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17 साल की इस लड़की की बनाई इको-फ्रेंडली प्लास्टिक के इस्तेमाल से करें पर्यावरण की रक्षा!

प्लास्टिक कचरे के चलते हर साल लगभग 1 लाख समुद्री जीव-जन्तु मरते हैं, तो वहीं हर साल प्लास्टिक बैग के उत्पादन पर लगभग 4.3 बिलियन का पेट्रोल खर्च होता है।

चपन से ही हमें बताया जाता है कि प्लास्टिक हमारे पर्यावरण के लिए हानिकारक है। सिर्फ एक प्लास्टिक बैग को पूरी तरह से गलने में लगभग एक हज़ार साल का समय लगता है और इसके बाद भी वह पर्यावरण में ज़हरीले कण और गैस छोड़ जाता है।

अगर ‘डाउन टू अर्थ’ में प्रकाशित रिपोर्ट की मानें तो हर भारतीय एक साल में लगभग 11 किलोग्राम प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मुताबिक, भारत में हर रोज़ लगभग 40, 000 टन प्लास्टिक कचरा जमा होता है। इस प्लास्टिक कचरे के चलते हर साल लगभग 1 लाख समुद्री जीव-जन्तु मरते हैं, तो वहीं हर साल प्लास्टिक बैग के उत्पादन पर लगभग 4.3 बिलियन का पेट्रोल खर्च होता है।

प्लास्टिक की वजह से होने वाले प्रदूषण को ‘वाइट पॉल्यूशन’ यानी सफ़ेद प्रदूषण कहा जाता है। यह प्रदूषण जल, वायु, हवा, मिट्टी, सभी को प्रभावित कर रहा है। सवाल है, इस प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार कौन है?

हम सभी लोग प्लास्टिक को बहुत-सी समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, जबकि इन समस्याओं के लिए प्लास्टिक नहीं, बल्कि ख़ुद हम ज़िम्मेदार हैं। हम सालों से बहुत ही गैरज़िम्मेदारी से प्लास्टिक का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसी वजह से प्लास्टिक से होने वाला प्रदूषण अपने चरम पर पहुँच गया है।

आज जहाँ हम सामान रखने के लिए दुकानदार से प्लास्टिक बैग मांगने में जरा भी नहीं हिचकिचाते, तो वहीं 17 साल की एक लड़की लोगों को सही तरीके से, सही तरह के प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करने के लिए जागरूक कर रही है।

महाराष्ट्र के मुंबई में रहने वाली ख़ुशी काबरा ने जमनाबाई नरसी इंटरनेशनल स्कूल से इसी साल 12वीं कक्षा पास की है। पिछले एक साल से ख़ुशी मुंबई के लोगों को बायो-कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उन्होंने ‘I am Not Plastics’ यानी कि ‘मैं प्लास्टिक नहीं हूँ’ नाम से एक अभियान शुरू किया है।

ख़ुशी काबरा (साभार: फेसबुक)

इस अभियान के तहत वे शहर के स्कूल, कॉलेज, मॉल, हाउसिंग सोसाइटी आदि में जाकर लोगों को अलग-अलग तरह के प्लास्टिक जैसे बायोडिग्रेडेबल, ऑक्सो-डिग्रेडेबल, बायो-बेस्ड और फिर बायो-कम्पोस्टेबल प्लास्टिक के बारे में बताती हैं और लोगों को ‘बायो-कम्पोस्टेबल’ प्लास्टिक बैग्स खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं।

क्या है ‘बायो-कम्पोस्टेबल’ प्लास्टिक?

यह प्लास्टिक बिल्कुल इको-फ्रेंडली है, जो बारिश, हवा, धूप आदि में पूरी तरह से डिकम्पोस्ट हो जाता है। इसके गलने पर इसमें से कोई हानिकारक गैस या फिर कण भी नहीं निकलते। यह पूरी तरह से घुलनशील है। इसलिए आप इसे अपने बगीचे या फिर कम्पोस्ट बनाने वाले पिट में डाल सकते हैं।

लेकिन यह ज़रूर ध्यान रखें कि कम्पोस्टेबल प्लास्टिक को आप रीसाइकिल के लिए नहीं दे सकते, क्योंकि अगर इस प्लास्टिक को रीसाइकलेबल प्लास्टिक के साथ दिया जाए तो इससे रीसाइक्लिंग प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए अलग-अलग प्लास्टिक के बीच का अंतर जानना बेहद ज़रूरी है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए ख़ुशी ने बताया कि अपने स्कूल के एक प्रोजेक्ट के दौरान उन्होंने ‘बायो-कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग’ बनाने के लिए काफ़ी रिसर्च किया। इसी रिसर्च से उन्हें अलग-अलग किस्म के प्लास्टिक बैग्स के बारे में पता चला। साथ ही, उन्होंने अपने स्कूल की लैब में ग्लिसरॉल, कॉर्नस्टार्च, विनेगर और पानी- इन चार उत्पादों को मिलाकर बायो-कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बनाया भी।

ख़ुशी बताती हैं कि बाज़ार में बायोडिग्रेडेबल के नाम पर बहुत-से प्लास्टिक बैग्स बेचे जाते हैं। लेकिन उनमें से कौन-सा कम्पोस्टेबल है या फिर कौन-सा रीसाइकलेबल है, इसके बारे में लोगों को कम ही जानकारी होती है। इसके अलावा, हम जैसे ही ‘बायो’ शब्द सुनते हैं तो हमें लगता है कि वह प्रोडक्ट इको-फ्रेंडली है ,पर ज़रूरी नहीं कि हर एक ‘बायो-बेस्ड’ प्रोडक्ट पर्यावरण के अनुकूल हो।

स्कूल से लेकर हाउसिंग सोसाइटी तक चल रहा है ख़ुशी का अभियान

बायो-डिग्रेडेबल प्लास्टिक को गलने के लिए सूक्ष्म जीव जैसे कि बैक्टीरिया, एल्गी, फंगस आदि की मदद की ज़रूरत होती है। लेकिन इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा, इसके बारे में कोई निश्चित रूप से नहीं बता सकता। इसके अलावा, गलने के बाद भी यह प्लास्टिक पर्यावरण में कुछ हानिकारक तत्व छोड़ जाता है। साथ ही, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह के प्लास्टिक को लैंडफिल में डालना और अधिक खतरनाक होता है, क्योंकि बिना ऑक्सीजन के प्रॉसेसिंग के दौरान इससे मीथेन जैसी हानिकारक गैस निकलती है।

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हर एक कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग बायोडिग्रेडेबल भी होता है, पर हर एक बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक कम्पोस्टेबल हो, ये बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं।

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए ख़ुशी ने ‘I am Not Plastics’ (imnp) अभियान की शुरुआत की। इस अभियान का उद्देश्य लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा बायो-कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग इस्तेमाल करने के लिए जागरूक करना है और यदि कोई यह बैग नहीं खरीद सकता तो उन्हें प्लास्टिक बैग्स री-यूज़ करने के लिए प्रेरित करना है। ख़ुशी का कहना है, “प्लास्टिक बैग्स के री-यूज़ से भी हम बहुत हद तक प्लास्टिक कचरे पर रोक लगा सकते हैं।”

अगर लोग कॉर्नस्टार्च जैसे जैविक उत्पादों से बने प्लास्टिक बैग इस्तेमाल करें, तो इससे हमें प्लास्टिक के लिए पेट्रोल पर निर्भर नहीं होना पड़ेगा और हम ज़्यादा से ज़्यादा ईंधन बचा पायेंगे।

अलग -अलग राज्यों में पहुँच रही है पहल

ख़ुशी ख़ुद ऐसे परिवार से हैं जिनका प्लास्टिक मशीनरी का बिज़नेस है। पिछले 55 सालों से उनका परिवार प्लास्टिक मैन्युफैक्चरिंग मशीन बना रहा है। पर ख़ुशी के स्कूल के एक प्रोजेक्ट ने उनका नज़रिया बदल दिया। अब उनका परिवार भी अपने बिज़नेस में ऐसे बदलाव कर रहा है, जिससे पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो।

ख़ुशी ने बताया कि अपने अभियान के लिए उन्होंने ऐसे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का पता किया, जो कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग बनाती हैं। इन लोगों से बात करके उन्हें पता चला कि हमारे यहाँ इन बैग्स की कीमत काफ़ी ज़्यादा है। यदि किसी किराना स्टोर वाले को एक किलोग्राम कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग खरीदने हों, तो उसकी लागत उसे लगभग 600 रुपए पड़ेगी। यही सबसे बड़ी वजह है कि हमारे यहाँ कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग चलन में नहीं हैं।

पर ख़ुशी ने एक प्लास्टिक बैग सप्लायर ‘नरेन्द्र प्लास्टिक्स’ से अपने अभियान के बारे में बात की और उनसे मदद मांगी। नरेन्द्र प्लास्टिक्स सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा सर्टिफाइड प्लास्टिक बैग सप्लायर है। नरेन्द्र प्लास्टिक्स के संचालकों ने ख़ुशी के अभियान में उसका साथ देने की पहल की और कम से कम मूल्य पर कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग सप्लाई करने के लिए मान गये।

नरेन्द्र प्लास्टिक्स ये बैग ‘नोबल केमिस्ट’ स्टोर को सप्लाई करते हैं। नोबल केमिस्ट भी ख़ुशी के अभियान से जुड़े हुए हैं। इस पहल से प्रभावित होकर नोबल केमिस्ट ने अपने यहाँ न सिर्फ़ कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग रखने का फ़ैसला किया, बल्कि उन्होंने अपने यहाँ अलग-अलग प्लास्टिक बैग्स के बारे में समझाने के लिए पोस्टर और पैम्फलेट भी रखे हुए हैं।

नोबल केमिस्ट के अलावा शहर का मशहूर ‘दी बैला कॉफ़ी’ आउटलेट भी उनकी मदद के लिए आगे आया है। ख़ुशी की कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को वे इन बैग्स के बारे में जागरूक कर पाएं। इस अभियान में उन्हें उनके परिवार और दोस्तों का पूरा समर्थन मिल रहा है।

अंत में ख़ुशी सिर्फ़ इतना ही कहती हैं, “आज प्लास्टिक के चलते जो भयानक स्थिति पैदा हुई है, उसके ज़िम्मेदार हम ख़ुद हैं। इसलिए अब ये हमारी ही ज़िम्मेदारी है कि हम इस स्थिति को बदलने के लिए कुछ करें और मैं वही कर रही हूँ।”

ख़ुशी को अपनी आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दाखिला मिला है और कुछ ही दिनों में वे अपनी पढ़ाई के लिए वहाँ चली जाएंगी। पर उनके जाने के बाद भी यह अभियान नहीं रुकेगा। ख़ुशी कहती हैं कि उनके जाने के बाद उनका भाई और उनके कुछ दोस्त इस अभियान को जारी रखेंगे।

यदि आप भी ख़ुशी के अभियान से जुड़ना चाहते हैं तो यहाँ पर क्लिक करें। अगर आप ‘बायो-कम्पोस्टेबल प्लास्टिक बैग’ खरीदना चाहते हैं तो पॉल्यूशन बोर्ड द्वारा सर्टिफाइड वेंडर्स की लिस्ट यहाँ पर देख सकते हैं

कैसे करें ‘बायोकम्पोस्टेबल प्लास्टिक’ की पहचान:

संपादन: मनोज झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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