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ट्यूशन पढ़ाकर 50 से ज़्यादा बेसहारा कुत्तों की देखभाल कर रही है इंजीनियरिंग की यह छात्रा!

रियाणा में सोनीपत की रहने वाली शैनदीप अरोड़ा इंसानियत और नेकदिली की मिसाल हैं। बायोटेक्नोलॉजी में इंजीनियरिंग कर रहीं, 20 साल की यह युवती अपनी गली में बेसहारा घुमने वाले 50 से भी ज़्यादा कुत्तों की देखभाल कर रहीं हैं।

शैनदीप इन बेज़ुबान जीवों का ख्याल बिल्कुल अपने परिवार की तरह रखती हैं। उन्हें दोनों वक़्त नियमित रूप से खाना खिलाने के अलावा, वे इनके बीमार पड़ने पर इन्हें जानवरों के डॉक्टर के पास भी लेकर जाती हैं।

सिर्फ़ शैनदीप ही नहीं बल्कि उनका पूरा परिवार जानवरों के प्रति अपार स्नेह और ममता का भाव रखता है। इसका पूरा श्रेय वे अपने ननिहाल को देती हैं, जहाँ ऐसे बहुत से जानवर हुआ करते थे, जिनकी वे देखभाल करते। अपने ननिहाल में पलने-बढ़ने वाले जानवरों की कहानियाँ सुनकर बड़ी हुईं शैनदीप का भी पर्यावरण और जानवरों के प्रति गहरा लगाव हो गया।

सड़क पर किसी बेज़ुबान जीव के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर जहाँ लोग मुंह फेर कर निकल जाते हैं, वहीं शैनदीप ने अब तक सड़क दुर्घटनाओं में घायल हुए कई कुत्तों और उनके छोटे बच्चों को नई ज़िंदगी दी है।

शैनदीप सिंह

“लगभग 2 महीने पहले ही घर के बाहर रोड पर एक गाड़ी से कुत्ते के छोटे-से बच्चे को बहुत गहरी चोट आई थी। मैं और पापा उसे तुरंत डॉक्टर के पास लेकर गये। हमसे कई डॉक्टरों ने कहा कि उसे बचा पाना मुश्किल है, पर मैं हार नहीं मानना चाहती थी। उसके सही इलाज के लिए हम उसे दिल्ली लेकर गये और वहां उसकी सर्जरी हुई,” शैनदीप ने बताया। उस कुत्ते के इलाज के बाद भी शैनदीप ने उसे अपने घर में ही रखा और उसकी देखभाल की।

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यह पहली बार नहीं है जब शैनदीप ने किसी जानवर के इलाज के लिए इतना कुछ किया हो। इससे पहले भी वे दो-तीन कुत्तों का इलाज करवा कर उनकी ज़िंदगी बचा चुकी हैं।

कई बेजुबानों की ज़िंदगी बचा चुकी हैं शैनदीप अरोड़ा

शैनदीप सुबह कॉलेज जाने से पहले गली में अपने इन दोस्तों को खाना खिलाना नहीं भूलती। उनकी एक आवाज़ पर ये सभी दौड़े चले आते हैं। अपनी गली मे कुत्तों को खाना खिलाने के अलावा शैनदीप अपनी यूनिवर्सिटी में भी असहाय घूमने वाले कुत्तों के लिए खाना लेकर जाती हैं। वहां भी जैसे ही उन्हें वक़्त मिलता है, वे इन मासूमों को खाना खिलाने के लिए निकल जाती हैं।

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शैनदीप की इस नेकदिली से जहाँ उनके आस-पड़ोस के लोग कई बार उनके ख़िलाफ़ हो जाते हैं, वहीं डॉ. कमल जैसे भी लोग हैं, जो उनके इस काम में हर तरह से उनकी मदद करते हैं। डॉ. कमल जानवरों के डॉक्टर हैं और जब भी शैनदीप उन्हें फ़ोन करती हैं, वे तुरंत आकर उनकी मदद करते हैं।

“अच्छे लोगों के साथ-साथ बहुत से ऐसे पड़ोसी भी हैं, जो कहते हैं कि क्या ज़रूरत है गली में इस तरह जानवरों को इकट्ठा करने की। हमारे घर के सामने ही पार्क है, लेकिन वहां भी अगर ये चले जाएँ तो गार्ड अंकल इन्हें मारकर भगा देते हैं। पर मैं इन चुनौतियों से नहीं डरती क्यूंकि आख़िरकार मुझे यह पता है कि मैं एक नेक काम कर रही हूँ,” उन्होंने आगे कहा।

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शैनदीप के इस काम में उनके माता-पिता उनका पूरा साथ देते हैं। जहाँ उनकी माँ हर सुबह इन बेजुबान जानवरों के लिए खाना तैयार करती हैं, वहीं इनकी साफ़-सफाई में शैनदीप के पिता और भाई उनकी मदद करते हैं।

शैनदीप अपने माता-पिता के साथ

शैनदीप के इन दोस्तों के खाने-पीने या फिर उनकी स्वास्थ्य सेवाओं में कोई कमी न आये, इसके लिए कॉलेज से आने के बाद वे ट्यूशन पढ़ाती हैं। शाम के 4-5 बजे से लेकर रात के 8 बजे तक वे बच्चों को ट्यूशन देती हैं। इससे उन्हें महीने के लगभग 7, 000 रूपये मिल जाते हैं, जिन्हें वे सिर्फ़ इन जानवरों के खाने-पीने और चिकित्सा पर खर्च करती हैं।

“मैं एक मिडिल-क्लास फैमिली से हूँ, इसलिए जितना भी हमसे इनके लिए हो पाता है, हम करते हैं,” शैनदीप कहती हैं।

आज शैनदीप 60 से भी ज़्यादा बेसहारा कुत्तों की देखभाल कर रही हैं। उन्होंने अपने घर के बाहर इनके लिए दो छोटे-छोटे शेल्टर भी बनवाये हैं, जहाँ पर ये जीव किसी भी मौसम में आकर आराम से सो सकते हैं।

सर्दियों में इनके लिए रजाई और गर्म कम्बल आदि की व्यवस्था भी शैनदीप करती हैं।

 

वे आगे बताती हैं कि उन्हें न सिर्फ़ जानवरों से बल्कि प्रकृति से भी बहुत लगाव है। इसलिए जब भी वे आजकल के बच्चों को पेड़-पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की बजाय स्मार्ट फ़ोन में बिजी पाती हैं, तो उन्हें बहुत दुःख होता है। इसलिए शैनदीप के पास ट्यूशन पढ़ने आने वाले बच्चों को वे प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहना भी सिखाती हैं।

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ये उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि अब उनके छात्र अपने जन्मदिन पर पेड़ लगाना चाहते हैं और इन जानवरों को खाना खिलाना चाहते हैं।

शैनदीप इसे ही अपनी जीत मानती हैं। उनका कहना है कि यदि कोई भी उनसे प्रेरित होकर एक छोटा सा भी कदम उठाये, तो यह भी उनेक लिए बहुत है।

उनका यह भी कहना है, “हमारे यहाँ जानवरों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की भारी कमी है। इसलिए मेरा मानना है कि हर एक शहर में कम से कम एक ऐसा संगठन हो, जो 24 घंटे जानवरों के लिए काम करे। यदि किसी इमरजेंसी में उन्हें फ़ोन किया जाये तो वे तुरंत आयें। अगर ऐसा कुछ होगा, तो वे लोग भी आगे आयेंगें जो मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन अपने यहाँ जानवरों को रख नहीं सकते।”

अंत में वे सिर्फ़ इतना ही कहती हैं कि अगर लोग किसी का अच्छा नहीं कर सकते, तो किसी के लिए बुरा भी न करें और जो अच्छा करना चाहते हैं, उन्हें उनका काम करने दें। अगर आप ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते, तो ज़िंदगी के प्रति अपना नज़रिया सकारात्मक रखिये। आप देखेंगे कि आपके जीवन की बहुत सी चिंताओं से आपको मुक्ति मिल जाएगी।

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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