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इस महिला ने नक्सलबाड़ी में बनाया दुनिया का दूसरा ‘एलीफैंट फ्रेंडली’ ऑर्गेनिक टी एस्टेट!

आज नक्सलबाड़ी चाय बागान की जैविक चाय दूसरे देशों में एक्सपोर्ट होती है। लगभग 4, 000 लोगों को इससे रोज़गार मिल रहा है।

सम के उदालगुरी जिले में जैविक चाय किसान तेनजिंग बोदोसा के फार्म को दुनिया का सबसे पहला ‘एलीफैंट फ्रेंडली’ फार्म होने का सर्टिफिकेट मिला था। इसके बाद अब दार्जिलिंग में स्थित एक चाय बागान को ‘एलीफैंट फ्रेंडली’ होने ख़िताब मिला है।

यह बागान है नक्सलबाड़ी टी एस्टेट। यह पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में नक्सलबाड़ी गाँव के पास 1200 एकड़ में फैला हुआ है। बागान की डायरेक्टर और एक सिंगल मदर सोनिया जब्बार बताती हैं कि उनका यह बागान न सिर्फ़ एलीफैंट फ्रेंडली है, बल्कि हर तरह से जानवरों और पेड़-पौधों के प्रति संवेदनशीलता और प्रेम का संदेश देने वाला है।

नक्सलबाड़ी चाय बागान की एक झलक

सोनिया जब्बार अपने बागान के एक हिस्से में ‘जैविक चाय’ भी उगा रही हैं। उनका उद्देश्य जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना है, ताकि ज़मीन और पर्यावरण को संरक्षित किया जा सके। अपने इस बागान को एक अलग पहचान और यहाँ के कर्मचारियों को बेहतर भविष्य देने के लिए सोनिया ने अपनी ऐशो-आराम की ज़िंदगी को छोड़ दिया। विदेश से पढ़ाई करने के बाद उनके लिए बेहतरीन करियर के कई मौके उपलब्ध थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने दार्जिलिंग आकर जैविक खेती करने का फ़ैसला किया।

प्रकृति के प्रति समर्पण और यहाँ के लोगों के लिए प्रेम का भाव सोनिया को विरासत में मिला है। यह विरासत पांच पीढ़ियों की है, जिसे वह पूरी ईमानदारी और मेहनत से आगे बढ़ा रही हैं।

सोनिया जब्बार

पांच पीढ़ियों की विरासत

सोनिया जब्बार जलपाईगुड़ी के नवाब खान बहादुर मुशर्रफ हुसैन की वंशज हैं। 19वीं सदी के उतरार्ध में जन्मे नवाब साहब पेशे से वकील थे, लेकिन उनका असल जुनून था चाय की खेती।

चाय के लिए उनका जुनून इस कदर था कि उन्होंने असम से लेकर बंगाल तक चाय के 33 बागान लगाए। इनमें से साल 1884 में लगाया गया ‘नक्सलबाड़ी चाय बागान’ उनका सबसे प्रिय बागान था। नवाब साहब को सिर्फ़ उनके चाय-प्रेम के लिए नहीं, बल्कि उनकी दयालुता के लिए भी जाना जाता है।

नवाब साहब
दायीं तरफ नवाब साहब खड़े हुए हैं

साल 1943 में जब बंगाल में सूखा पड़ा, तो नवाब साहब ने हर संभव तरीके से लोगों की मदद की। आज भी उन्हें इसके लिए याद किया जाता है। शायद यही कारण है कि जब साल 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन शुरू हुआ, तो गाँव के गाँव तबाह हो गए, लेकिन नवाब साहब के बागान की तरफ किसी ने आँख उठाकर भी नहीं देखा।

नवाब साहब ने 1966 में आख़िरी सांस ली थी। उनके साथ ही उनकी शाही चाय का राज़ भी चला गया, क्योंकि उनकी मृत्यु के बाद दो दशकों में ही उनके वंशजों ने 33 में से 32 चाय बागानों को गंवा दिया। आख़िरी चाय बागान जो बचा, वह नक्सलबाड़ी का बागान था।

हालांकि, यह चाय बागान भी आज गुम हो चुका होता, अगर इसे बचाने के लिए नवाब साहब के खानदान की बहू और सोनिया जब्बार की माँ ललिता जब्बार ने अपने कदम नहीं बढ़ाए होते। सोनिया बताती हैं, “उस समय हम कोलकाता में रहते थे। मम्मी ने हमेशा से ही घर-परिवार संभाला था। किसी ने भी नहीं सोचा था कि वे एक दिन इतना बड़ा ‘टी एस्टेट’ संभालेंगी और वह भी खुद अपने दम पर।”

साल 1980 के आस-पास जब जब्बार परिवार ने फ़ैसला किया कि इस आख़िरी बागान को भी बेच दिया जाए, तो ललिता जब्बार ने आगे बढ़कर बागान को चलाने की ज़िम्मेदारी ली।

ललिता जब्बार, उन्हें सब प्यार से ‘डॉली’ बुलाते थे

उस समय न तो उन्हें इस बिज़नेस का कोई अनुभव था और न ही यह पता था कि वे कैसे बागान से कोई प्रॉफिट हासिल कर सकेंगी। पर किसी भी व्यावसायिक लाभ से ज़्यादा उन्हें यहाँ के पेड़-पौधों, जानवरों और कर्मचारियों की चिंता थी। उन्हें उन मज़दूरों की चिंता थी, जिनकी रोज़ी-रोटी इस बागान पर निर्भर थी।

सोनिया ने कहा, “मम्मी को हमेशा से गार्डनिंग का शौक था। उनकी दिलचस्पी खेती-बाड़ी में भी थी। बस उनका यही जुनून यहाँ काम आया। पापा के देहांत के बाद भी वे कमजोर नहीं पड़ीं। उन्होंने मुझे और मेरे भाई को संभालने के साथ-साथ बागान का काम देखना भी जारी रखा।”

उन्होंने पूरे 30 साल तक चाय बागान की ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभाई। बागान को ऋण-मुक्त किया, चाय की खेती के नए-नए तरीके अपनाए, पुरानी चाय फैक्टरी को अपग्रेड किया और नक्सलबाड़ी चाय बागान को दार्जिलिंग के तराई क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ चाय बागानों की कतार में ला खड़ा किया।

चाय की जैविक खेती की दिशा में एक पहल

साल 2010 में जब सोनिया ने ‘ऑर्गेनिक खेती’ का कोर्स करके जैविक चाय उगाने की इच्छा व्यक्त की, तो उनकी माँ ने ख़ुशी-ख़ुशी बागान का लगभग 12 एकड़ हिस्सा उन्हें दे दिया। सोनिया ने बताया, “वैसे तो उनके सलाहकारों और कई रिश्तेदारों ने ऐसा करने से मना किया और कहा कि जैविक खेती में कोई लाभ नहीं है। इससे बागान को चलाने में दिक्कत आएगी। लेकिन मम्मी को मुझ पर यकीन था कि मैं ज़रूर कुछ न कुछ कर लूँगी।”

सोनिया जब्बार

पहले दो साल सोनिया के लिए बहुत मुश्किल रहे। उनकी फसल पेस्ट-अटैक बिल्कुल भी नहीं झेल पा रही थी और पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल नहीं होने के चलते बर्बाद हो रही थी। पर तीसरे साल में उन्होंने काफ़ी बदलाव देखा। जहाँ बाकी बागान में फसल का बुरा हाल था, वहीं सोनिया के हिस्से में चाय की फसल बहुत ही बढ़िया हुई।

सोनिया ने बताया,

“आखिरकार मुझे सफलता मिली, लेकिन तब दुख सिर्फ़ इस बात का था कि मम्मी मेरे साथ नहीं थीं। साल 2011 में ही वे हम सबको छोड़कर चली गई थीं। मम्मी के जाने के बाद सब यही सोच रहे थे कि अब बागान कैसे संभलेगा। मेरे भाई को भी इसमें कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। उसने कहा कि अब हमें बागान को बेच देना चाहिए। पर मैं किसी भी कीमत पर माँ की मेहनत को बेकार नहीं जाने दे सकती थी और इसलिए मैंने इसे चलाते रहने का फ़ैसला किया।”

आज नक्सलबाड़ी चाय बागान की अंतरराष्ट्रीय पहचान है। उनकी जैविक चाय दूसरे देशों में एक्सपोर्ट होती है। लगभग 4, 000 लोगों को इससे रोज़गार मिल रहा है।

Promotion
वर्कर के साथ काम करते हुए सोनिया जब्बार

सोनिया ने दो बातों पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया। एक तो उनका उद्देश्य पूरे एस्टेट को जैविक बनाना था, दूसरा वे कहती हैं कि कृषि कोई उद्योग नहीं है और ज़मीन की अपनी कुछ सीमाएँ होती हैं। इसलिए ज़रूरी है कि उसे सही पोषण मिले। वे ज़मीन की उर्वरता को बढ़ाने के लिए नये तौर-तरीके अपनाने में विश्वास करती हैं।

साल 2012 में उन्होंने ‘ऑर्गेनिक सर्टिफिकेट’ के लिए अप्लाई किया था और साल 2016 में उनके बागान को ‘जैविक बागान’ होने का सर्टिफिकेट मिल गया। फिर भी यह काम बहुत आसान नहीं है। बड़ी-बड़ी चाय कंपनियों के मुकाबले जैविक चाय की मार्केटिंग बहुत बड़ी चुनौती है। अपनी जैविक चाय को लेकर वे दिल्ली और लखनऊ के ऑर्गेनिक बाज़ारों और प्रदर्शनियों में जाती हैं और वहाँ स्टाल लगाकर लोगों को जैविक चाय के बारे में बताती हैं। पिछले कुछ समय से जब उन्हें भारत में कोई ख़ास बाज़ार नहीं मिला तो उन्होंने विदेशों में जैविक चाय का एक्सपोर्ट शुरू किया है।

हाथी-साथी प्रोग्राम

नक्सलबाड़ी बागान के पूर्वी और पश्चिमी दिशा में जंगल हैं और यह नेपाल बॉर्डर को भी छूता है। यहाँ हाथियों से किसानों को काफी परेशानी होती है। हाथी मौसम के हिसाब एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। पिछले कुछ सालों में जंगलों से हाथियों का पलायन काफ़ी बढ़ गया है। इसलिए नेपाल बॉर्डर पर इलेक्ट्रिक फेंसिंग कर दी गई है, ताकि हाथी वहाँ जाकर फसलों को ख़राब न कर सकें। नक्सलबाड़ी चाय बगान के पास जो खेत हैं, वहाँ जाने पर भी किसान हाथियों को मारकर भगाते हैं, क्योंकि भोजन की तलाश में निकले ये हाथी उनकी फसलों को बर्बाद कर देते हैं।

यह देख कर सोनिया ने ‘हाथी-साथी प्रोग्राम’ की शुरुआत की। उन्होंने देखा कि उनके अपने बागान के लोग भी हाथियों के साथ बुरा बर्ताव करते हैं और उन्हें भगाते हैं, जबकि हाथी बहुत ही आराम से चलने वाले प्राणी हैं। हाथियों के साथ लगातार बढ़ते दुर्व्यवहार को देखकर सोनिया ने कुछ करने की ठानी और इसकी शुरुआत उन्होंने अपने बागान से ही की।

हाथी=साथी प्रोग्राम में बच्चों की रही अहम् भूमिका
ये सभी बच्चे बगान में काम करने वाले मजदूरों के हैं

उन्होंने सबसे पहले अपने कर्मचारियों में ‘जागरूकता अभियान’ शुरू किया और फिर उन्होंने यहाँ के वन विभाग के अधिकारियों से बात करके उन्हें भी अपने प्रोग्राम में शामिल किया। एक योजना बना कर उन्होंने सबसे पहले बागान के चौकीदारों को ट्रेनिंग दिलवाई। इसके बाद अन्य कर्मचारियों और स्वयंसेवकों को इस कार्यक्रम से जोड़ा गया।

सोनिया इस कार्यक्रम की सफलता का श्रेय अपने यहाँ काम करने वाले श्रमिकों के बच्चों को देती हैं। सोनिया बताती हैं कि कैसे उनके जागरूकता अभियान से बच्चों को समझ में आया कि हाथी उनके दोस्त हैं और इसलिए उन्हें परेशान करने की बजाय उनके साथ प्रेमपूर्वक बर्ताव करना चाहिए।

वह बताती हैं कि जब भी हाथियों का पलायन शुरू होता है तो गाँवों में ख़बर फ़ैल जाती है और उसी हिसाब से हम भी अपने चौकीदारों को सूचित करते हैं कि किस दिशा से इस बार हाथी आएंगे। वहाँ पर उनके चौकीदार लगभग 400 गज़ की दूरी तक एक कॉरिडोर बनाते हैं, ताकि हाथियों के समूह को कोई परेशान न करे।

उनके इस कार्यक्रम की सफलता पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली और अब उनका बागान ‘एलीफैंट फ्रेंडली’ सर्टिफाइड है।

अब उनके यहाँ हाथी बहुत आराम से घूम-फिर सकते हैं

इस अभियान में अपनी आगे की योजना पर बात करते हुए सोनिया ने बताया,

“अब हम हाथियों के लिए एक स्पेस बनाना चाहते हैं। अपने बागान की सीमाओं पर तो मैंने वही घास उगाना शुरू किया है, जो हाथियों को काफ़ी पसंद है। इसके आलावा, बागान में लगभग 100 एकड़ में उनके लिए एक जंगल भी तैयार करना है और इसकी शुरुआत ढाई एकड़ से की गई है। हर साल हम जंगल का क्षेत्र बढ़ाते रहेंगे।”

यकीनन, सोनिया की सोच बहुत ही आगे की है। उन्हें भरोसा है कि अपने इस अभियान में उन्हें सफलता मिलेगी।. हालांकि, कभी-कभी उन्हें लगता है कि काश उनकी यह सफलता देखने के लिए उनकी माँ उनके साथ होतीं। पर माँ से मिली सीख और हौसले के बल पर ही वे किसी भी चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार रहती हैं।

सोनिया कहती हैं,

“धरती अनमोल है, लेकिन बढ़ते प्रदूषण के कारण मानव जीवन का अस्तित्व संकट में है। इसलिए जब हम कहते हैं कि ‘धरती बचाओ’ तो इसका असली मतलब होता है कि हम खुद को बचाएं।”

यदि आप नक्सलबाड़ी चाय बागान के बारे में अधिक जानना चाहते हैं या फिर जैविक चाय खरीदना चाहते हैं, तो आप उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं!

संपादन: मनोज झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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