in ,

हर रोज़ 30 बच्चों का पेट भर रहा है यह फ़ूड डिलीवरी एजेंट, 21 बच्चों का कराया सरकारी स्कूल में दाखिला!

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, भारत में हर साल $14 बिलियन का भोजन बर्बाद होता है, 194 मिलियन भारतीय हर साल भूखमरी का शिकार होते हैं।

कुछ भारतीयों को यह अहसास होने में वक़्त लगे कि जब भी हम खाना फेंकते हैं, जिसे हम किसी ज़रूरतमंद को दे सकते हैं तो हम बहुत गलत करते हैं। तो वहीं पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के दम दम कैंटोनमेंट में एक फ़ूड डिलीवरी एजेंट हर दिन फूटपाथ पर गुज़र-बसर करने वाले मासूम बच्चों का हर दिन पेट भर रहा है।

इन गरीब बच्चों के बीच ‘रोल काकू’ के नाम से मशहूर पथिकृत साहा दुनिया को सीखा रहे हैं कि कैसे अच्छाई का एक छोटा-सा कदम समाज में एक अहम बदलाव ला सकता है।

पथिकृत साहा (फोटो साभार: फेसबुक)

ज़ोमैटो की पॉलिसी के मुताबिक, अगर डिलीवरी एजेंट खाना डिलीवर करने के लिए निकल गया है और तब रास्ते में कोई ग्राहक वह खाना कैंसिल कर दे, तो डिलीवरी एजेंट यह खाना अपने पास रख सकता है या फिर किसी ज़रूरतमंद को दे सकता है। और पथिकृत ने यह खाना इन गरीब बच्चों को देने की ठानी।

यह भी पढ़ें: इस चायवाले ने जंगल के बीचो-बीच खोली लाइब्रेरी, पैदल पहुंचकर पढ़ने लगे लोग!

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा,

“ऐसे हज़ारों बच्चे हैं जिन्हें दिन में एक वक़्त का खाना भी नसीब नहीं होता।ये बच्चे या तो कुपोषित रहते हैं या फिर अपनी भूख मिटाने के लिए नशे का शिकार हो जाते हैं। यह हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है कि ये दोनों ही बातें न हों। मैं खुशकिस्मत हूँ कि मुझे मेरे काम के ज़रिए इन्हें खाना खिलाने का मौका मिला।”

फोटो साभार: दिब्यायण दाश (फेसबुक)

वैसे तो पथिकृत हमेशा से ही गरीब तबके के प्रति संवेदनशील रहे हैं। लेकिन 4 साल पहले हुई एक घटना ने उन्हें इन लोगों के हित में कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने बताया कि वह दम दम कैंटोनमेंट रेलवे स्टेशन से गुज़र रहे थे, जब पोल्तु (बदला हुआ नाम) से उनकी मुलाक़ात हुई। वह उनसे पैसे मांग रहा था। उस 6 साल के बच्चे को कुछ देर तक उन्होंने अनदेखा करने की कोशिश की, लेकिन वह कहता रहा कि उसकी माँ उसे घर से निकाल देगी आगे वह कुछ पैसे नहीं लेकर गया तो। इस घटना ने उन्हें गरीबों की दुर्दशा के बारे में सोचने पर मजबूर किया और ख़ासकर कि बच्चों की।

यह भी पढ़ें: गरीब बच्चों का स्कूल न छूटे इसलिए इस इंजीनियर ने छोड़ दी अपनी नौकरी, 600 बच्चों की पढ़ाई की उठा रही है ज़िम्मेदारी!

Promotion

इस घटना के बाद से ही उन्होंने बचे हुए खाने को इन बच्चों में बाँटना शुरू किया। 26 वर्षीय पथिकृत ने दम दम में एक होटल के साथ भी टाई-अप किया है और वहां बचे हुए खाने को इकट्ठा करके वे गरीबों में बाँट देते हैं।

स्वादिष्ट बिरयानी, चायनीज़ खाना, रोल्स से लेकर रोटी, फ्राइड राइस आदि तक, सभी तरह के व्यंजन लगभग 30 गरीब बच्चों में बांटे जाते हैं। और अब हर दिन इन बच्चों को खाना मिलता है।

बचा हुआ खाना बच्चों को बाँटा जाता है

पथिकृत के प्रयासों से प्रभावित हो, उनके और 5 दोस्तों ने इसी तरह ज़रुरतमंदों को खाना बाँटना शुरू किया है। जब भी कोई ऑर्डर कैंसिल होता है, तो वे वह खाना पथिकृत को दे देते हैं ताकि वह बच्चों तक पहुंचा सके।

पथिकृत इन बच्चों की पढ़ाई के लिए अनौपचारिक तौर पर कक्षाएं भी चला रहे हैं। “जब मुझे पोल्तु की कहानी का पता चला, तो मैं उसके और दोस्तों से भी मिला। इनके माता-पिता को इनके भविष्य की रत्तीभर चिंता नहीं। ये कुछ बच्चे रेलवे स्टेशन पर सोते हैं, तो कुछ छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त हैं और कुछ नशे के शिकार हैं।”

इन बच्चों की मदद के लिए पथिकृत ने ‘हेल्प फाउंडेशन’ नाम से संस्था शुरू की है और इसे रजिस्टर भी करवाया है। कुछ दोस्तों की मदद से, वे इन बच्चों को हर शाम रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफ़ॉर्म पर पढ़ाते भी हैं।

21 बच्चों को मिला सरकारी स्कूल में दाखिला

“इन्हें खाना या पैसे देना चैरिटी है और इससे ये बच्चे मुझ पर ही निर्भर हो जायेंगें। यह मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं चाहता हूँ कि ये लोग खुद अपना भविष्य तय करें और इसमें शिक्षा बहुत अहम भूमिका निभाती है। इसलिए, एक प्लास्टिक की चटाई और तीन बच्चों के साथ मैंने कक्षा शुरू की और आज इस इलाके के लगभग 30 बच्चे पढ़ने आते हैं,” उन्होंने आगे बताया।

कहते हैं ना कि अगर नीयत सच्ची हो तो आगे बढ़ने के रास्ते खुद ब खुद खुल जाते हैं और यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पथिकृत के इस नेक कदम को देखते हुए, शहर के ऑटो यूनियन ने अपने ऑफिस की बालकनी में उन्हें बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह दे दी।

यह भी पढ़ें: 20, 000 छात्रों को शिक्षित करने के साथ गरीबी और तस्करी जैसे मुद्दों पर काम कर रही है ‘अलोरण पहल’!

शाम की यह कक्षा सिर्फ़ एक शुरुआत थी, पथिकृत ने धीरे-धीरे इन बच्चों का नाम सरकारी स्कूल में लिखवाना शुरू किया। उन्होंने इन बच्चों के बारे में जागरूकता फैलाई और लोगों से इनके लिए स्टेशनरी, स्कूल बैग, किताबें, वर्दी आदि स्पोंसर करने की अपील की।

उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट की और आस-पास की कॉलोनी में जाकर भी लोगों से मदद मांगी। और आज 21 बच्चे, जो कभी लोगों से खाना और पैसे मांगते थे, आज सरकारी स्कूल में अच्छे से पढ़ रहे हैं।

पथिकृत की सोच और जज़्बे को द बेटर इंडिया का सलाम। यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप भी पथिकृत की इस नेक काम में मदद करना चाहते हैं तो उनसे 9804788406/9123348301 पर संपर्क करें!


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

शेयर करे

Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य : वह भारतीय गणितज्ञ, जिन्होंने आइंस्टाइन के सिद्धांत का किया सरलीकरण

उत्तराखंड : जैविक सब्जियां, मसाले व फूल उगाकर लाखों कमाता है यह किसान; पत्नी ने दिया पूरा साथ