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बरकस : हैदराबाद के सीने में अरब की विरासत!

किसी पुराने शहर के अनजान मुहल्‍लों में जाना हुआ है आपका? गाइड बुक्‍स और ब्रोशर्स के पन्‍नों से परे खंगाली है कोई मंजि़ल? अभी तक नहीं तो अगले सफर में करके देखना, क्‍योंकि बड़ा दिलचस्‍प होता है शहर के उन हिस्‍सों से मिलना जिनसे खुद वो शहर भी कभी-कभार ही मिलता है!

अजनबी गलियों में भटकने की जिद लिए मैं पिछले सफर में हैदराबाद के ‘बरकस’ इलाके में चली आयी थी। उस ट्रिप में चारमीनार की हदों से पार, गोलकुंडा के खंडहरों से दूर और रामोजी फिल्‍मसिटी की रौनकों से फ़कत अलग हैदराबाद देखने की जिद को जिया था।

सच पूछो तो ज्‍यादातर हैदराबादी भी ‘बरकस’ के सच से बेज़ार हैं। इस तरफ चले आने पर यमन का दीदार होता है। लबादेनुका थोब और सिर पर चौरस खांचेनुमा डिजाइनों वाली पगड़ियां बांधे, अरबी में गपियाते बुजुर्ग इसकी गलियों में आपका ध्‍यान बांटते हैं।

हालांकि दोस्त आगाह कर चुके थे कि इस पुराने यमनी मुहल्ले में मुझ वेजीटेरियन के लिए कुछ नहीं होगा। कितने गलत थे वो! खालिद के कॉस्मेटिक सेंटर के शेल्फ जर्मनी की नीविया, दुबई के बुर्कों, जावा लुंगी, सऊदी के चश्मों और बैगों से लेकर जाने कितनी किस्म की खुश्बुओं और क्रीमों की दिलफरेब शीशियों-पैकेटों से अटे पड़े थे। पड़ोस की दुकान अचार बेचने वाले जादूगर जैसी थी जहां हर किस्म की सब्जी, फल और यहां तक कि कई तरह के मीट-मांस के अचारों के डिब्बे भरे थे।

खालिद बता रहा था, हमें बरकस में बसे करीब दो सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन सुदूर यमन से हमारे रिश्‍ते आज भी कायम हैं। बरकस से यमन के बीच लोगों का आनाजाना लगा रहता है। और तो और हमने अपनी मूल ज़ुबान, पहनावा, बोलचाल, और खानपान तक बचाकर रखा है। आप इस बस्ती के एक सिरे से दूसरे सिरे को नाप आइये, मजाल आपको यहां बिरयानी मिल जाए! बरकस में यमनी मंडी, खब्सा और हरीस की बहार है…..

हैदराबाद का यह अजब कोना है जहां बिरयानी को कोई नहीं पूछता! अरबी भोजन की परंपरा यहां आज भी जिंदा है। इस बस्ती में ‘मंडी’ का लुत्फ लिया जा सकता है। मंडी यानी हांडी में खास मसालों और खास अंदाज़ में पकाया चावल-गोश्त जो अरबी दुनिया में इतना मशहूर है कि सऊदी का राष्ट्रीय पकवान है। यह हमारी बिरयानी का अरबी संस्करण है। खब्सा (अरबी भात) भी इसी का एक रूप है।

बरकस में गोश्त की दुनिया में मेरा दखल बस इतना ही था कि कुछेक नाम जान लूं, कुछ नज़ारे देख लूं। यहां भी मैं कितनी गलत साबित हुई थी! कुछ गलियों को टपते-टपाते हुए जिस नए इलाके में पहुंची उसकी फितरत ने अपने मोहपाश में लेना शुरू कर दिया था। अब्दुर्रहमान अपनी ठेली पर अंजीर और शहतूत लेकर लौट रहा था। सुना आज भी बरकस में हर सवेरे मेवों की मंडी सजती है, उसी की तैयारी थी। कितनी पुश्तों से हिंदुस्तान की मिट्टी में आबाद है उनका खानदान, इस जोड़-घटा से परे है अब्दुर्रहमान का वर्तमान। मालूम नहीं कब हमारे पुरखे यहां आकर बस गए थे, अफ्रीका, यमन, अरब से आए थे वो लोग, निज़ाम की सेना में नौकरी करने फिर कभी नहीं लौटे। यहीं के होकर रह गए। हमारी शक्लोसूरत, कदकाठी गवाह है हमारी उन जड़ों की ….और इतनी बातचीत के बीच कब अब्दुर्रहमान ने मेरी मुट्ठी में अंजीर की पुड़िया सरका दी, मुझे मालूम भी नहीं हुआ। बदले में पैसे देने की पेशकश की तो नाराज़गी के कुछ लफ्ज़ उनके लबों पर उभर आए थे।खुश रहो! की दुआ का एक थैला भी अंजीर के साथ मुफ्त मिला था जिसे सीने में दबाए मैं आगे बढ़ गई थी।

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निज़ामशाही की सेना से जुड़ा था बरकस का अतीत

हैदराबाद के निज़ाम जब दक्कन पर अपने कब्‍ज़े को कायम रखने की जंग में उलझे तो उन्हें ऐसे ताकतवर और निष्ठावान सैनिकों की जरूरत महसूस हुई जो दुश्‍मनों से जमकर लोहा लो सकें। और तब निज़ामी सेना में यमन से लेकर अफ्रीका तक से भाड़े के सैनिकों की भर्ती की गई। हैदराबाद के एक छोर पर बैरकों में उन्हें पनाह मिली। बीते सालों में इन बैरकों यानी ‘बैरक्‍स’ ने बिगड़कर बरकस की शक्‍ल ले ली। बैरकों की रसोइयों के चूल्‍हों पर चढ़ने वाली हांडियों में जो कुछ पकता, उबलता और खुदबुदाता था, उसे आने वाली पीढि़यों ने आज भी याद रखा है।

असल यमनी पकवानों का लुत्फ उठाना हो तो बरकस चले आइये। रमज़ान में इस बस्ती की रौनक के क्‍या कहने। हलीम और हरीस के जलवे देखते ही बनते हैं और सुलेमानी चाय की चुस्कियों के संग गपशप के लंबे दौर भी और लंबे खिंच जाते हैं!

हाइटैक सिटी की चकाचौंध से उलट बरकस की दुनिया

आधुनिकता की बिसात कहीं पीछे छूट जाती है बरकस तक पहुंचते-पहुंचते। इसकी अपनी खास अदा है जिसका दीदार उस रोज़ इलाके के लोकप्रिय मतम-अल-अरबी रेस्तरां के सामने से गुजरते हुए हुआ था। रेस्तरां के बड़े से हॉल में लोग फर्श पर बिछी दरियों पर बड़े-बड़े थालों से मंडी का लुत्फ ले रहे थे। एक थाल से कम-से-कम 3 या 4 लोग तो खा ही रहे थे। यह नज़ारा अलहदा था, मगर मेरी यादों में घुसपैठ बनाने जा रहा था।

उस रात हवा में खुनकी थी और उस अनजान मुहल्‍ले की एक बेनाम गली के नुक्‍कड़ पर मैं ठिठकी थी। एक ढाबे से बस्‍ती से बाहर निकलने का पता पूछने के लिए ठिठकी तो उसकी तंदूर पर चढ़ी केतलियों को देखकर चाय की तलब यकबयक बढ़ गई। चाय तो नहीं है, सर्दियों में हम घावा पकाते हैं, जिसकी सुबह से शाम तक मांग होती है यहां। आप भी पीकर देखोअब मेरे हाथ में घावा का गिलास था और सीने में स्‍वाद की एक लंबी लकीर उतरती जाती थी। सुकून के घूंट भरते-भरते मैं एक बार फिर बरकस पर चर्चा छेड़ चुकी थी। बेमकसद उठ आए मेरे कदमों ने उन लोगों को हैरत में डाला था। चलते से पहले दाम पूछा तो बस ढाबे वाले ने बदले में एक सवाल दाग दिया था – ‘’कैसा लगा आपको हमारा बरकस और हमारा खास फ्लेवर्ड घावा? फिर आना इस तरफ, सर्दियों में सेहत के लिए अच्‍छा होता है …। पैसे अगली बार दे देना … ”

और अब हैरान होने की बारी मेरी थी।


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Written by अलका कौशिक

अलका कौशिक की यात्राओं का फलक तिब्बत से बस्तर तक, भूमध्यसागर से अटलांटिक तट पर हिलोरें लेतीं लहरों से लेकर जाने कहां-कहां तक फैला है। अपने सफर के इस बिखराव को घुमक्कड़ साहित्य में बांधना अब उनका प्रिय शगल बन चुका है। दिल्ली में जन्मी, पली-पढ़ी यह पत्रकार, ब्लॉगर, अनुवादक अपनी यात्राओं का स्वाद हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने की जिद पाले हैं। फिलहाल दिल्ली-एनसीआर में निवास।

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