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ऐ, तुम्हारा पियानो कहाँ है?

ऐ, तुम्हारा पियानो कहाँ है?

वे सच्ची ख़ुशी चाहते हैं. वे नृत्यरत होना चाहते हैं, वे जीवन का गीत गाना चाहते हैं. इस दुनिया को ऐसे लोग ही सुन्दर बनाते हैं.

चपन स्कूल की भागदौड़ में कट गया. फिर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी का दौर चला. नौकरी मिल भी गयी आख़िरकार. फिर शादी हुई, बच्चे, माँ-बाप की तबीयत, बच्चों की पढ़ाई, छोटे-मोटे शौक़, थोड़ा घूमना फिरना, एक अदद घर बना लिया, थोड़ा इन्वेस्टमेंट कर लिया, बुढ़ापा जैसे-जैसे आता गया स्वास्थ्य की ओर ध्यान बढ़ा दिया. फिर सब छोड़-छाड़ कर दुनिया से चले गए.

 

इस वक्तव्य में थोड़ा बहुत जोड़-घटाना कर दो, तो यही है न आम आदमी की कहानी? इसी बीच इश्क़ भी हुआ, टीवी-फ़िल्म-इंटरनेट-फ़ोन पर मनोरंजन भी, सामाजिक-सरोकारों का निबटारा, दोस्तियाँ निभीं, रिश्ते टूटे, जन्मदिन मने, घुटने भी फूटे, त्यौहार आए, सरकारें गिरीं, भगवान् रूठे.. देखते-देखते कट गयी.

 

यही आम आदमी की कहानी है.

वहीँ कुछ लोग हैं जिनमें एक तड़प है. यही होता है तो आख़िर ये होता क्यूँ है? जैसे सवाल हैं. मैं यहाँ किसलिए हूँ? मैं कौन हूँ. मेरी ज़िन्दगी का मकसद क्या है? वे खोज में हैं.. वे ऊपर लिखी कहानी की तरह एक कीड़ों-मकोड़ों जैसी, पिंजरे में फंसे पंछी जैसी, असेंबली लाइन की तरह पूर्व-परिभाषित ज़िन्दगी नहीं चाहते. वे सच्ची ख़ुशी चाहते हैं. वे नृत्यरत होना चाहते हैं, वे जीवन का गीत गाना चाहते हैं. इस दुनिया को ऐसे लोग ही सुन्दर बनाते हैं.

 

आप कहीं पहुँचे या नहीं इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता, आप सफ़र में हैं यह महत्वपूर्ण बात है. आप की खोज का परिणाम क्या निकला यह भी कई बार मायने नहीं रखता, आपकी खोज करने की प्रवत्ति ज़्यादा मज़ेदार ज़िन्दगी दे जाती है आपको. इस विषय पर कितना कुछ लिखा है. भारतीय संस्कृति के शठ-दर्शन से ले कर पश्चिमी विचारकों ने बहुत कुछ लिखा है. समस्या यह है कि इतना ज़्यादा लिखा-कहा गया है कि यह विषय ही जटिल और उलझा हुआ प्रतीत होता है अब.

 

यही चर्चा चल रही थी डैन ब्रैमर से जो जीवन भर संगीतकार रहे हैं, साथ में बुद्धिस्ट भी हैं कि कैसे धर्म की परिकल्पना के साथ खिलवाड़ हो रहा है- होता रहा है. कैसे सभ्यता के इस उल-जलूल मोड़ पर एक असेंबली लाइन की तरह चलते जाना हो कर रह गया है. ज़िम्मेदारियों, तनाव, ख़ुद की खड़ी की हुई उलझनों के दबाव में आम इंसान मुरझाया सा नज़र आता है. सभी के कन्धों पर बोझ, सीने पर दुखों का पहाड़ दिखाई देता है..

 

हमारी एक सुस्त सी फ्लोरिडा की दोपहर में लम्बी चर्चा के दौरान डैन ने एक छोटी सी मज़ेदार बात कही जो मुझे हिंदी-कविता/ उर्दू स्टूडियो के दर्शकों और ‘शनिवार की चाय’ के पाठकों के बीच में वैसी की वैसी लाने का लालच हुआ. लीजिये आप भी मिलिए डैन ब्रैमर, द पियानोमैन से और अपने आपसे पूछिए कि आपका पियानो कहाँ है?

 


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“NOTE: The views expressed here are those of the authors and do not necessarily represent or reflect the views of The Better India.”

मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.
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