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पिछले 5 सालों से जोधपुर के ऐतिहासिक कुएं और बावडियों को साफ़ कर रहा है यह आयरिश ‘पागल साब’!

अब तक कैरोन ने कई अहम जलाशयों, जैसे राम बावड़ी, क्रिया झालरा, गोविंदा बावड़ी, चंडपोल बावड़ी, गुलाब सागर झील आदि को साफ करने का प्रयास किया है।

फ्रांस में जन्मे 70 वर्षीय पर्यावरणविद् कैरोन रॉन्सले का 2014 में भारत आना हुआ और तब से वे जोधपुर के स्टेपवेल की सफाई के काम में लगे हुए हैं। भारत आने के बाद कैरोन जब राजस्थान आए, तो जोधपुर की पुरानी बावड़ियों ने इन्हें बहुत आकर्षित किया। पर इन प्राचीन जल-स्रोतों की दुर्दशा देख कर कैरोन ने इनकी सफाई करने का निर्णय लिया। 

अब तक कैरोन ने कई अहम जलाशयों, जैसे राम बावड़ी, क्रिया झालरा, गोविंदा बावड़ी, चंडपोल बावड़ी, महामंदिर बावड़ी, महिला बागझालरा, तापी बावड़ी और गुलाब सागर झील आदि को साफ करने का प्रयास किया है।

कैरोन रॉन्सले (स्त्रोत: फेसबुक)

इन जल-स्रोतों को स्थानीय भाषा में ‘बावड़ी’, झालरास (चौकोर आकार के खुले तालाब जिसके चारों ओर सीढ़ियाँ बनी होती हैं) या तालाब के नाम से जाना जाता है। बहुत पहले बावड़ी ही पीने के पानी का मुख्य साधन हुआ करती थी, जबकि झालरा से धार्मिक क्रिया-कलापों, शाही समारोहों और सामुदायिक उपयोग के लिए पानी की आपूर्ति होती थी।

भारत जल पोर्टल में बताया गया है कि, “जहां मेहरानगढ़ किला पहाड़ की चोटी पर है, वहीं जोधपुर की चारदीवारी चिड़िया टुंक के नीचे स्थित है। गुरुत्वाकर्षण के कारण यहाँ पानी पहुंचाना संभव हो जाता है। बहुत पहले ही शहर की पहाड़ियों पर झीलें और नहरें बनाई गईं थीं। जबकि कुएँ, बावड़ी, झालरास और टैंक समतल भूमि पर बनाए जाते थे।“

1950 तक जोधपुर की पानी की ज़रूरत झील, नहर, जलसेतु, टैंक, कुओं और स्टेपवेल के ज़रिए पूरी होती थी। हालांकि, रेगिस्तानी भूमि में ये स्टेपवेल तब बेकार हो गए, जब इन्दिरा गांधी नहर द्वारा पंजाब की नदियों से बारहों महीने पानी की सप्लाई शुरू कर दी गई। आज परम्परागत जलापूर्ति के ये साधन, जिनमें वर्षा जल का संचय होता था, जीर्ण-शीर्ण हालत में पड़े हुए हैं।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए कैरोन कहते हैं, “2014 के अंत में जब मैं जोधपुर आया, तब मेरी नज़र इन स्टेपवेल पर पड़ी, पर मुझे इन सुंदर और अनोखी कलाकृतियों को बर्बाद होता देख कर बहुत आश्चर्य हुआ। तभी मैंने ऐसी जगहों की सफाई करने और इन्हें वापस सही स्थिति में लाने का निश्चय किया।“

 

भारत के साथ एक अनूठा रिश्ता

कैरोन का भारत से पारिवारिक रिश्ता रहा है। रेलवे में चीफ़ इंजीनियर रहे इनके दादा ने भारत में अपने जीवन का अच्छा-खासा हिस्सा बिताया। 

कैरोन कहते हैं, “उनके दादा यहाँ की संस्कृति के बड़े प्रशंसक थे। सेवानिवृत्त होने के बाद वे इंग्लैंड लौट गए, लेकिन उनका प्रभाव मेरे जीवन पर काफी पड़ा।“

कैरोन ने पाकिस्तान में अपने जीवन का काफी समय बिताया। पाकिस्तान में उन्होंने दो दशक तक सार्वजनिक शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम किया।

वे कहते हैं, “मैं 1998 में पाकिस्तान गया था। मैं कराची के एक ऐसे स्कूल में पढ़ाता था, जो ख़ास तौर पर वैसे बच्चों के लिए था, जिन्हें सुनने में परेशानी होती थी। मैं वहाँ के राजकीय विद्यालय के बच्चों के साथ पौधे लगाता, उन्हें उनका संरक्षण करना सिखाता और उनके अंदर की रचनात्मकता को उभारने की कोशिश करता।

इन्होंने कराची के जिन स्कूलों में पढ़ाया है, उनमें प्रसिद्ध कराची ग्रामर स्कूल भी है।

सम्पन्न छात्रों को पढ़ा कर ये ऊब चुके थे। इसके बाद ये उमेरकोट चले गए जो थार के रेगिस्तान के किनारे है और जहाँ हिन्दुओं और मुसलमानों की मिली-जुली आबादी है।

कैरोन रॉन्सले (स्त्रोत: फेसबुक)

वहाँ ये जिस भी स्कूल में जाते, वहाँ एक बगीचा लगा देते। कैरोन यह सब बिना किसी संस्था या सरकार की मदद के कर रहे थे।

पाकिस्तान में दो दशक बिताने के बाद भी इन्हें देश से बाहर निकाल दिया गया। वे बताते हैं, “मेरा वहाँ का अनुभव काफी बुरा रहा। एक समय के बाद ब्रिटिश दूतावास भी मेरे साथ अनजान व्यक्ति जैसा बर्ताव करने लगा। मुझे वहाँ महीनों फंसाए रखा गया, जबकि मैंने कोई कानून नहीं तोड़ा था।“

आखिर 2014 में कैरोन भारत आ गए

कैरोन बताते हैं, “भारत आने के पीछे मेरा मकसद बस यह देखना था कि यह देश कैसा लगता है। धीरे-धीरे मैं यहाँ पर्यावरण समस्याओं पर काम करने के लिए अवसर ढूँढने लगा। पहले मैंने बेयरफूट कॉलेज में उसके वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को बदलने के लिए छह महीने के लिए प्रवेश ले लिया। वहाँ स्नातकोत्तर कर रहे कुछ छात्रों के साथ मिल कर हमने वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को ठीक करने के लिए काम किया।“

कैरोन कहते हैं, “सौर ऊर्जा के लिए काम करने के अलावा वे हर साल हजारों पेड़ भी लगाते हैं। यह एक अच्छी कोशिश है। मुझे वहाँ काम करने में काफी मज़ा आया।“

देश भर में यात्रा करने के बाद ये जैसलमर के निकट एक गाँव हाडा में रुक गए। वहाँ इन्होंने कुछ किसानों के साथ मिल कर स्थानीय पर्माकल्चरिस्ट द्वारा चलाये जा रहे एनजीओ के माध्यम से बगीचा लगाने में मदद की।

कैरोन दावा करते हैं कि इन्होंने करीब 1000 पेड़ लगाए हैं, पर स्थानीय जंगल विभाग से सहयोग प्राप्त होने के बाद भी यह अभियान सफल नहीं हो पाया, क्योंकि वहाँ की बकरियों ने सारे पौधों को बड़ा होने के पहले ही चर लिया।

इसके बाद इन्होंने जैसलमर छोड़ दिया और जोधपुर आ गए। जब इन्होंने जोधपुर का प्रसिद्ध स्टेपवेल देखा, तब यहीं रुकने का निश्चय कर लिया।

जोधपुर का खूबसूरत स्टेपवेल (स्त्रोत: फेसबुक)

अकेले किया संघर्ष

शहर के कई नगरपालिका अधिकारियों और गैर लाभकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों से मिलने के बाद भी इन्हें स्टेपवेल की सफाई को लेकर कोई आश्वासन नहीं मिल पाया।

इन्होंने इस कार्य को खुद करने का फैसला किया और इसके लिए कुछ कर्मचारियों को नियुक्त किया।

कैरोन बताते हैं, “हालांकि, कुछ स्थानीय लोगों ने मदद का आश्वासन तो दिया, पर वे दोबारा आए नहीं। इसकी वजह यह थी कि ये तालाब बहुत गंदे हो चुके थे। यहाँ सफाई करने का मतलब था दम घुटने से मर गईं हज़ारों मछलियों को वहाँ से हटाना। इसके अलावा, झीलों के पास लोग शराब पीते थे और बच्चे भी शौच कर वहाँ गंदगी फैलाते थे।“

आखिरकार, मेहरानगढ़ म्यूज़ियम ट्रस्ट से सहयोग मिला। ट्रस्ट ने इन्हें कुशल मजदूर देने का आश्वासन दिया और कहा कि मजदूरों की  उपलब्धता के आधार पर इनके पास दो से सात कर्मचारी होंगे, जो इन जल-स्रोतों की सफाई करेंगे।

स्वयंसेवकों के साथ बावड़ियों की साफ़-सफाई करते हए

INTACH जोधपुर चैप्टर के संयोजक और मेहरानगढ़ म्यूज़ियम ट्रस्ट के सदस्य महेंद्र सिंह तंवर द बेटर इंडिया से बात करते हुए कहते हैं, “जब हमने इनके बारे में सुना, तब हम मदद के लिए आगे आए और इनसे अनुरोध किया कि ये इन जल-स्रोतों की सफाई एक निश्चित योजना के तहत करें। हमने सरकार से मदद का अनुरोध किया और इनमें से कुछ जल निकायों को नगर निगम से ले लिया। हमने कैरोन को एक रोल मॉडल बताया। हमें ऐसा लगा कि लोग इनसे प्रोत्साहित होंगे।“

हालांकि, स्थानीय सरकारी अधिकारी से कोई मदद मिली नहीं। किसी भी स्टेपवेल को साफ करने से पहले उसकी पूरी संरचना देखनी पड़ती है। उसकी गहराई के साथ ही यह भी देखना पड़ता है कि जोधपुर पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचईडी) द्वारा लगाए गए पम्प काम कर रहे हैं या नहीं। ये पम्प पानी को बाहर निकालने में मदद करते हैं।

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कैरोन बताते हैं, “पीएचईडी ऐसे ठेकेदारों को ज़िम्मेदारी सौंपता है, जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। वे हमारा विरोध करते हैं और हमें बावड़ी के बाहर निकाल देते हैं, क्योंकि वे बिजली के पैसे भरना नहीं चाहते। कई बार हमें जोधपुर कलेक्टर से सुरक्षा की गुहार करनी पड़ी है। हमें स्थानीय सरकार से सहयोग चाहिए। हमारे पास मेहरानगढ़ फोर्ट ट्रस्ट द्वारा दिए गए पम्प को छोड़ कर और कोई मशीन नहीं है, जिससे हम बावड़ी के पानी का स्तर कम करते हैं।“

बहरहाल ये पूरी लगन से काम करते रहे, और जल्द ही स्थानीय मीडिया ने इनकी पहल में दिलचस्पी ली।

जोधपुर निवासी प्रत्यूष जोशी ने कैरोन के समर्पण को बहुत नजदीक से देखा है। प्रत्यूष जोशी स्थानीय कार्यकर्ता हैं और इन्होंने कैरोन के साथ एक साल तक काम किया है।

जोशी कहते हैं, “70 साल के एक व्यक्ति को इस जोश और समर्पण के साथ काम करते देखना दुर्लभ है। सुबह 8 बजे से दोपहर तक और शाम में दो घंटे ये खुद काम करते हैं।“

एक अन्य स्वयंसेवक का कहना है, “कैरोन हमारे घर में आए अतिथि जैसे हैं। इन्होंने यहाँ की बावड़ियों, कुओं और तालाबों को साफ रखने की कोशिश की है। हमें इस कार्य के प्रति उनके समर्पण से प्रेरणा लेनी चाहिए और इनकी मदद करनी चाहिए।“

महेंद्र सिंह कहते हैं, “कैरोन के काम ने हमें फायदा पहुँचाया है। इनके द्वारा हमें तीन से चार बच्चों की अलग-अलग टीमें मिली हैं। हमने  इन बच्चों को इन जल निकायों को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी उठाने को कहा है।”

सहयोग

महेंद्र सिंह दावा करते हैं कि ट्रस्ट उन्हें आर्थिक सहयोग देने के साथ 5-10 मजदूर भी उपलब्ध करा रहा है।

ये बताते हैं, “इस काम का पूरा खर्च ट्रस्ट द्वारा उठाया जाता है और हर प्रकार का सहयोग उन्हें दिया जाता है। अगर कैरोन को लगता है कि किसी जल निकाय में काम अधिक है या वहाँ कचरा आधिक है और मजदूरों-स्वयंसेवकों की संख्या पर्याप्त नहीं है, तो हम ट्रस्ट और INTACH की ओर से ज्यादा स्वयंसेवक भेजेंगे।“

हर 3-4 महीने पर ट्रस्ट करीब 200 सदस्यों के साथ बड़े पैमाने पर एक मुहिम की शुरुआत करता है, जिसमें INTACH के सदस्य, इस परियोजना से जुड़े अन्य लोग, समाज सेवक और कार्यकर्ता शामिल होते हैं। यह ट्रस्ट उन्हें काम करने का एक मंच प्रदान करता है।

महेंद्र सिंह बताते हैं, “कैरोन के निर्देश पर हमने बड़ी मशक्कत से सफाई की शुरुआत की है। हमने यह नवी बावड़ी और तापी बावड़ी में किया है। हमने कूड़ा हटाने के लिए 20-50 ट्रॉली का इस्तेमाल किया और कचरे का ढेर साफ करने के लिए 8-10 ट्रैक्टर लगाए। अच्छी बात ये है कि जब 200 लोग एक स्थान पर इकट्ठा होते हैं तो आस-पास के मोहल्ले के लोग भी उत्सुक हो जाते हैं और पूछते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में लोग क्यों जमा हुए हैं।“

स्थानीय लोगों ने कैरोन के बारे में बताया कि किस तरह एक दूसरे देश का नागरिक यहाँ आ कर उनके घर-आँगन की सफाई कर रहा है, जबकि वे खुद आपने घर की साफ़-सफ़ाई को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

“हमने कुछ जल निकायों को अच्छी तरह साफ कर दिया है और उन्हें अच्छी स्थिति में ला दिया है। पर कुछ जगहों पर लोगों ने उसे फिर से बिगाड़ना शुरू कर दिया है। हमने एक और मुहिम की शुरुआत की है, ताकि अधिक लोग इसे बरकरार रखने के लिए जुड़ें।”

स्कूल के बच्चों में जांगरूकता फैलाते हुए

रक्षा, संरक्षण, शिक्षा

कैरोन का यह काम ऊपर लिखी तीनों बातों पर सटीक बैठता है।

यह स्थान कई तरह के पक्षियों और जानवरों का घर है, जो स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र (इको सिस्टम) के लिए आवश्यक है।

इनके संरक्षण के साथ ही स्कूली छात्रों को इनका महत्व समझाना भी ज़रूरी है।

इसके अलावा, गर्मी के मौसम में समय बिताने के लिए यह सुंदर जगह है। पहले की तरह, ये जल निकाय एक अच्छे पिकनिक स्पॉट के साथ योग व संगीत के केंद्र बन सकते हैं, खासकर झालरा जहाँ एक बड़ा मंच मौजूद है।

इस प्रयास में ट्रस्ट ने भी उनकी मदद की है।

महेंद्र सिंह कहते हैं, “हम इस जल-स्रोत के आस-पास की जगहों के युवाओं को इसमें  शामिल करना चाहते थे और उन्हें इसे आगे बढ़ाने और पहले से बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते थे। हम इन जगहों पर स्कूलों के छात्रों के भ्रमण की व्यवस्था भी करते हैं और उनका परिचय कैरोन से करवाते हैं। वे इनसे बात करते हैं।”

अगली पीढ़ी के लिए शिक्षा
स्त्रोत

अंततः यह जल संरक्षण का मुद्दा है। अब तक इस रेगिस्तानी क्षेत्र के लोगों के लिए इन्दिरा गांधी कैनाल से पानी आता है।

मौसम में बदलाव पानी के बहाव की दिशा को बदल देगा, इसलिए ये स्टेपवेल भविष्य में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

लोगों के लिए संदेश

कैरोन संयुक्त परिवार में रहते हैं। शुरुआत में इनका गुज़ारा पेंशन के पैसों से होता था, लेकिन बाद में इसमें कटौती कर दी गई, क्योंकि ये अधिकतर समय यूके से बाहर बिताने लगे

कैरोन का कहना है, “मैंने बहुत पैसे बचाए हैं। मैंने कभी विलासिता पर खर्च नहीं किया है और हमेशा सस्ते घरों में रहा हूँ।“

जोधपुर के लोगों के लिए उनका एक ही संदेश है।

ये कहते हैं, “आप हिस्सेदार बनिए। अपने बच्चों को बावड़ी ले कर आइए, यहाँ पिकनिक मनाइए, पर इन्हें गंदा मत कीजिए। ये हमारी विरासत और इतिहास का हिस्सा हैं और इसने आपके पूर्वजों को जीवन दिया है। इन्हें बहुमूल्य विरासत के रूप में देखना होगा और इनकी रक्षा करने के साथ इन्हें आम जनता के लिए उपलब्ध कराना होगा।“

जब उनसे पूछा गया कि उन्हें यह काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिलती है, तब उन्होंने कहा, “मेरा यह संदेश है कि चाहे आप किसी भी उम्र के हैं, आपकी राष्ट्रीयता जो हो या आपकी शैक्षणिक योग्यता कुछ भी हो, आप किसी भी समाज की बेहतरी के लिए काम कर सकते हैं। आप शिक्षा के माध्यम से जागरूकता फैलाकर लोगों को संसाधन और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सोचने के लिए मजबूर कर समाज में योगदान कर सकते हैं।

कैरोन कहते हैं कि मैं संसाधनों के महत्व को समझने, उन्हें आदर देने और उन्हें अपने साथियों के साथ बांटने के बारे में सोचता हूँ।

वहाँ के स्थानीय लोगों ने कभी उनके इस सफाई अभियान के लिए उन्हें पागल साब का उपनाम दिया था, पर आज वे बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं।

आप कैरोन और उनकी टीम का कार्य यहाँ  देख सकते हैं।  

संपादन: मनोज झा


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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहिणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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