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#युवागीरी: 600 गरीब बच्चों की शिक्षा का ज़िम्मा उठा रही हैं यह इंजीनियर!

इन बच्चों में काबिलियत की कमी नहीं है बस कमी है तो साधन और मौकों की!

हुत पहले एक कोरियन ड्रामा ‘डेसेंडेंट्स ऑफ़ द सन’ देखा था। इस ड्रामा का एक डायलॉग मेरे दिल के बहुत करीब है कि ‘आप पूरी दुनिया नहीं बदल सकते, लेकिन अगर किसी एक बच्चे की दुनिया भी आपकी वजह से बदल सकती है तो बिल्कुल बदलें!’

द बेटर इंडिया भी अपने कैंपेन, ‘युवागीरी’ के माध्यम से यही करने की कोशिश कर रहा है। हम ऐसे युवाओं के लिए मदद का ज़रिया बनना चाहते हैं जो देश के भविष्य को सँवारने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं।

अहमदाबाद की किंजल शाह का नाम भी इन युवाओं की फेहरिस्त में शामिल होता है। पिछले 11 सालों से शहर के पिछड़े और गरीब तबके के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवा रही किंजल बस इतना चाहती हैं कि अगर कोई डोनेट करना चाहता है तो उनके किसी बच्चे की स्कूल फीस भर दे।

बायो-मेडिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने वाली किंजल ने कभी भी इस तरह के किसी सोशल वर्क या फिर कोई एनजीओ स्थापित करने के बारे में नहीं सोचा था। वह तो बस ग्रैजुएशन के दूसरे साल में अपने दोस्तों के कहने पर स्लम एरिया में जाकर वहाँ बच्चों को पढ़ाने के अभियान से जुड़ गई थीं।

किंजल शाह (फोटो साभार: फेसबुक)

द बेटर इंडिया से बात करते हुए किंजल ने कहा, “साल 2008 में मैं सेकंड ईयर में थी और तब टाइम्स ऑफ़ इंडिया का ‘टीच इंडिया’ अभियान शुरू हुआ था। मेरे एक दोस्त जैतून ने इस अभियान से जुड़ने की पहल की। उसी का आईडिया था कि हम वीकेंड पर ज़रूरतमंद बच्चों को पढ़ाएं। उस समय लगभग 6-7 दोस्तों के साथ मिलकर हमने यह काम शुरू किया था।

स्लम एरिया चुनने के लिए उन्होंने कोई खास सोच-विचार नहीं किया था। ऐसे ही किसी ने गुलबाई टेकरा का नाम लिया और फिर उन्होंने यहाँ के म्यूनिसिपैलटी स्कूल में जाकर बात की। हर शनिवार और रविवार उन्हें दो घंटे तक बच्चों को पढ़ाने की अनुमति मिल गई।

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अहमदाबाद के बीच में बसा यह वही गुलबाई टेकरा है, जिसे लोग ‘हॉलीवुड बस्ती’ के नाम से भी जानते हैं। कभी आप इस इलाके से गुजरेंगे तो आपको कच्चे-पक्के हर मकान के बाहर बड़ी-बड़ी गणपति की, माँ दुर्गा की, तो कहीं राम-कृष्ण की मूर्तियाँ दिखेंगी। मूर्तियाँ बनाना ही यहाँ के लोगों का मुख्य रोज़गार है। यह व्यवसाय इस बस्ती में पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चला आ रहा है, लेकिन यहाँ के बच्चों का भविष्य दांव पर है, क्योंकि उनकी शिक्षा पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है।

किंजल ने बताया ,”जब हमने यहाँ आना शुरू किया तो बच्चों के माता-पिता को उन्हें रेग्युलर पढ़ने के लिए भेजने को राजी करना भी बहुत मुश्किल था। उस समय हम सिर्फ़ स्कूल ही नहीं जाते थे, बल्कि बस्ती में लगातार आते, ताकि कोई भी बच्चा स्कूल मिस न करे। यह मुश्किल था, पर नामुमकिन नहीं।”

ग्रैजुएशन पूरा होने तक किंजल इन बच्चों को पढ़ाने के लिए लगातार आती रहीं। ग्रैजुएशन के बाद उनके कई दोस्त आगे पढ़ने के लिए बाहर चले गए तो कुछ ने अहमदाबाद में रहते हुए भी स्कूल आना बंद कर दिया। लेकिन किंजल जॉब ज्वाइन करने के बाद भी हर शनिवार और रविवार बच्चों को पढ़ाने आती थीं। इन बच्चों को पढ़ाना उनकी आदत में शामिल हो गया था। अगर वह इन बच्चों की एक क्लास भी मिस करतीं तो उन्हें यह बात खलने लगती।

(फोटो साभार: फेसबुक)

साथ ही, उन्हें 7वीं-8वीं कक्षा के बाद बच्चों का स्कूल ड्रॉप आउट हो जाना भी बहुत खलता था, ख़ासकर लड़कियों की पढ़ाई बंद हो जाती थी। इस बारे में उन्होंने बहुत से माता-पिता से बात की, लेकिन कई जगहों पर सरकारी स्कूल सिर्फ़ 8वीं तक ही थे और आगे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के उनके पास साधन नहीं थे। कई बच्चे प्राइवेट स्कूल में दाखिले के बाद भी पढ़ाई छोड़ देते, क्योंकि उनका स्तर बाकी बच्चों जैसा नहीं होता था।कोई और होता तो शायद इन सब बातों को किनारे करके अपने करियर पर फोकस करता। लेकिन किंजल ने ऐसा नहीं किया। वह इन बच्चों को उनके हाल पर नहीं छोड़ सकती थीं और इसलिए उन्होंने तय किया कि वह बच्चों को सिर्फ़ वीकेंड पर नहीं, बल्कि हर रोज़ पढ़ाएंगी। लेकिन जॉब के साथ यह काम करना किसी चुनौती से कम नहीं था और किंजल ने यह चुनौती स्वीकार की।

बच्चों के साथ किंजल (फोटो साभार: फेसबुक)

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इस वक़्त तक उन्हें समझ में आ गया था कि उनकी ख़ुशी किसी बड़े अस्पताल या फिर फार्मा कंपनी के साथ काम करने में नहीं, बल्कि इन ज़रूरतमंद बच्चों का भविष्य संवारने में है। इसलिए सबसे पहले उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दिया और अक्टूबर, 2011 से खुद को पूरी तरह से इन बच्चों के लिए समर्पित कर दिया।

उनके इस फ़ैसले पर शुरू में उनके परिवार को कुछ संदेह था और जान-पहचान वाले भी अक्सर उन्हें कहते कि अपना भविष्य खराब करने की क्या ज़रूरत है। पर किंजल के दृढ़ निश्चय के आगे सबको झुकना पड़ा। उनके पापा ने उनसे सिर्फ़ यही बात कही कि यदि तुमने यह ठान लिया है तो तुम्हारा अभियान ऐसा हो कि तुम वाकई किसी की ज़िंदगी को बदल सको।

किंजल बताती हैं , “मैंने अपने कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों से फंड इकट्ठा करके बस्ती के पास ही एक कमरा किराए पर लिया। वहाँ मैं हर रोज़ सुबह-शाम दो-दो घंटे करके इन बच्चों को पढ़ाती थी। शुरुआत तो सिर्फ़ 5-6 बच्चों से हुई और फिर इन बच्चों के प्राइवेट स्कूल में दाखिले के लिए भी हमने फंड इकट्ठा किया। धीरे-धीरे ही सही, इन बच्चों में बहुत बदलाव आया और इनका स्तर ऊंचा उठा।”

(फोटो साभार: फेसबुक)

अब ये बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जाकर वहां के बच्चों को टक्कर देने के लिए तैयार होने लगे थे। बच्चों की छोटी-छोटी सफलताओं ने ही किंजल को प्रभावित किया और उन्हें एहसास हुआ कि यह ऐसा काम है जो वह अपनी पूरी ज़िंदगी कर सकती हैं।

साल 2013 में उन्होंने ‘श्वास’ नाम से अपने एनजीओ को रजिस्टर करवाया। हर साल उनके पास बच्चों की तादाद बढ़ने लगी। उन्होंने इन बच्चों की बेहतर पढ़ाई के लिए प्रोफेशनल टीचर रखे। हर दिन ये टीचर सुबह-शाम दो-दो घंटे इन बच्चों पढ़ाते हैं। उस समय 6 बच्चों से शुरू हुआ यह अभियान आज 600 बच्चों तक पहुँच चुका है। किंजल के अलावा श्वास में आज 20 टीचर काम कर रहे हैं और उन सबके ऊपर एक सुपरवाइजर है, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि बच्चे व टीचर्स, दोनों ही रेग्युलर आएं।

अहमदाबाद के गुलबाई टेकरा के अलावा श्वास शाहीबाग़, मेमनगर, रामदेवनगर, थलतेज गाँव में भी काम कर रहा है। हाल ही में उन्होंने शिवरंजनी में ‘स्ट्रीट किड्स’ यानी फुटपाथ पर गुज़र-बसर करने वाले बच्चों के साथ काम करना शुरू किया है।

इन 600 बच्चों में से लगभग 40 बच्चों का उन्होंने प्राइवेट स्कूलों में दाखिला करवाया है और 2 बच्चे आज कॉलेज में पढ़ रहे हैं।

(फोटो साभार: फेसबुक)

किंजल कहती हैं, “फ़िलहाल हमारा ध्यान सिर्फ़ पढ़ाई पर ही नहीं है, बल्कि हम उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग भी दिलवा रहे हैं, क्योंकि जब ये बच्चे स्किल्स सीखेंगे, तभी तो कुछ न कुछ काम करके आत्म-निर्भर बन सकेंगे।”

‘श्वास’ के बारे में एक ख़ास बात यह भी है कि इसका उद्देश्य सिर्फ़ इन बच्चों को आगे बढ़ाना नहीं है, बल्कि पूरे समुदाय का स्तर ऊपर उठाना है। किंजल अपने स्टूडेंट्स के माता-पिता को भी लगातार शिक्षा और अन्य मूलभूत अधिकारों के प्रति जागरूक करती हैं और हर संभव तरीके से उनकी मदद के लिए तैयार रहती हैं।

किंजल ने बताया कि गुलबाई टेकरा में रहने वाली हंसा बेन अपने बच्चों को उनके सेंटर पर छोड़ने आती थीं। लोगों के घरों में साफ़-सफाई का काम करने वाली हंसा बेन कभी भी स्कूल नहीं गई थीं और जब वह यहाँ बच्चों को पढ़ते देखतीं तो उनका भी मन हुआ कि वे पढ़ें। किंजल और उनकी टीम ने भी हंसा बेन का हौसला बढ़ाया। हंसा बेन को उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ा दिया है और आज हंसा बेन श्वास में शिक्षिका के तौर पर पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ा रही हैं। घर-घर काम करने से लेकर एक शिक्षक बनने तक के हंसा बेन के सफ़र में किंजल ने बहुत अहम भूमिका निभाई है।

श्वास के साथ पढ़ रहे इन बच्चों ने इस बार दसवीं की परीक्षा पास की है (फोटो साभार: फेसबुक)

श्वास के लिए फंड किंजल खुद जुटाती हैं। उन्हें दो-तीन कंपनियों के सीएसआर से स्पॉन्सरशिप मिलती है, तो बहुत से लोग भी बच्चों के लिए डोनेशन देते हैं। आगे के लिए उनकी योजना है कि जहाँ-जहाँ श्वास काम कर रहा है, वहां के ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों को अपने साथ जोड़ें। गुलबाई टेकरा से उनके पास सिर्फ़ 90 बच्चे हैं, जबकि यह इलाका काफ़ी बड़ा है।

किंजल कहती हैं कि ज़रूरी नहीं, आप कुछ अच्छा करने के लिए कोई एनजीओ ही ज्वाइन करें। आप अपने आस-पास किसी भी बच्चे को पढ़ाएं और लगातार उसके साथ काम करें। धैर्य रखें और किसी भी बच्चे की काबिलियत पर भरोसा करें कि वह ज़रूर कुछ कर सकता है।

फ़िलहाल, किंजल और उनकी टीम अपनी एक पांचवीं कक्षा की छात्रा, आशा मकवाना को प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाना चाहती है। जिसके लिए उन्हें किसी स्पोंसर की ज़रूरत है। यह बच्ची पढ़ने में बहुत अच्छी है पर उसके परिवार के पास इतने साधन नहीं कि वे उसकी प्राइवेट शिक्षा का खर्च उठा सकें। आपकी एक छोटी-सी मदद इस बच्ची का भविष्य संवार सकती है!

आशा की पढ़ाई के लिए डोनेट करने के लिए आप सीधा श्वास के अकाउंट में ट्रांसफर कर सकते हैं:

Account Name: Shwas Charitable Trust
Bank A/c Number: 29760100021099
Bank Name: Bank of Baroda
IFSC Code: BARB0LAWAHM
Bank Branch: Bank of Baroda Tower, Ellisbridge

किंजल शाह से संपर्क करने के लिए उनकी वेबसाइट देखें या फिर उनके फेसबुक पेज पर जाएँ!

संपादन: मनोज झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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