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होटल में हुआ घाटा तो शुरू किया ठेला; अब केवल रु. 25 में रोज़ 500 लोगों को खिलाती हैं भरपेट खाना

दिन में 15 घंटे से भी ज़्यादा काम करने वाली श्वेता न सिर्फ़ महिलाओं के लिए बल्कि हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो हालातों से घबराकर सच्चाई से भागने की कोशिश करता है।

र्नाटक के बंगलुरु में एक फ़ूड कार्ट चलाने वाली चंद्रा श्वेता कभी डिप्रेशन का शिकार थीं। कई बार उनके मन में खुद की जान लेने के ख्याल भी आते थे। पर श्वेता ने हार नहीं मानी, बल्कि एक बार फिर अपनी बिखरी हुई ज़िंदगी को नए सिरे से समेटना शुरू किया। और अब धीरे-धीरे ही सही पर उनकी ज़िंदगी का सफ़र खूबसूरत हो चला है।

दिन में 15 घंटे से भी ज़्यादा काम करने वाली श्वेता न सिर्फ़ महिलाओं के लिए बल्कि हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो हालातों से घबराकर सच्चाई से भागने की कोशिश करता है। ऐसे हर शख्स को श्वेता से सीखना चाहिए कि कैसे मेहनत और दृढ़-संकल्प से अपनी ज़िंदगी की बागडोर आप अपने हाथ में ले सकते हैं।

द लॉजिकल इंडियन के साथ श्वेता ने अपनी कहानी साझा करते हुए बताया कि उनके परिवार का आंध्र-प्रदेश के तिरुपति में होटल का बिज़नेस था और काफ़ी अच्छा चल रहा था। पर कुछ निजी कारणों के चलते उन्हें बिजनेस में बहुत घाटा हुआ। घर में आर्थिक तंगी हो गयी और श्वेता खुद डिप्रेशन में चली गयीं।

अपनी ज़िंदगी को फिर से संभालने के लिए वे साल 2017 में अपने पति, अपनी बूढ़ी माँ और चार साल की बेटी के साथ बंगलुरु आकर बस गयीं। और यहाँ पर उन्होंने अपना एक फ़ूड कार्ट शुरू करने का फ़ैसला किया। एक छोटा-सा खाने का स्टॉल, उनके बड़े होटल के सामने कुछ नहीं था, पर अब कहीं से तो शुरू करना ही था।

पति और बेटी के साथ चंद्रा श्वेता

यहाँ वे किराए के घर में रह रहे हैं और साथ ही एक और छोटा-सा कमरा उन्होंने किराए पर लिया है, जहाँ श्वेता और उनके पति खाना बनाते हैं। उनका दिन सुबह 3:30 बजे से शुरू होता है। साफ़-सफाई करके सबसे पहले नाश्ता बनाया जाता है। नाश्ते के लिए वे इडली, दोसा, मसाला वडा, फ्राइड राइस, पूरी, चटनी और सांभर बनाते हैं।

साथ ही, लंच के लिए भी सुबह ही तैयारी कर दी जाती है जैसे कि दाल भिगोना, सब्ज़ियाँ काटना आदि।

सुबह 6:30 बजे वे अपनी कार्ट पर पहुँचते हैं और 7 बजे से उनके यहाँ ग्राहक आना शुरू हो जाते हैं। सामान्य दिनों में उनके पास लगभग 300 ग्राहकों की भीड़ होती है, जब कि शनिवार-रविवार को करीब 500 लोग यहाँ खाना खाने आते हैं। दोपहर 12 बजे तक वे नाश्ता देते हैं और इसके बाद उनके पास एक घंटा होता है दोपहर का खाना तैयार करने के लिए।

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दोपहर एक बजे से वे दोपहर का खाना परोसना शुरू कर देते हैं। इसमें वे चपाती, दो तरह के चावल, दाल, अलग-अलग सब्ज़ियाँ, रागी बॉल्स आदि देते हैं। इस समय भी उनके यहाँ कम से कम 200 तक ग्राहक आते हैं। श्वेता कहती हैं कि उनके लिए ग्राहक उनके भगवान हैं, फिर वह चाहे कोई मजदूर हो या फिर कोई ऑफिस जाने वाला। उनकी कोशिश यही रहती है कि वे उचित दाम में अच्छा खाना दे सकें।

उनके यहाँ ब्रेकफास्ट 15 रूपये तो वहीं लंच 25 रूपये में दिया जाता है। पैसों से भी ज़्यादा श्वेता और उनके पति लोगों की दुआएं कमाने में यकीन रखते हैं। इसीलिए तो उनके सभ्य स्वभाव के चलते कई ग्राहकों ने उनकी बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाने की इच्छा व्यक्त की है।

अपने फ़ूड कार्ट पर श्वेता

आगे वह बताती हैं कि एक बार जब उनकी बेटी बीमार पड़ गयी थी, तो एक डॉक्टर (जो कि उनकी नियमित ग्राहक है) ने बिना किसी फीस के उनकी बेटी का चेक-अप किया और मुफ़्त दवाइयां भी दीं। श्वेता सिर्फ़ सातवीं कक्षा तक पढ़ी हैं, तो वहीं उनके पति दसवीं पास हैं। इसलिए वे चाहती हैं कि वे अपनी बेटी को अच्छे से अच्छा भविष्य दें और सिर्फ़ उसी के लिए वे दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। जल्द ही उनका प्लान है कि वे अपना एक छोटा-सा होटल शुरू करें।

बेशक, इस माँ का हौसला और जुनून काबिल-ए-तारीफ़ है। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही उनका होटल खुलेगा और उनकी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी।

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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