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गाँव है या जादू का पिटारा? जहाँ हर घर सदियों से बुन रहा है इक्‍कत की कहानी!

जब वो गाँव के गाँव, बुनकरों के मकान, उनकी गलियां, उनके करघे और करघों पर बुने जा रहे ख्वाब सामने थे तो मैं उन कारीगरों के हुनर को देखकर श्रद्धामग्न थी।

ताने-बाने और रंगों के चमत्कार देखने के लिए अपने हिंदुस्तान से बेहतर और कोई मुकाम क्या हो सकता है? और उस पर पाटन पटोला, पैठणी, पोचमपल्ली, कोटा, चंदेरी, बनारसी, गदवाल, इल्कल, कांजीवरम साड़ियों के अड्डे मालूम हों तो क्या कहने। मगर मुश्किल तब होती है जब हमें शोरूम के पते तो गूगल बताता है लेकिन उन बुनकरों-कारीगरों तक पहुंचने वाली राहे-गुज़र उसे भी कई बार मालूम नहीं होती जो ऐसे चमत्कारी फैब्रिक हर दिन अपने हाड़-मांस को गलाकर बुनते हैं।

ऐसे में विरासत की सैर करवाने वाली एजेंसियों का दामन थाम लीजिए जो देशभर के शहरों में आपको अपनी ही धरोहर से रूबरू करवाने के काम में जुटी हैं।

हैदराबाद के पिछले सफर में मैं टैक्सटाइल एक्सपर्ट दुर्गा वेंकटस्वामी की उंगली थामे हैदराबाद से करीब पचास किलोमीटर दूर कोयलगुड़म में थी।

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गलियों में धागों पर काम

गाँव था कि जादूगरी का कोई पिटारा जैसे खुल गया था। यहाँ हर घर इक्‍कत की कहानी बुनता है। इक्कत टाइ एंड डाइ तकनीक की जादूगरी को समझने के लिए ही मैं इतनी दूर चली आयी थी और जब वो गाँव के गाँव, बुनकरों के मकान, उनकी गलियां, उनके करघे और करघों पर बुने जा रहे ख्वाब सामने थे तो मैं उन कारीगरों के हुनर को देखकर श्रद्धामग्न थी।

करीब सौ-डेढ़ सौ साल पहले इन्हीं मुहल्लों में इनके पुरखे तेलिया रुमाल बुना करते थे। तेल में भिगोए धागों की धुलाई के बाद उन्हें रंगकर, बुनकर रुमालों की शक्ल दी जाती है। तेल में भिगोए जाने की वजह से एक तो रंग चोखा चढ़ता है, दूसरे इन रुमालों में एक खास किस्म की नमी और नरमाहट समा चुकी होती है। इन रुमालों की अफ्रीका और अरब देशों में आज भी काफी मांग है। रेगिस्‍तानी, गर्म इलाकों में सिर और गर्दन को ढकने वाले, ज्‍यॉमेट्रिक पैटर्न और अमूमन कालेसफेद प्रिंट वाले तेलिया रुमाल अरबों की पहचान बन चुके हैं।

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क्_या खूब चढ़े हैं रंग

इस बीच, इक्कत के डिजाइनों को बाद में रुमालों से बड़े कैनवस की जरूरत महसूस हुई तो करघों पर साड़ियां बुनी जाने लगीं। पिछले करीब सौ बरसों से यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।

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इक्_कत का दुपट्टा

रेशम की डबल इक्‍क्‍त साड़‍ियों के उस्‍ताद बुनकर हैं के. नरसिम्‍हा जो नलगोंडा जिले के कोयलगुड़म में इस हुनर को साध रहे हैं। 16 साल की उम्र में पहली बार करघे पर बैठे थे नरसिम्‍हा और आज करीब आधी सदी गुजरने के बाद भी इस सिलसिले को जारी रखे हैं। आसपास कितने ही करघों पर चुप्‍पी पसर चुकी है लेकिन कोयलगुड़ में नरसिम्‍हा और उनकी पत्‍नी तेलिया रुमाल और सिल्‍क की डबल इक्‍कत साडि़यों की शक्‍ल में आज भी उम्‍मीद बुन रहे हैं।

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उनकी विरासत को संभालने उनकी अगली पीढ़ी का कुछ साल पहले गाँव से मोहभंग हो गया और जिन उंगलियों को तानों-बानों से खेलना था, करघों पर ख्‍वाब बुनना था वो शहर जाकर सिम बेचने वाले शोरूम में नौकरी पर जुट गईं। नरसिम्‍हा ने घनघोर निराशा के उस दौर में भी अपनी साधना जारी रखी। पत्‍नी तो साथ थी ही जो धागों की रंगाई-छंटाई से लेकर जिंदगी की गाड़ी साथ खींचने के काम में साथ निभाती रही है। इस बीच, बाज़ार और शहर का मायाजाल नरसिम्‍हा के बेटे को वहां बांधने में नाकामयाब रहा। उम्‍मीद लौट आयी जब इस वारिस ने अपनी धरोहर में दिलचस्‍पी दिखायी।

बहरहाल, यह काम भी कोई खेल नहीं, कि बात की बात में इसे सीखा जा सके। कभी-कभी तो उम्र भर की साधना साबित होती है ऐसी कारीगरी। पोचमपल्‍ली के गाँव गवाह हैं इस बात के और गवाह हैं वो तमाम गलियां, चौपालें, गली के मोड़ और नुक्‍कड़ जिन पर आपको धागे रंगते, मरोड़ते, सुखाते, छांटते हुनरमंद शिल्‍पी दिन के चारों पहर गर्दन झुकाए दिख जाएंगे।

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पोचमपल्‍ली दरअसल, एक या दो नहीं बल्कि पूरे अस्‍सी गांवों का समूह है जिसे जीआई टैग मिल चुका है। यानी पोचमपल्‍ली की सिल्‍क की डबल इक्‍कत की साडि़यों को अपनी खास पहचान मिल गई है। वैसे ये वही पोचमपल्‍ली है जो विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सबसे पहले भूमि दान करने के लिए आगे आया था, और तभी से इसका नाम भूदान पोचमपल्‍ली पड़ गया।

आज इस पूरे इलाके ने अपनी बेशकीमती, खूबसूरत, डबल इक्‍कत सिल्‍क की साडि़यों के सहारे पहचान बनायी है। घर-घर में बुनकर हैं और बुनकरों ने मिलकर अपनी कॉपरेटिव्‍स बना ली हैं। यानी, कॉपरेटिव्‍स के जरिए कारीगर सीधे अपना तैयार माल बेच सकते हैं। बाज़ारों तक पहुंचने की राह में कोई बिचौलिया नहीं होने से उन्‍हें ठीक-ठाक मुनाफा मिल जाता है। फिर पोचमपल्‍ली हैंडलूम पार्क जैसे ठिकाने भी हैं जो इन कारीगरों को सीधे रोज़गार देते हैं।

इक्_कत के दिलफरेब रंगों के संग लेखिका

तेलंगाना में पोचमपल्‍ली के अलावा गुजरात (राजकोट और पाटन) और ओडिशा में भी इक्‍कत सरीखे चमत्कारी फैब्रिक को बुनने-रंगने वाले हाथों से साक्षात मिलने का मौका मिलता है।

टैक्‍सटाइल ट्रेल के बहाने धरोहरों से मुलाकात

घुमक्कड़ी के रटे-रटाए मुहावरों से बहुत अलहदा और पिटे-पिटाए रास्तों से बहुत अलग होती हैं ऐसी मंजिलें। विरासतों का रेशा-रेशा इनके चप्‍पे-चप्‍पे में बिखरा होता है। अगली बार हैदराबाद के सफर पर जाएं तो पोचमपल्‍ली को अपनी ट्रैवलिंग आइटनरी में शामिल करना न भूलें। और हाँ, इसके लिए टैक्‍सटाइल ट्रेल से जुड़ जाएं जो आपको सीधे बुनकरों के घरों, उनके करघों और उनकी कलाकारी से मिलवाती हैं। करघों से ताज़ा-ताज़ा उतरे दुपट्टे, साड़ी, मेजपोश या चादर से लेकर जो कुछ मन भाए, जरूर खरीद लाएं। कुछ भी। आपकी सैर के बहाने परंपरा के पौधे को सींचने का मौका भी मिलेगा।

टिप्‍स- हैदराबाद समेत देश के दूसरे हिस्‍सों में धरोहरों की सैर या टैक्‍सटाइल ट्रेल्‍स के लिए इंटैक (http://www.intach.org/), सहापीडिया (https://www.sahapedia.org/),ब्रेकअवे (http://www.break-away.in/) जैसी एजेंसियों का दामन थाम लीजिए।


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