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इंजीनियर की नौकरी छोड़ राजस्थान और झारखंड के गांवों में पानी की समस्या हल कर रहा है यह युवक!

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ज शायद ही कोई इस बात से अनजान होगा कि धरती पर पानी की कितनी कमी होती जा रही है और आने वाले दिनों में यह कितनी गंभीर समस्या बनने वाली है। इसे लेकर बहुतेरे लोगों ने काफी चिंता ज़ाहिर की है और कुछ ने अपने स्तर पर कदम भी उठाए हैं। पर ऐसे लोग गिने-चुने हैं, जिन्होंने इस समस्या से जूझना अपने जीवन का मकसद ही बना लिया।

 

ऐसे ही लोगों में एक हैं बिहार के शशांक सिंह कछवाहा। सिर्फ 28 वर्ष की उम्र में जब अधिकतर लोग अपना भविष्य सुरक्षित करने और करियर बनाने में लगे होते हैं। इस मैकेनिकल इंजीनियर ने एक प्रतिष्ठित कंपनी की नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी, ताकि इस गंभीर समस्या के निदान के लिए बड़े पैमाने पर काम किया जा सके।

सबसे दायें- शशांक सिंह

हीरो साइकिल में क्वालिटी मैनेजर के रूप में कार्यरत शशांक कुमार के जीवन की दिशा उस दिन बदल गई, जब एक पत्रिका के पन्ने पलटते हुए इनकी नज़र वॉटर हार्वेस्टिंग से संबंधित एक लेख पर पड़ी। यही वह दिन था जब इन्होंने सोचा कि यह विचार कुछ पन्नों में सिमटने और कुछ पाठकों के ज्ञान को बढ़ाने के स्तर से आगे जाना चाहिए, ताकि जरूरतमंदों की सहायता के साथ आने वाली पीढ़ियाँ भी लाभ उठा पाएं। इसी सोच के साथ शशांक इस बड़ी ज़िम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार हुए।

 

बदली छोटा नारायणा गाँव की तस्वीर

2015 में नौकरी छोड़, शशांक SBI के यूथ फॉर इंडिया फ़ेलोशिप से जुड़ गए। 13 महीने के इस प्रोग्राम में नौजवानों को विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिल कर रूरल डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका मिलता है।

फेलोशिप के दौरान ही शशांक ‘बेयरफूट कॉलेज’ नाम की संस्था के साथ मिल कर अजमेर ज़िले के छोटा नारायण गाँव में काम करने गए। वहाँ इन्होंने लोगों को पानी के लिए जूझते हुए देखा। इसके बाद इन्होंने वहाँ एक सूखे पड़े तालाब पर काम करना शुरू किया।

 

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3 साल पहले इस काम को करने के दौरान द बेटर इंडिया को दिए गए साक्षात्कार में इन्होंने बताया, “मैंने इस तालाब को काम करने के लिए इसलिए चुना, क्योंकि इसका जलक्षेत्र बहुत बड़ा है, लगभग 700 बीघा। इसके तैयार होने पर आस-पास के 5 गाँव के 5000 जानवर हर दिन यहाँ पानी पी पाएंगे।”

राजस्थान के गाँव में दी सूखे तालाब को नई ज़िंदगी

 

गाँव के लोगों को इस पहल से जोड़ा

 

गाँव के लोग भी आये आगे

 

छोटा नारायण गाँव को मिली ज़िंदगी 

शशांक सिंह ने यह निर्णय भी लिया कि इसमें वह किसी भी मशीन का इस्तेमाल न कर, गाँव वालों को नियुक्त करेंगे, ताकि यह परियोजना इस समुदाय की अपनी परियोजना बन पाए और साथ ही लोगों को रोजगार भी मिल सके।

इस परियोजना की सफलता के बारे में पूछने पर शशांक सिंह बताते हैं, “यह सफल रही। आज पाँच गाँव के जानवर यहाँ पानी पीने आ रहे हैं, साथ ही इससे आस-पास के 50 कुँओं में पानी रिचार्ज हुआ।”

 

मोटरसाइकिल अभियान से फैलाई जागरूकता

 

 

शशांक की फ़ेलोशिप पूरी हो गई, पर इनके कदम नहीं रुके। इन्होंने इसके बाद रेन वॉटर हार्वेस्टिंग के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए एक मोटरसाइकिल अभियान शुरू किया।

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64 दिन चले इस अभियान के बारे में ये बताते हैं, “यह अभियान राजस्थान से कन्याकुमारी, रामेश्वरम और वहाँ से उड़ीसा तक का था। मैंने विभिन्न संगठनों से संपर्क कर, अलग-अलग स्कूलों-कॉलेजों में कैम्पेन कर लोगों को रेन वॉटर हर्वेंस्टिंग के प्रति जागरूक करने की कोशिश की। इसी क्रम मे अन्ना हजारे और शरद पवार से भी मुलाक़ात की।”

20 सितंबर से 24 नवम्बर तक चलाई गई यह मुहिम नोटबंदी के कारण पूरी तो नहीं हो पाई, पर यह प्रभाव छोड़ने में सक्षम रही।

 

आगामी रसाबेदा गाँव परियोजना

रसाबेदा गाँव की एक तस्वीर

इसके बाद इन्होंने झारखंड की ओर अगला रुख किया। फेलोशिप के दौरान ही इनकी मुलाक़ात झारखंड के आदिवासी गाँव में काम कर रहे समाजसेवक और औरतों को माहवारी से संबंधित स्वच्छता के प्रति जागरूक करने की अपनी कोशिश के कारण, ‘मंगरू पैडमैन’ के नाम से मशहूर मंगेश झा से हुई।

इन दोनों ने मिल कर ग्राउंड वॉटर एंड रिफॉरेस्टेशन एडप्टिव मैनेजमेंट एसोसिएशन (GRAM) की स्थापना की। फरवरी में शुरू किए गए इस संगठन का पहला प्रोजेक्ट इन्होंने छोटा-नागपुर के पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे-से गाँव रसाबेदा में शुरू किया है।

 

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यह गाँव बेकार पड़े हैंडपम्प, स्वच्छ जल स्रोत की कमी और गिरते जल स्तर जैसी परेशानियों से जूझ रहा है। यहाँ के लोग एकमात्र जल स्रोत छूआ (जलभर) पर निर्भर हैं।

जलभर धरती की सतह के नीचे चट्टानों का एक ऐसा संस्तर होता है, जहां भू-जल एकत्रित होता है और उसे निकाला जा सकता है।

‘छुआ’ की तस्वीरें

 

छुआ से बर्तन धोती महिलाएँ

रसाबेदा के लोग रोज़मर्रा के काम के लिए छूआ पर निर्भर हैं, लेकिन यह पानी प्रदूषित होने के कारण वहाँ कई तरह की बीमारियाँ पनपने का खतरा बना रहता है।

शशांक इस गाँव को स्वास्थ्य, पर्यावरण और जल संबधी समस्या से उबारने के लिए संकल्पबद्ध हैं और इसके लिए कई तरह के कदम उठा रहे हैं।

यह पूछे जाने पर कि इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने क्या सोचा है, वे अपनी योजना के बारे में विस्तार से बताते हैं। इन्होंने बताया,

“इस गाँव में एक हैंडपम्प है जो अक्सर सूख जाता है। इस इलाके में वर्षा अच्छी होती है। इसलिए हम यहाँ के विद्यालय की इमारत की छत पर पानी इकट्ठा कर ज़मीन के नीचे एक टंकी में पानी का कुछ हिस्सा जमा कर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग करेंगे। यहाँ बारिश अधिक होती है और इतना पानी इकट्ठा करना मुश्किल है। इसलिए हम बाकी पानी उस तरफ बहा देंगे, जहाँ हैंडपम्प है। इससे वहाँ भूमिगत पानी रिचार्ज होगा। हमने बारिश नहीं होने पर पानी की समस्या को दूर करने के बारे में भी सोचा है। यहाँ से कुछ दूर जो छूआ है, वहाँ बारहों महीने कम मात्रा में पानी निकलता रहता है। हम इस पानी को पाइप द्वारा विद्यालय के नजदीक बनाए गए भूमिगत टैंक में फ़िल्टर कर जमा करेंगे, जिसका लोग इस्तेमाल कर पाएँगे।”

इस पूरे प्रोजेक्ट के खर्च का अनुमान इन्होंने करीब 2.75 लाख रुपए लगाया है। ये धन राशि एकत्रित करने में लगे हुए हैं।

 

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उनके आगे के कदम के बारे में वह बताते हैं कि वे ऐसे ही कई छोटे गाँवों की ओर रुख करेंगे जो ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं और आज तक किसी का ध्यान उस ओर नहीं गया है। इसके साथ ही ये शहर के लोगों में भी जागरूकता फैलाना चाहते हैं, जिससे घटते जल स्तर की समस्या गाँवों के साथ ही शहरों में भी खत्म हो।

रसाबेदा परियोजना के बारे में और जानकारी लेने और सहयोग राशि जमा करने के लिए आप यहां क्लिक कर इस कार्य में अपना योगदान दे सकते हैं।

संपादन: मनोज झा


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