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पुरानी किताबों के बदले हेल्मेट; दोस्त की मौत ने बनाया इस इंजीनियर को ‘हेल्मेट मैन’!

मारे देश में आपको अनगिनत लोग बिना हेल्मेट के दोपहिया वाहन चलाते दिखेंगे। सड़क पर गलत दिशा में गाड़ी चलाना, लाल बत्ती फांदकर निकलना और ट्रैफ़िक नियमों की अवहेलना तो मानो आम बात है। आए दिन अख़बारों में छोटी-सी लापरवाही से हुई सड़क दुर्घटना और मौत की ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं।

जरा सोचिए उन परिवारों के बारे में, जो इन हादसों में अपनों को खो देते हैं। उनकी ज़िंदगी में कितना खालीपन आ जाता है। लेकिन अगर लोग चाहें तो ऐसे हादसों से सीख लेकर बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं, जैसे उत्तर प्रदेश के नोएडा में रहने वाले राघवेंद्र कुमार ने किया।

साल 2014 में राघवेंद्र के दोस्त और रूम पार्टनर कृष्ण कुमार ठाकुर की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। कृष्ण बाइक पर कहीं जा रहे थे और पीछे से किसी बड़े वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी। कृष्ण ने उस वक़्त हेल्मेट नहीं पहन रखा था। इस वजह से उनके सिर में गंभीर चोट आई और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए कृष्ण के दोस्त राघवेंद्र ने कहा, “अस्पताल में कृष्ण की मौत के बाद जब डॉक्टरों से मेरी बात हुई, तो उन्होंने कहा कि अगर तुम्हारे दोस्त ने हेल्मेट पहना होता तो शायद वह बच जाता।” इस बात ने राघवेंद्र को सोचने पर मजबूर कर दिया। सबसे ज़्यादा दुख उन्हें तब हुआ, जब वे कृष्ण के माता-पिता से मिले।

‘हेल्मेट मैन’ राघवेंद्र कुमार

वह उनका इकलौता बेटा था। उसके माँ-बाप के लिए तो जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया था। राघवेंद्र ने बताया, “वे लोग मानसिक तौर पर बुरी तरह टूट चुके थे। उनकी इस हालत ने मुझे अंदर तक हिला दिया और बस तभी से मैंने इसे लेकर कुछ करने की ठान ली।“

मूल रूप से बिहार के कैमूर जिला के रहने वाले 32 वर्षीय राघवेंद्र उस समय नोएडा में एक मल्टीनेशनल कंपनी में बतौर इंजीनियर काम कर रहे थे। उन्होंने हर शनिवार और रविवार वहीं आस-पास की जगहों पर जाकर लोगों को हेल्मेट बांटना शुरू कर दिया। ट्रैफ़िक सिग्नल पार करते समय जो भी उन्हें बिना हेल्मेट के दिख जाता, वे उसे जाकर मुफ़्त हेल्मेट देते और साथ ही बाइक चलाते वक़्त हेल्मेट पहनने की सलाह भी।

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इस तरह, उन्होंने अब तक क़रीब 20, 450 हेल्मेट बांटे हैं और अभी भी यह सिलसिला जारी है। पर पिछले दो सालों से उनके हेल्मेट बांटने के तरीके में काफ़ी बदलाव आया है। उन्होंने अपनी इस पहल को एक और नेक काम के साथ जोड़ लिया है।

वे कहते हैं, “जब मैं अपने दोस्त के माता-पिता से मिलने के लिए उनके घर गया था, तो उसकी कुछ किताबें अपने साथ ले आया था। वो किताबें मैंने एक ज़रूरतमंद बच्चे को दे दी। इसके बाद मैं हेल्मेट बांटने के काम में लगा रहा। पूरे दो साल तक मैंने मुफ़्त हेल्मेट बांटे। फिर साल 2017 में मुझे एक कॉल आई। यह कॉल उस बच्चे की माँ की थी, जिसे मैंने कृष्ण की किताबें दी थीं।”

बच्चे की माँ ने राघवेंद्र को बताया कि उन किताबों की मदद से उनका बेटा न सिर्फ़ ठीक से पढ़ सका, बल्कि उसने स्कूल में टॉप भी किया। इसलिए वह सबसे पहले उन्हें फ़ोन कर रही हैं, क्योंकि यह सिर्फ़ उनके किताबें दे पाने की वजह से ही संभव हो पाया।

उस बच्चे की माँ की बातें सुनकर राघवेंद्र के दिल को सुकून मिला। उनके ज़ेहन में यह विचार आया कि अगर हर ज़रूरतमंद बच्चे को समय पर किताबें मिलती रहें, तो बेशक बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। फिर उन्होंने इस विचार को एक बड़े अभियान का रूप दे दिया। उन्होंने संकल्प किया कि अब वे हेल्मेट मुफ़्त में नहीं, बल्कि किताबों के बदले देंगे।

जिस किसी के भी पास पुरानी किताबें हैं और जो अब उनके काम की नहीं हैं, वह शख्स वो किताबें राघवेंद्र को देकर उनसे हेल्मेट ले सकता है। राघवेंद्र ने बताया कि इस तरह वे उन बच्चों तक किताबें पहुँचाने लगे, जिन्हें उनकी ज़रूरत है, पर खरीदने के पैसे नहीं हैं। स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक, सभी तरह की किताबें हैं उनके पास।

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राघवेंद्र बताते हैं, “जो भी मुझे पुरानी किताबें लाकर देता है, मैं उसे ही हेल्मेट देता हूँ। फिर इन किताबों को हम ज़रूरतमंद बच्चों में बांट देते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि अब मेरी इस मुहिम से स्कूल-कॉलेज के छात्र भी जुड़ने लगे हैं। वे न सिर्फ़ मुझसे किताबें लेते हैं, बल्कि अपनी इस्तेमाल की हुई पुरानी किताबें दूसरों के लिए देते भी हैं। अपने स्कूल-कॉलेज में वे ‘किताब दान अभियान’ आयोजित करके मेरे लिए बहुत-सी किताबें इकट्ठा भी कर देते हैं।”

इतना ही नहीं, अलग-अलग जगहों पर जो रिक्शावाले और दिहाड़ी मजदूर उनसे मिलते हैं, वे उनसे इस तरह हेल्मेट बांटने का कारण पूछते हैं। उनकी कहानी सुनने के बाद वे भी उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं। कबाड़ी वाले से या फिर किसी से लेकर वे किताबें इकट्ठा करके राघवेंद्र तक पहुँचाते हैं।

पटना, वाराणसी, नोएडा, दादरी, जेवर, हरिद्वार आदि को मिलाकर देश के कुल 23 शहरों में उन्होंने ‘बुक डोनेशन बॉक्स’ लगाए हैं। जो कोई भी इन शहरों में उनकी मदद करना चाहता है, इन बॉक्स में किताबें डाल जाता है। आज उनके साथ अलग-अलग जगहों के 200 से भी ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं और इस मुहिम में उनका साथ दे रहे हैं।

राघवेंद्र अलग-अलग स्कूलों में जाकर भी स्टूडेंट्स को ट्रैफ़िक नियमों का पालन करने के लिए और हर साल नई किताबें खरीदने की जगह एक-दूसरे से किताबें लेकर पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। वे बच्चों, उनके माता-पिता और अध्यापकों को समझाते हैं कि अपने बच्चों की पुरानी किताबों को रद्दी में फेंकने के बजाय किसी ज़रूरतमंद बच्चे को दें। साथ ही, खुद भी नई कक्षा की किताबें किसी और पास आउट बच्चे से ले लें।

राघवेंद्र कहते हैं, “एक तरफ जहाँ गरीब माता-पिता और बच्चे इस तरह की पहल से खुश हैं और हर दिन मुझे दुआएं देते हैं, तो वहीं प्राइवेट स्कूलों में मेरे इस अभियान को लेकर एक नाराजगी भी है। इसलिए बहुत बार कई स्कूल मुझे अपने यहाँ सेमिनार करने की इजाजत भी नहीं देते हैं।”

किताबों के बदले हेल्मेट देने की उनकी कोशिश अब रंग ला रही है। अब जो कोई भी उनके पास हेल्मेट लेने आता है, तो वह पहले से ही किताबें लेकर आता है। राघवेंद्र को उन्हें इसके बारे में बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। इस बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले एक फ़ूड डिलिवरी एजेंट किताबों के बदले उनसे हेल्मेट लेकर गया। उस लड़के के पास अपनी कोई किताब नहीं थी और उसे हेल्मेट की भी ज़रूरत थी। वह बिना किताब दिए हेल्मेट नहीं लेना चाहता था। इसलिए उसने हर उस घर से किताबें इकट्ठा करना शुरू किया, जहाँ वह खाने की डिलिवरी करने जाता। वह अपने ग्राहकों को इस मुहिम के बारे में बताता और इस तरह बहुत से लोगों ने उसे पुरानी किताबें दीं। फिर वह आकर हेल्मेट लेकर गया।

 

राघवेंद्र की कोशिश है कि एक दिन ऐसा आए, जब हर एक बच्चे के पास पढ़ने के लिए किताबें हों और कोई भी व्यक्ति बिना हेल्मेट के दुपहिया वाहन नहीं चलाए। इस अभियान के लिए उन्होंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी है और ख़ुद को सिर्फ़ इसी काम के लिए समर्पित कर दिया है।

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राघवेंद्र के इस निःस्वार्थ काम से प्रभावित होकर बिहार सरकार ने उन्हें सम्मानित किया है और ‘हेल्मेट मैन’ का संबोधन दिया है। इसके आलावा, नोएडा शहर के प्रशासनिक अधिकारियों ने भी उनका साथ देते हुए नोटिस निकाला है कि यदि किसी ने हेल्मेट नहीं पहना है तो पेट्रोल पंप पर उसके दुपहिया वाहन में पेट्रोल नहीं भरा जाएगा।

अंत में ‘हेल्मेट मैन’ राघवेंद्र बस यही कहते हैं, “मेरी लगातार कोशिश है कि ऐसा कोई नियम बने, जिससे बिना हेल्मेट पहने हुए कोई भी शख्स टोल पार नहीं कर पाए। यदि हम पूरे देश में ऐसा कर पाएं तो निश्चित तौर पर लोगों की मानसिकता में बदलाव आएगा। इसके अलावा, मेरी गुज़ारिश है कि दूरी चाहे छोटी हो या बड़ी, पर हेल्मेट पहनकर ही बाइक चलाएं। साथ ही, किसी ख़ास अवसर पर हेल्मेट उपहार स्वरूप देने की रिवायत शुरू करनी चाहिए।”

आज भी राघवेंद्र समय-समय पर अपने मरहूम दोस्त कृष्ण के माता-पिता को फ़ोन करके उनका हालचाल पूछते रहते हैं। वे लोग राघवेंद्र के इस काम से बहुत खुश हैं और चाहते हैं कि उनका यह काम पूरे देश में फैले।

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है और आप किसी भी तरह से राघवेंद्र कुमार की मदद कर सकते हैं, तो 8510006477 नंबर पर संपर्क करें।

संपादन: मनोज झा 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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