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इंदिरा गाँधी से लेकर ऐश्वर्या राय तक ने पहनी हैं इस छोटे से टापू पर बसे गाँव में बनी साड़ियाँ !

इन साड़ियों को पहली बार तब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली, जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन्हें पहनना शुरू किया। इन साड़ियों को बनाने वाले कई कारीगरों को भारत के नागरिक पुरस्कार भी मिल चुके हैं।

डिशा एक खूबसूरत राज्य है। नदियाँ, जंगल, मिलनसार लोग, बेहतरीन सामिष-निरामिष भोजन। ओडिशा के पर्यटन स्थलों का चक्कर लगाते हुए मुझे एक बहुत ही ऑफबीट जगह के बारे में पता चला। मेरे एक स्थानीय दोस्त ने बताया कि बौध जिले में महानदी के बीचोबीच एक टापू है, जिसका नाम है मरजाकुद। इस टापू पर एक पूरा गाँव बसा हुआ है। इस गाँव में बिजली भी है और छोटा-सा स्कूल भी। गाँव में जाने का एक ही रास्ता है और वह है महानदी से होकर। नदी के किनारे खड़ी छोटी-छोटी नावों से आप इस टापू पर जा सकते हैं। यह सब सुनने में ही इतना मोहक लग रहा था कि वहाँ पहुँच जाने पर कितना मजा आएगा, यह सोचकर ही मैं बहुत उत्साहित हो गई। 

महानदी के बीचो-बीच बसे मरजाकुद टापू पर बसा है यह गाँव

 

सुबह-सुबह ही मैं निकल पड़ी। दूर तक फैली महानदी बड़ी-बड़ी चट्टानों से होकर उछलती हुई बह रही थी। एक नाव से जल्द ही उस टापू पर पहुँच गई। जब गाँव के अंदर गई तो देखा कि एक घने पेड़ के नीचे पुरुषों की मंडली जमी थी। बच्चे लकड़ी की बैलगाड़ी से खेल रहे थे। कुछ औरतें हैंडपंप से पानी भर रही थीं। आगे बढ़ी तो तकरीबन हर घर में एक खास तरह की साड़ी फैली नजर आई। पूछने पर पता चला कि ये सम्बलपुरी साड़ियाँ हैं। ओडिशा की शान। यह भी पता चला कि ऐश्वर्या राय को ये साड़ियाँ काफी पसंद हैं। उन्होंने अपनी शादी के एक समारोह में इसे पहना भी था। 

संबलपुरी साड़ी

एक घर में झाँककर देखा, तो वहाँ पर लकड़ी की बनी एक मशीन थी, जिस पर अधेड़ उम्र का एक आदमी धागा कात रहा था। उनका नाम परमेश्वर था। परमेश्वर सम्बलपुरी साड़ियाँ बनाने वाले कारीगर हैं। दरअसल, इस कारीगरी ने एक कला का रूप ले लिया है, इसलिए इन्हें कलाकार कहना ही सही होगा। वे बड़े ही करीने से अलग-अलग रंगों के धागे डिजाइन के मुताबिक मशीन से कातते जा रहे थे।

परमेश्वर

 

परमेश्वर ने बताया, “सम्बलपुरी साड़ियाँ यहाँ के लोगों की आय का मुख्य साधन हैं और इस क्षेत्र की पहचान भी। लेकिन इन्हें तैयार करने में काफ़ी समय लगता है। एक सम्बलपुरी साड़ी को बनाने में अगर एक पूरा परिवार भी जुटता है, तो कम से कम तीस से चालीस दिन लग जाते हैं।

 

बगल की खिड़की से देखा तो दो औरतें उधर भी साड़ियों को अंतिम रूप देने में लगी थीं। वे दोनों परमेश्वर के परिवार की ही थीं। उनमें से युवा महिला से, जिनका नाम रूपवंती था, मैंने इस व्यवसाय के नफे-नुकसान के बारे में पूछा।

उन्होंने बड़े संतोष के साथ बताया, “हमें ये साड़ियाँ बनाना बहुत पसंद है। बाजार और मेले में हम लोग अपनी बनाई हुई साड़ियाँ ले जाते हैं। हम लोगों का रहन-सहन साधारण है। हमें इससे अपना परिवार अच्छे से चलाने के लिए पैसे मिल जाते हैं। कभी-कभी बड़े मेले में जाते हैं तो दिल्ली-मुम्बई के भी ग्राहक मिलते हैं।

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अपनी बनाई साड़ी दिखाती रूपवंती

 

सम्बलपुरी साड़ियों में ज़्यादातर पारम्परिक जैसे शंख, चक्र, पुष्प, पुरी के जगन्नाथ भगवान की डिजाइन होती है। लेकिन अब इनमें भी काफी प्रयोग होने लगे हैं। ज्यामितीय आलेखन, पशु-पक्षी, किसी कविता की पंक्तियाँ भी इस्तेमाल की जा रही हैं। खास बात यह है कि इन साड़ियों को बुनने से पहले धागों को टाई डाई किया जाता है। रेशम और सूती, दोनों ही धागों से साड़ियाँ बनती हैं। 

कातने के लिए एक हथकरघा

इन साड़ियों को ओडिशा के बाहर पहली बार तब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली, जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन्हें पहनना शुरू किया। सम्बलपुरी साड़ियाँ बनाने वाले कई कारीगरों को भारत के नागरिक पुरस्कार भी मिल चुके हैं। सम्बलपुरी साड़ियों का गढ़ है पूरा पश्चिमी ओडिशा। इस इलाके के 6 जिले सम्बलपुर, सोनपुर, बारगढ़, ब्रह्मापुर, बालांगीर और बौध सम्बलपुरी साड़ियों के केंद्र रहे हैं।

 

जब मैं आगे बढ़ी तो एक वृद्ब दंपत्ति धागों को डाई करने के लिए पानी खौला रहा था। उन्होंने धागों का एक बड़ा लच्छा बना लिया था, जिसे अब गर्म रंगीन पानी में डुबोना था। पूरी तरह से रंग जाने के बाद धागों को पानी से निकाल कर सूखने के लिए रख दिया जाता है। फिर इन अलग-अलग रंगों के धागों को एक-एक करके साड़ियों में पिरोया जाता है। मैं साड़ियाँ तैयार करने की प्रकिया को देखने में पूरी तरह रम चुकी थी। इतनी खूबसूरत साड़ियों और लोगों के बीच बहुत ही अच्छा लग रहा था। मैंने बूढ़े दादा से उनका नाम जानना चाहा, लेकिन उन्हें हिंदी ठीक तरह से समझ में नहीं आती थी और दादी तो बिल्कुल हिंदी नहीं जानती थीं। दादा ने टूटी-फूटी हिंदी में बताया कि दीवार पर फैली हुई जो साड़ी है, वह उन दोनों ने मिलकर काती है।

 

इस दंपत्ति से मिलने के बाद मैं गाँव के दूसरे छोर पर गई। रास्ते भर हमें सुरमई रंगों और बेहतरीन डिजाइन वाली साड़ियाँ देखने को मिलीं। एक घर में रुककर इन साड़ियों का दाम पूछा तो पता चला कि पांच सौ से लेकर पचास हजार और उससे भी ज्यादा कीमत की साड़ियाँ मौजूद हैं। कीमत साड़ी पर की गई मेहनत और धागों की क्वालिटी पर आधारित होती है। लेकिन इस गाँव में ज्यादातर लोग सामान्य वर्ग के लिए ही साड़ी बनाते हैं, क्योंकि उसकी मांग ज्यादा है। 

तैयार होती एक सम्बलपुरी साड़ी

जो नाविक हमें इस गाँव में लेकर आया था, वह भी अब खा-पीकर वापस आ गया था। उसने बताया कि पूरे पश्चिमी ओडिशा में इन साड़ियों को बनाने वाले कलाकार हैं। सोनपुर जिला तो इस कला का गढ़ है। मुझे ये सब जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि कैसे एक कला न केवल जीविकोपार्जन का साधन बन रही है, बल्कि एक पूरे इलाके की पहचान भी बन गई है। गाँव वालों को धन्यवाद देकर मैं नदी के इस पार शहर में आ गई। आपको भी अगर इन खूबसूरत सम्बलपुरी साड़ियों को लेना है तो ऑनलाइन शॉप्स बोयानिका, गोकूप और इसी तरह के अन्य पोर्टल्स से खरीद सकते हैं। या फिर अगर ओडिशा घूमने जाएं तो यहाँ की स्थानीय दुकानों से खरीद सकते हैं।

संपादन – मनोज झा 


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