समर्पित रहेगा,” अंत में कस्तूरी बस इतना कहते हुए विदा लेती है।


कस्तूरी और उनकी टीम जानवरों के लिए एक सर्व-सुविधा युक्त अस्पताल और बसेरा बना रही है मानवता से भरे इस कार्य में आप भी यथा संभव सहयोग करें। सहयोग के लिए संपर्क करें – 7987155452 

या फिर इस फेसबुक पेज पर जायें – Mission Zero – PFA Raipur

 

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर के छात्र हैं. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना , इतिहास पढ़ना एवं समझना.

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