in ,

उत्‍तराखंड की लिखाई कला – वक्‍़त ने किया क्‍या हसीं सितम!

ल्‍मोड़ा के पिछले सफ़र में महसूस किया कि पहाड़ों के बाज़ार की रौनक और दुकानों-मकानों के दरवाज़ों-खिड़कियों पर काठ की कलाकारी अब चुप पड़ने लगी है। लकड़ी के दरवाज़ों और चौखटों की विदाई वेला अब ज्‍यादा दूर नहीं है। धरोहरों का चुपचाप, हौले-हौले सिमटना बेशक, चौंकाता नहीं है, लेकिन इस तीखे अहसास ने मुझे भीतर तक बींध डाला था कि इसके साथ ही एक भरपूर सांस्कृतिक परिवेश हमेशा के लिए नष्‍ट होने के कगार पर है।

 

नहीं रहे खोली के गणेश

यह द्वार आज भी बहुत कुछ कहता है अपने गुजरे अतीत के बारे में

 

एक ज़माना हुआ जब हर घर की देहरी से गुजरते हुए लकड़ी के दरवाज़ों के ऊपर की मेहराबों के बीचों-बीच से गणेश की मूरत झांका करती थी। घरों के मुख्यद्वार को खोली कहते हैं, और इस तरह गणेश हो गए खोली के गणेश। अब चूंकि घर आरसीए के बनने लगे हैं, सीमेंट की छतें, कंक्रीट की दीवारें और एल्युमीनियम-स्टील के दरवाज़े-खिड़कियां, तो नक्काशियों में गणेश के मोटिफ भी गुम हो चुके हैं। घरों में न बचे हैं काष्ठकला की नक्काशियों के अद्भुत नमूनों वाले द्वार और न खोली के गणेश!

बचपन में जब इन गांवों से गुजरना होता था तो लिखाई कला से सजे द्वार-खिड़कियों के दर्शन होते थे। जो घर जितना समृद्ध होता, उसके द्वार-चौखटों की कारीगरी भी उतनी ही समृद्ध होती। इन नक्‍काशीदार द्वार-खिड़कियों को देखकर लगता जैसे पूरी बस्ती को किसी कारीगर के हाथों का दिव्‍य स्पर्श मिला हो। 19वीं सदी में यह पहाड़ी काष्ठकला अपने शबाब पर थी।

उस दौर में शिल्‍पकार को समाज में सम्मान प्राप्त था। दरअसल, काठ से खेलने वाले उन शिल्पियों को हुनर का वो व्‍याकरण जुबानी याद था जिस पर बड़े-बड़े ग्रंथ रचे गए थे। काष्ठ-शिल्प पर बात करने वाले प्राचीन ग्रंथों बृहत संहिता औरशिल्प शास्त्र में पेड़ों को काटने के मौसम, उनकी रीति, उन्हें सुखाने और उनसे शिल्प गढ़ने के विधि-विधान सिमटे थे। ये ग्रंथ काठ से खेलने वाले शिल्‍पकारों की महिमा को स्‍वीकार करते थे।

 

काष्‍ठकला का फलक रहा है विशाल

उत्तराखंड ही क्या, कश्मीर, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, हिमाचल से लेकर पूर्वोत्तर, तमिलनाडु-केरल और कई दूसरे राज्यों में काष्ठकला के दर्शन हमेशा से होते आए हैं। मोटिफ, डिजाइन, विषयवस्तु, शैली जैसी खूबियों को ‘लोकल’ तत्वों ने निर्देशित किया है। अब इस कलात्मक प्रभाव के पीछे हमें उत्तराखंड में बीती सदियों में हुए ‘माइग्रेशन’ के साक्षात् दर्शन हों, तो कोई आश्चर्य नहीं! सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में मराठों, मुगलों के आतंक के चलते मध्य भारत के लोगों को उत्तराखंड किसी पनाहगाह से कम नहीं लगा था। आज भी उत्तराखंड के जोशी खुद को गुजरात से, पंत अपने पुरखों को महाराष्ट्र से और पांडेय अपनी जड़ों को उत्तर प्रदेश से जोड़ते हैं। इस तरह, उत्तराखंड के स्थानीय रसों में गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर के मैदानी इलाकों के रसों ने मिलकर रसानुभूति को बढ़ाया। इतिहासकारों का मत है कि उस दौर के शिल्पकारों का कश्मीर, गांधार, उत्तर भारत एवं मध्य भारत तक से संपर्क था, और उनकी कला में ये संपर्क खूब अभिव्यक्ति पाते रहे।

कुछ इतिहासकार उत्तराखंड के दरवाज़ों-झरोखों में नेपाल के भक्तपुर की नेवाड़ी परंपरा का प्रभाव देखते हैं। 17वीं सदी में गोरखा हमले और उसके बाद यहां स्‍थापित गोरखा शासन ने उत्तराखंड की संस्कृति को प्रभावित किया। उधर, तिब्बत के साथ व्‍यापार के चलते गढ़वाल-कुमाऊं में हुए माइग्रेशन ने भी इस पहाड़ी समाज पर अपने प्रभाव छोड़े। इस तरह पहाड़ी आर्किटैक्‍चर में सदियों की अनुभूतियां समायी हुई हैं।

धरोहर में दरार

अल्मोड़ा जिले में जागेश्वर मंदिर के सामने धराशायी होती पुरानी इमारत

आज कुमाऊंनी कारीगर की कार्यशाला में सून है। नक्काशीदार काठ के दरवाज़ों, चौखटों, आलों, खिड़कियों की फरमाइश करने वाले ही नहीं बचे तो कारीगर कब तक बचेंगे। राजे-रजवाड़े, रईस, जमींदार, महाजनों के युग बीत गए जो इन नक्काशीदार दरवाज़ों-चौखटों के कद्रदान हुआ करते थे। यहां तक कि साधारण घरों में भी काष्ठकला के नमूने आम थे, जो दरअसल एक सिलसिले के जारी रहने के सूचक थे। मगर आज वही नक्काशीदार द्वार-चौखट उसी परंपरा के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे की ओर इशारा करते हैं। किसी चौखट में बूटा नहीं रहा तो किसी द्वार पर देवी-देवता, पेड़-पौधे, जानवरों, फूलों, यक्ष-यक्षिणियों के मोटिफ हमेशा-हमेशा के लिए नष्ट हो चुके हैं।

तुन का संकट ले डूबा लिखाई कला

पहाड़ों में तुन, देवदारू, चीड़ जैसे पेड़ों की कटान पर रोक लगी तो किसे पता था कि जोखिमग्रस्त पर्यावरण को बचाने की खातिर उठाए इस कदम से उत्तराखंड की काष्ठकला ही खतरे में आ जाएगी। तुन की कठोर मगर लचीली लकड़ी पर लिखाई की काष्ठकला ने इस प्रतिबंध के बाद धीरे-धीरे दम तोड़ना शुरू कर दिया। चौखटों-दरवाज़ों के कारीगर ‘कच्चा माल’ नहीं मिलने से बेकार होते रहे। दरअसल, आधुनिक विकास ने जब-जब पर्यावरण के वजूद को चुनौती दी है तो सबसे बड़ा जोखिम उन कारीगरों, कलाकारों, घुमंतू जनजातियों, मछुआरों और कारीगरों को उठाना पड़ा है जो अपने पारंपरिक व्यवसायों के लिए अपने आसपास के वातावरण पर निर्भर करते हैं। इस तरह, हर जगह की अद्भुत खूबियां कालग्रस्त हो जाती हैं। अमूर्त विरासत से लेकर लिखाई जैसी काष्ठकला के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। और यह इतना चुपचाप होता है कि और इतनी धीमी रफ्तार से होता है कि जब तक समझ में आता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है।


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

शेयर करे

Written by अलका कौशिक

अलका कौशिक की यात्राओं का फलक तिब्बत से बस्तर तक, भूमध्यसागर से अटलांटिक तट पर हिलोरें लेतीं लहरों से लेकर जाने कहां-कहां तक फैला है। अपने सफर के इस बिखराव को घुमक्कड़ साहित्य में बांधना अब उनका प्रिय शगल बन चुका है। दिल्ली में जन्मी, पली-पढ़ी यह पत्रकार, ब्लॉगर, अनुवादक अपनी यात्राओं का स्वाद हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने की जिद पाले हैं। फिलहाल दिल्ली-एनसीआर में निवास।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

कौवा है, घड़ा है, कंकड़ है, पानी है 

झारखंड: चपरासी का काम करते हुए भी बेटों को बनाया आईएएस, डॉक्टर और इंजिनियर!