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आँखों से दिव्यांग इस किसान ने उगायी फ़सलों की 200+ देसी किस्में, पूरे देश में करते हैं बीज-दान!

“अपनी खेती, अपना बीज, अपना खाद, अपना स्वाद!”

यह नारा है उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के तड़िया गाँव के 60 वर्षीय किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी का। मात्र 8वीं कक्षा तक पढ़े प्रकाश सिंह न सिर्फ़ जैविक किसान हैं, बल्कि वे बीज उत्पादक भी हैं। लगभग पिछले 24 सालों से प्रकाश सिंह प्राकृतिक ढंग से स्वदेशी बीज की प्रजातियाँ विकसित कर रहे हैं।

गेहूँ, धान, दाल और कई तरह की सब्ज़ियों के बीजों की अलग-अलग किस्में तैयार करने के साथ-साथ प्रकाश सिंह देश-विदेश के किसानों को प्राकृतिक खेती करना और खुद बीज तैयार करना भी सिखाते हैं। अपने ‘बीजदान महादान’ अभियान के अंतर्गत उन्होंने 10 हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा भारत-भ्रमण किया है और देशभर में बिना पैसे लिए उन्नत किस्म के स्वदेशी बीज किसानों को बांटे हैं। आज कोई भी उनके गाँव जाकर उनके स्वदेशी बीज बैंक से मुफ़्त बीज ले सकता है।

प्राकृतिक रूप से बीज विकसित करने का हुनर उन्होंने अपने पिताजी से सीखा। उनके पिताजी एक प्राइमरी शिक्षक थे और साथ ही एक बेहतरीन किसान भी।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए प्रकाश सिंह ने कहा, “वह 1964-65 का दौर था, जब भारत में गेहूँ के बीजों की नई-नई किस्में आ रही थीं। मेरे पिताजी ने किसानों की मदद के लिए इन बीजों के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उठाया। बहुत-से कृषि मेलों में जाकर वे किसानों को बीज बांटते और उन्हें अच्छी फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करते।”

उनके पिताजी ने अपने सभी बच्चों को अच्छे से पढ़ाया-लिखाया, पर एक दुर्घटना के कारण प्रकाश सिंह की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। साल 1977 में उन्हें पेंसिलिन के इंजेक्शन का रिएक्शन हो गया और लगभग 6 महीने तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा। इस रिएक्शन का सबसे बुरा असर उनकी आँखों पर पड़ा।

प्रकाश सिंह रघुवंशी

उन्होंने बताया, “मेरी आँखों में अंदर ही अंदर घाव हो गया था। इतना बुरा रिएक्शन था कि मेरी पलकों के बाल भी आँख की पुतली से चिपकने लगे थे और हर 3-4 दिन में मेरी पलकों के बाल काटे जाते थे। इससे उबरने में मुझे काफ़ी वक़्त लगा। तब से ही मैं नज़र का चश्मा लगाता हूँ और अब तो मेरी आँखों की रोशनी लगभग जा ही चुकी है।”

प्रकाश सिंह की शादी इस घटना से एक साल पहले साल 1976 में ही हो गई थी। शादी के बाद उन पर अपने परिवार की भी ज़िम्मेदारी आ गई। लेकिन अपनी खराब तबीयत और आँखों की रौशनी कम होने के चलते वे ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते थे और मात्र ढाई एकड़ ज़मीन की खेती पर ही निर्भर थे।

लेकिन अपने परिवार का जैसे-तैसे निर्वाह करने वाले प्रकाश सिंह कुछ ऐसा करना चाहते थे कि वे अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे पाएं। पर उन्हें कहीं से भी कोई रास्ता नज़र नहीं आता था। सगे-संबंधी भी उनकी मदद को आगे नहीं आते थे, क्योंकि उन्हें लगता कि वे कहीं उन्हीं पर बोझ न बन जाएँ। प्रकाश सिंह भी अपने दम पर ही कुछ करना चाहते थे।

उन्होंने कहा, “लेकिन मुझे लगता कि मैं क्या कर सकूँगा, न तो कुछ ख़ास पढ़ा-लिखा हूँ और न ही शारीरिक रूप से इतना स्वस्थ हूँ कि कुछ अलग काम कर सकूँ। जब कहीं कोई रास्ता नहीं मिला, तो बचपन से अपने पिता से सीखा हुआ पौधों को परखने का हुनर काम आया।”

फरवरी, 1995 में प्रकाश सिंह अपने खेतों में टहल रहे थे और गेहूँ की फसल को देख रहे थे। तभी उनकी नज़र एक पौधे पर पड़ी। गेहूँ का यह पौधा बाकी दूसरे पौधों से अलग था। इसका तना बाकी पौधों से अधिक मोटा था और इस पौधे में 10-12 बालियाँ लगी थीं। प्रकाश सिंह ने इस पौधे के बारे में तुरंत अपने पिताजी को बताया। पिताजी ने उन्हें कहा कि इस पौधे के बीज की किस्म बाकी पूरी फसल से अलग होगी। बस, फिर प्रकाश सिंह को अपना रास्ता मिल गया और उन्होंने पूरी लगन से इस एक पौधे की देख-रेख की।

कटाई का समय आने पर बाकी पूरी फसल काट ली गई। लेकिन उस एक पौधे को तैयार होने में और थोड़ा वक़्त लगा। इस पूरे समय के दौरान प्रकाश सिंह हर रोज़ उस पौधे की देखभाल करते, ताकि कोई जानवर उसे खराब न कर दे या फिर किसी और वजह से वह पौधा गिर न जाए। जब वह बिल्कुल पक गया, तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर इसके बीज निकाले। एक बाली से उन्हें लगभग 130 बीज मिले और पूरे पौधे की 10-12 बालियों से कुल 1000 दाने उनके पास इकट्ठे हो गए। उनकी पत्नी ने इन बीजों को बहुत ही सहेजकर रखा।

उनकी गेंहू की बालियाँ

प्रकाश सिंह ने कहा, “फिर गेहूँ का अगला मौसम आने पर हमने उन बीजों को लगाया और उन थोड़े-से बीजों से ही हमें बहुत उपज मिली। 1-2 सालों तक हमने इसी तरह उस बीज की फसल ली और फिर से हमने अपने खेतों में अलग-अलग किस्म के पौधे देखे।”

प्रकाश सिंह कृषि वैज्ञानिकों से मिले और जानना चाहा कि आखिर कैसे एक किस्म की फसल में एक-दो अलग किस्म के पौधे उग जाते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि ऐसा नैचुरल क्रॉस पोलिनेशन से सम्भव है।

साल 2000 तक उन्होंने गेहूँ, धान और कुछ दालों की कई तरह की किस्में इजाद कर ली। वह बताते हैं कि उन्होंने इन सभी अलग-अलग किस्मों का डाटा रिकॉर्ड किया और फिर अपनी पत्नी के साथ मिलकर सबको नाम दिया। उन्हें गेहूँ का वह अलग पौधा प्राकृतिक रूप से मिला था, इसलिए उन्होंने सबसे पहले गेहूँ के उस बीज को ‘कुदरत’ नाम दिया और फिर आगे जो उन्होंने अलग-अलग बीज विकसित किए, उन्हें कुदरत-7, कुदरत-9, तो धान की किस्मों को कुदरत 1, कुदरत 2 और लाल बासमती नाम दिया।

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अब तक प्रकाश सिंह रघुवंशी गेहूँ के लगभग 80, धान के 25 और दालों के 10 से भी ज़्यादा और इसके अलावा सरसों, मटर आदि के 200 से ज़्यादा किस्म के स्वदेशी बीज विकसित कर चुके हैं। वे इन सभी बीजों को जैविक खाद से ही तैयार करते हैं। उनके नाम 6 फीट की लौकी के बीज तैयार करने का भी रिकॉर्ड दर्ज है।

बीज दान- महादान यात्रा

साल 2003 में प्रकाश सिंह अपने सभी बीजों की 25-25 ग्राम की पुड़िया बनाकर और कुछ फसलों के पौधे लेकर, महाराष्ट्र के पुणे में एक कृषि मेला में पहुँचे। यहाँ के आयोजकों को जब उन्होंने यह बताया कि वे खुद विकसित किए हुए देसी बीज मुफ़्त में किसानों को वितरित करना चाहते हैं तो उन्हें बिना किसी शुल्क के एक स्टॉल मिल गया।

प्रकाश सिंह ने बताया, “मुझे जो कुछ भी मिला था, प्रकृति से मिला था। आँखों की रोशनी कम होने के बावजूद खेत में खड़ी फसल में भी मैं अलग किस्म के पौधे को पहचान लेता, यह कुदरत का दिया हुनर नहीं था तो क्या था? मैं प्रकृति की इस रहमत को सबसे बांटना चाहता था, ताकि लोग देसी बीजों का इस्तेमाल करें। इसलिए मैंने बीजदान का अभियान शुरू किया।”

पुणे में उन्होंने जितने भी किसानों को बीज बांटे, उन्हें फायदा मिला। बहुत-से किसानों ने उनसे साल भर बाद फिर संपर्क किया और अपने यहाँ बुलाया। कई जगह उन्हें सम्मानित भी किया गया। इसके बाद प्रकाश सिंह ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज तक उनका ‘बीजदान-महादान’ जारी है। पूरे देश में किसान उन्हें जानते हैं और कई छोटे-बड़े संगठन जैसे राष्ट्रीय अस्मिता मंच, माधवाश्रम आदि से उनका टाई-अप है।

 

इनके ज़रिए वे किसानों तक अपने बीज पहुँचाते हैं। उनकी बीज यात्रा के बारे में जानकर बहुत से लोग उनकी आर्थिक मदद के लिए भी आगे आए हैं। वह बताते हैं कि बहुत से लोगों द्वारा मिले गुप्त दान की वजह से ही उनकी बीज यात्राएँ इतनी सफल रहीं और उन्होंने अपने गाँव में अपने घर में भी अपनी पत्नी शकुंतला के नाम से ‘स्वदेशी बीज बैंक’ शुरू किया है।

साल 2007 में हनीबी नेटवर्क के संस्थापक अनिल गुप्ता जी से उनकी मुलाक़ात हुई और उनके प्रयासों के चलते प्रकाश सिंह को नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड भी मिला। फिर साल 2008 में उन्हें वंदना शिवा के साथ इटली जाने का मौका मिला। अलग-अलग जगहों पर उन्होंने किसानों को देसी बीजों के इस्तेमाल और जैविक खेती करने के लिए जागरूक किया। साथ ही, उन्होंने किसानों के बीच आत्महत्या के खिलाफ़ भी अभियान चलाया।

प्रकाश सिंह ने कहा, “नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने मुझे मेरे बीज की किस्मों का पेटेंट भी करवा कर दिया। इसके बाद बहुत सी प्राइवेट कंपनियाँ मेरे पास पेटेंट खरीदने आईं, लेकिन मैं जानता था कि अगर इन कंपनियों को मैंने अपने अधिकार बेच दिए तो मुझे तो पैसे मिल जाएँगे, लेकिन फिर गरीब किसान भाइयों का क्या होगा। अभी तो वो मेरे यहाँ से मुफ़्त में बीज ले जाते हैं और फिर अपना बीज बना लेते हैं, लेकिन पेटेंट बेच देने के बाद उन्हें बीज खरीदना पड़ेगा। इसलिए मैंने कभी किसी को अपना पेटेंट नहीं बेचा, क्योंकि इन बीजों पर सिर्फ़ किसान का हक़ है।”

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के बाद उन्हें कई राज्यों, प्राइवेट फर्मों और सरकार ने भी अलग-अलग सम्मानों से नवाज़ा है। कुछ समय पहले उन्हें खेती के क्षेत्र में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिला। आज विदेशों से भी लोग उनसे बीज तैयार करने की ट्रेनिंग लेने आते हैं।

अपना पूरा जीवन किसानों के लिए प्राकृतिक रूप से बीज तैयार करने में लगाने वाले प्रकाश सिंह कहते हैं कि हमारे देश में आज भी अच्छे लोगों की कमी नहीं है। बस आपको पहचानना आना चाहिए। कोई बुरा नहीं है, बस मज़बूरी इंसान से बुरे काम करवा देती है। इसलिए कभी किसी की मदद करने से पीछे न हटो।

वह युवाओं के लिए संदेश देते हैं, “पूर्वजों का परम्परागत ज्ञान ही हमारे भविष्य की कुंजी है। इसे आगे बढ़ाना होगा और कोई काम मुश्किल नहीं है, अगर आपका इरादा मजबूत हो। किसानों को हाइब्रिड बीज खरीदने की बजाय अपने खुद के बीज विकसित करने चाहिए और यदि किसी भी किसान को इसमें परेशानी आती है, तो वह ट्रेनिंग के लिए मुझे संपर्क कर सकता है।”

अब प्रकाश सिंह रघुवंशी का सपना देसी बीजों के रख-रखाव और उत्पादन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का है। वे चाहते हैं कि उन्होंने बीजों की जितनी भी किस्में विकसित की हैं, उन्हें भविष्य के लिए सहेजा जाए। साथ ही, वे एक ट्रेनिंग सेंटर बनाना चाहते हैं, जहाँ लोगों को प्राकृतिक तरीकों से बीज विकसित करने की ट्रेनिंग मिले। लेकिन अपने इस उद्देश्य के लिए उन्हें लोगों के सहयोग की ज़रूरत है।

यदि आपको इस कहानी ने प्रेरित किया है तो आप प्रकाश सिंह रघुवंशी से जुड़ने के लिए या फिर उनका आर्थिक सहयोग करने के लिए 9839253974 पर संपर्क कर सकते हैं।

संपादन: मनोज झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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