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एक बार साँप ने काटा, दो बार तस्करों ने चलायी गोलियाँ, फिर भी किया 17, 000+ सांपों का रेस्क्यू!

पूरी दुनिया में पाई जाने वाली साँपों की लगभग 2, 000 प्रजातियों में से, 272 प्रजाति भारत में पाई जाती हैं। जिनमें 10 सेंटीमीटर के वर्म साँप से लेकर 6 मीटर से भी ज़्यादा लंबे अजगर, कोबरा आदि शामिल हैं। भारत में मिलने वाले इन साँपों में 80% साँप जहरीले नहीं होते हैं और इंसानों के लिए खतरनाक नहीं हैं। (स्त्रोत)

फिर भी आये दिन आप ग्रामीण इलाकों की खबरों में लोगों द्वारा किसी न किसी साँप के मारे जाने के बारे में पढ़ सकते हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, हर साल देश में 40, 000 से भी ज़्यादा साँप मारे जाते हैं। इन बेज़ुबान जीवों और इंसानों के बीच का मतभेद इसका मुख्य कारण है- जागरूकता की कमी। जिसके चलते अक्सर लोग साँप जैसे जीव को देखकर डर जाते हैं और हड़बड़ी में वे उन्हें मारने को दौड़ पड़ते हैं।

“अगर हम अपने जंगली जीवों को नहीं बचायेंगें, तो एक दिन धरती से मानव जीवन भी समाप्त हो जायेगा। बहुत ज़रूरी है कि लोगों को सही जानकारी दी जाये। उन्हें समझाया जाये कि वे इन जीवों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, इन्हें प्रकृति जैसे जंगलों में, तालाबों में छोड़ा जा सकता है। पर यह बड़ी ज़िम्मेदारी है और इसके लिए सबको आगे आना होगा,” यह कहना है ‘पीपल फॉर एनिमल्स- अंगुल यूनिट’ के चेयरमैन बिप्लब महापात्रा का।

बिप्लब महापात्रा

बचपन से ही जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील रहे बिप्लब ने पत्रकारिता की पढ़ाई की। उनकी अपनी प्रिंटिंग फर्म- ‘टाइगर प्रेस’ भी है। बहुत-सी जगह फ्रीलांस पत्रकार के तौर पर काम करते हुए, अक्सर वे पहाड़ों और घने जंगलों में घुमने निकल जाते थे। पहाड़ों में उनकी यात्राओं ने उनके दिल में प्रकृति के प्रति और भी प्रेम भर दिया। पत्रकारिता करते हुए भी बिप्लब हमेशा ही जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए कार्यरत रहे।

“मैं हमेशा ही ऐसे लोगों से जुड़ा रहा जो कि जंगली जीवों के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन आदि करते हैं। उन्हीं में से एक अमित कुमार गुप्ता हैं, जो कि मेरे लिए बड़े भाई की तरह हैं। वे काफ़ी समय से ऐसे अभियानों से जुड़े हुए हैं और उनसे मुझे काफ़ी-कुछ सीखने को मिला। पर साल 2012 में एक घटना के बाद मैंने फ़ैसला किया कि मैं खुद को पूरी से इसी काम के लिए समर्पित करूँगा,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए बिप्लब महापात्रा ने बताया।

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उन्होंने कहा कि एक दिन उन्हें अंगुल से कुछ दूरी पर स्थित एक गाँव से फ़ोन आया कि वहां गाँववाले किसी अजगर को मारने पर आमादा हैं। क्योंकि उस अजगर ने एक गाँववाले की बकरी को निगल लिया था। फ़ोन पर सुचना मिलते ही बिप्लब वहां पहुंचे। रास्ते में उन्होंने कॉल पर ही गुप्ता जी से बात करके सभी ज़रूरी दिशा-निर्देश लिए कि उस अजगर को बचाने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है?

जब बिप्लब गाँव पहुंचे तो उन्होंने देखा कि गाँव के लोग काफ़ी हिंसक हो रहे थे और उनका पूरा इरादा उस बेज़ुबान अजगर को मारना था। पर बिप्लब ने जाकर उन्हें समझाया और बहुत देर तक बहस चलती रही। जैसे-तैसे वे उस साँप को बचाने में कामयाब रहे। पर इस एक घटना से उन्हें समझ में आया कि अभी भी देश में जंगली जीवों के प्रति कितने सारे मिथक है। “सबसे ज़्यादा बुरा था कि ऐसे मामलों में प्रशासन भी कोई कड़ा कदम नहीं उठाता है। जबकि हमारे यहाँ वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट है।”

जंगली जीवन को बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाये जाते हैं
ट्रेनिंग सेशन

इस बारे में अधिक रिसर्च करने पर उन्हें पता चला कि देश में बहुत-सी मौतें साँप के काटने से होती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है ग्रामीण लोगों का अंधविश्वास और सरकार की स्वास्थ्य सुविधाओं का ज़मीनी स्तर पर आभाव। “आज भी गांवों में लोग साँप के काटने पर अस्पताल जाने की बजाय स्थानीय ओझा बाबा के पास झाड़-फूँक के लिए जाते हैं। लोगों को पता ही नहीं है कि सरकारी अस्पतालों में मुफ़्त में एंटी-वेनम (ज़हर से बचने के इंजेक्शन) उपलब्ध होता है,” बिप्लब ने कहा।

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इस तस्वीर को बदलने के लक्ष्य से साल 2012 में बिप्लब ने अंगुल में पीपल फॉर एनिमल्स की यूनिट शुरू की। अपने संगठन के ज़रिए वे न केवल जीव-जंतुओं का संरक्षण करना चाहते थे, बल्कि लोगों का साँप और अन्य जीवों के प्रति नज़रिया बदलना भी उनका उद्देश्य है। पिछले 7 सालों में उन्होंने इस रास्ते पर चलते हुए बहुत-सी परेशानियों का सामना किया। पर कभी भी हार नहीं मानी।

शुरुआत में बिप्लब अपने अन्य दो दोस्त, अमित कुमार गुप्ता और मनोरंजन प्रधान के साथ मिलकर काम करते थे। फिर धीरे-धीरे उनकी टीम से और भी स्वयंसेवक जुड़ने लगे। पहले उन्होंने खुद जानवरों को रेस्क्यू करने की ट्रेनिंग की और आज वे उड़ीसा के अलग-अलग इलाकों में बहुत से उत्साही लोगों को ट्रेनिंग देते हैं। आज उनकी टीम में 50 से भी ज़्यादा लोग काम कर रहे हैं। ये सभी स्वयंसेवक उड़ीसा के अलग-अलग जिलों व इलाकों में काम कर रहे हैं।

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ऐसे में, बिप्लब की पहल न सिर्फ़ अंगुल में बल्कि पूरे उड़ीसा में फैली हुई है। उनकी हेल्पलाइन पर बहुत से गांवों और कस्बों से फ़ोन आते हैं और उनकी टीम तुरंत रेस्क्यू अभियान के लिए निकल पड़ती है।

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अब तक उन्होंने 17, 000 साँप, 500 बिल्ली, 200 पक्षी, 15 बन्दर और 2, 200 और अलग-अलग प्रजाति जैसे कछुआ, गिरगिट, छिपकली आदि को बचाया है!

इसी के साथ उन्होंने इन जीवों को बचाने में एक नया लिम्का रिकॉर्ड कायम किया है। उनसे पहले लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में ऐसा कोई भी रिकॉर्ड नहीं था।

लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में नाम दर्ज

बिप्लब बताते हैं कि पिछले 7 सालों में इस काम को करते हुए उन्होंने बहुत से जोख़िम उठाये हैं। साल 2016 में एक बार उन्होंने रात में एक गाँव के कुएं में से 13-14 फीट के अजगर को निकाला था। एक बार तो उन्हें एक जहरीले साँप ने रेस्क्यू के दौरान काट लिया था। लगभग 5-6 दिनों तक उन्हें अस्पताल में रखा गया।

“उस घटना के बाद मेरे परिवार के मन में भी एक डर बैठ गया था और साथ ही, मैं भी उधेड़-बुन में था कि अब आगे इस काम को जारी रखूं या फिर नहीं। पर इन बेज़ुबान जीवों को बचाना मेरी ज़िंदगी का मिशन बन चूका था। इसलिए इस रास्ते पर जो भी परेशानियां आएं, मुझे पता है कि मुझे सिर्फ़ आगे बढ़ना है,” बिप्लब ने कहा।

वे आगे कहते हैं कि जंगली जानवरों की तस्करी पर लगाम कसने के लिए भी वो काम कर रहे हैं। इस काम में बहुत बार उनका सामना तस्करों से हुआ है और दो बार तो जंगल में जानवरों को बचाते हुए उन पर दो बार गोलियाँ भी चलायी गयीं। यह तो उनकी किस्मत थी कि वो बच गये।

इस तरह की मुश्किलों के अलावा फंडिंग भी बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलती है। शुरुआत में, वन विभाग से भी उन्हें कोई ख़ास मदद नहीं मिलती थी, पर उनके लगातार प्रयासों ने न सिर्फ़ आमजनों को बल्कि अधिकारियों को भी प्रभावित किया है। अब वन-विभाग के अधिकारी भी उनसे ट्रेनिंग लेने के लिए आते हैं।

उनका उद्देश्य लोगों में साँपों के प्रति डर की भावना को खत्म कर उन्हें संवेदनशील बनाना है। साथ ही, वे वर्कशॉप करके लोगों को रेस्क्यू ट्रेनिंग भी देते हैं। यदि किसी के भी यहाँ कोई साँप आदि निकल आये तो कोई भी बिना किसी झिझक के उनकी हेल्पलाइन पर कॉल कर सकता है।

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उनका एक अन्य उद्देश्य है- ‘ज़ीरो स्नेक बाईट डेथ’ यानी कि साँप के काटने से होने वाली मौतों की संख्या उन्हें ज़ीरो करनी है। इसके लिए वे स्कूल, कॉलेज और गांवों में जा-जाकर लोगों को साँप के काटने पर तुरंत अस्पताल जाने के लिए जागरूक करते हैं। अपने इन उद्देश्यों को सफल बनाने के लिए उन्होंने ‘मिशन 100 स्कूल’ भी किया है।

स्कूलों में जाकर जागरूकता अभियान

इसके अंतर्गत उन्होंने 100 स्कूलों में जाकर वहां छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस विषय के बारे में जानकारी दी। आगे बिप्लब बताते हैं कि अंगुल में स्थित झुग्गी-झोपड़ियों से भी कुछ बच्चे उनकी संस्था से जुड़े हुए हैं। “हमारे यहाँ बस स्टैंड पर उस स्लम का एक लड़का साँप का खेल दिखाता था। उसे साँपों के बारे में अच्छी जानकारी थी। इसलिए मैंने उसे अपने संगठन के साथ जोड़ा और उसकी आजीविका के लिए बस-स्टैंड पर ही उसकी बेल्ट, रुमाल, पर्स आदि की एक छोटी-सी स्टॉल शुरू करा दी। आज वह हमारा स्वयंसेवक है और ज़रूरत पड़ने पर रेस्क्यू अभियान करता है। उसी की मदद से उसके और भी साथियों को हमने संगठन से जोड़ा है,” बिप्लब ने बताया।

PAF अंगुल यूनिट का सदस्य राजा, जो अब एक स्टॉल लगता है और साथ ही, रेस्क्यू अभियान करता है

बिप्लब महापात्रा के काम के लिए उन्हें बिजू पटनायक अवॉर्ड और प्रकृति बंधू सम्मान से भी नवाज़ा गया है। इसके आलावा, उनके काम और जागरूकता अभियानों के चलते ही, साल 2015 में उड़ीसा सरकार ने साँप के काटने से मरने वाले व्यक्ति के परिवार को 4 लाख रूपये का मुआवज़ा देना शुरू किया। सरकार की इस योजना के बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी है। इसलिए बिप्लब ने अपनी एक हेल्पलाइन शुरू की है, जहां फ़ोन करके आप इस बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। अब तक उनके यहाँ लगभग 30 लोगों को इस योजना का फायदा मिला है।

आगे की अपनी योजनाओं के बारे में बात करते हुए बिप्लब बताते हैं कि अब उनका उद्देश्य अपना एक शेल्टर होम बनवाना है। जहाँ पर इस जानवरों को रेस्क्यू के बाद रखा जा सके। साथ ही, वे एक एम्बुलेंस सर्विस भी शुरू करना चाहते हैं। आगे उनका कहना है कि स्कूलों में अभी और काम होना है ताकि आने वाली पीढ़ी मानव और प्रकृति के बीच के संतुलन को बनाकर रखे।

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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