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1729, एक टैक्सी और महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन; क्या है इनका संबंध?

16 जनवरी 1913 को इंग्लैंड के महान गणितज्ञ गोडफ्रे हेरोल्ड हार्डी को भारत के मद्रास (अब चेन्नई) से एक पत्र मिला। इस पत्र को भेजने वाला मद्रास के कस्टम पोर्ट पर एक मामूली-सा 26 वर्षीय क्लर्क था, जिसकी सालाना तनख्वाह सिर्फ 20 पौंड थी। इस पत्र के साथ उसने 9 पन्ने भेजे, जिनमें ढ़ेरों गणित के फार्मूलें लिखे थे। किसी भी आम इंसान को इन्हें देखकर शायद कुछ समझ न आये, पर हार्डी के लिए ये फार्मूलें बेहद दिलचस्प थे।

पत्र में लिखा था,

“डियर सर, मैंने किसी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई नहीं की है; लेकिन स्कूल की पढ़ाई पूरी की है। मैंने सामान्य रूप से विचलन श्रृंखला (Divergent Series) की विशेष जांच की है और जो परिणाम मुझे मिले हैं, उन्हें स्थानीय गणितज्ञों ने चौंकाने वाला बताया है……” इस बात से शुरू होने वाले इस पत्र के अंत में ‘रामानुजन श्रीनिवासन’ के नाम से हस्ताक्षर थे।

महान गणितज्ञ रामानुजन श्रीनिवासन, जिनका शोधकार्य आज भी इस क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा है!

श्रीनिवासन रामानुजन (फोटो साभार)

ब्रिटिश भारत में मद्रास प्रेसीडेंसी के एक छोटे से गाँव में 22 दिसंबर 1887 को जन्मे रामानुजन श्रीनिवासन ने मात्र 10 साल की उम्र से ही कॉलेज स्तर के गणित की समस्याओं को सुलझाना शुरू कर दिया था। 13 साल की उम्र तक उन्होंने सामान्य गणित में महारथ हासिल कर ली थी और 17 साल के रामानुजन अपनी खुद की थ्योरम विकसित कर रहे थे।

रामानुजन गणित के लिए इतने समर्पित थे कि बाकी किसी विषय की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता था। दो बार उन्होंने अलग-अलग कॉलेजों में दाखिला लिया, पर गणित विषय में टॉप करने वाले रामानुजन अन्य विषयों में अक्सर फेल हो जाते थे। यही वजह थी कि सदी के इस महान गणितज्ञ को भारत की किसी भी यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं मिला।

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पर निजी तौर पर उन्होंने गणित के अलग-अलग सिद्धांतों पर रिसर्च पेपर्स लिखे और उनके लिखे पेपर कई गणित जर्नल में पब्लिश भी हुए। साल 1910 में उनकी मुलाक़ात भारतीय गणित सोसाइटी के फाउंडर वी. रामास्वामी अय्यर से हुई। रामानुजन का गणित पर काम देखकर अय्यर दंग रह गये। उन्हीं से रामानुजन को अपने पेपर्स अलग-अलग देशों के गणितज्ञों को भेजने की प्रेरणा मिली।

हार्डी को जब रामानुजन का पत्र मिला, तब अपने परिवार का निर्वाह करने के लिए रामानुजन क्लर्क की नौकरी कर रहे थे। हार्डी से पहले उन्होंने और भी गणितज्ञों और गणित के प्रोफेसरों को अपना काम भेजा था, पर कहीं से कोई जवाब नहीं मिला।

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हार्डी अपने एक साथी गणितज्ञ लिटलवुड के साथ बैठे थे, जब उन्हें रामानुजन का पत्र मिला। वे दोनों पत्र के साथ आये अन्य कागजों को देखकर हैरान थे, जिनमें लगभग 120 गणित के फार्मूलें थे। इनमें से कुछ फार्मूलें हार्डी के लिए नए नहीं थे, क्योंकि उन पर पहले ही इंग्लैंड में काम हो चूका था। पर कुछ फार्मूलें उनके लिए बिल्कुल नए थे। इन फार्मूलों की कोई व्याख्या नहीं दी गयी थी। हार्डी और उनके साथी ने इनमें से कुछ को हल करने की कोशिश की, पर वे असफल रहे।

गणितज्ञ जी. एच. हार्डी (बाएं) और रामानुजन के पत्र का एक अंश)

हार्डी को इस बात पर गुस्सा आया कि भेजने वाले ने कोई व्याख्या नहीं दी है। सिर्फ़ संख्याओं से फार्मूलें बना दिए हैं। इस बात से नाराज़ हार्डी ने रामानुजन के पत्र को लगभग कचरे में फेंक ही दिया था। पर फिर अचानक उनके दिमाग में आया कि ये फार्मूलें ज़रूर सही होंगें और किसी सार्थक व्याख्या पर आधारित होंगें, वरना कोई भी बिना किसी लॉजिक के इस तरह के फार्मूलों की कल्पना भी कैसे कर सकता है।

हार्डी के इस विचार ने ही रामानुजन के लिए इंग्लैंड की रॉयल सोसाइटी के दरवाज़ें खोल दिए थे। 14 अप्रैल 1914 को रामानुजन लंदन पहुंचे और इसके बाद उनकी गणित के साथ एक अलग ही यात्रा शुरू हुई। हार्डी, रामानुजन के लिए उनके गुरु भी थे और एक अच्छे दोस्त भी।

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हार्डी को रामानुजन से बहुत लगाव था और इसलिए जब साल 1917 में रामानुजन बीमार पड़े, तो वे तुरंत उन्हें देखने के लिए अस्पताल पहुंचे। हार्डी और रामानुजन जब भी साथ होते, तो वे अक्सर संख्याओं के बारे में बात करते थे। इसलिए जब रामानुजन को पता चला कि हार्डी एक टैक्सी में आए थे, तो उन्होंने उनसे पूछा कि टैक्सी का नंबर क्या था?

हार्डी ने बताया कि टैक्सी का नंबर 1729 था और साथ ही कहा कि “कितनी उबाऊ संख्या है न?”

पर रामानुजन को यह संख्या बहुत दिलचस्प लगी। उन्होंने तुरंत बताया कि 1729 वह सबसे छोटी संख्या है, जो किसी भी दो संख्याओं को खुद से ही तीन बार गुना करके जोड़ने पर मिलती है। उदाहरण के तौर पर –

1729 = 13 + 123 = 93 + 103

(1x1x1) + (12x12x12)= 1729 = (9x9x9) + (10x10x10)  

हार्डी और रामानुजन के बीच हुई 1729 संख्या की यह घटना, गणितज्ञों के बीच काफ़ी मशहूर है और इसलिए आज भी ‘1729’ को ‘रामानुजन संख्या’ के नाम से जाना जाता है।

रामानुजन ने कैंब्रिज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की और साथ ही, दर्जन भर से ज़्यादा रिसर्च पेपर पब्लिश किये। बहुत ही कम समय में, उन्होंने विश्व के गणितज्ञों में अपना नाम स्थापित कर लिया था। पर भारत का यह अनमोल रत्न अपने साथ बहुत ही कम ज़िंदगी लेकर आया था।

(फोटो साभार): कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में अपने साथ वैज्ञानिकों के साथ रामानुजन (सबसे बीच में) और हार्डी (सबसे दायें)

साल 1920 में 26 अप्रैल को मात्र 32 साल की आयु में रामानुजन ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मृत्यु पर कहा गया कि गणित की दुनिया ने अपना एक चमकदार सितारा खो दिया है। रामानुजन के काम को हार्डी ने किताब की शक्ल दी और उसे प्रकाशित करवाया। आज भी न सिर्फ़ भारत में बल्कि विश्व के अलग-अलग देशों में रामानुजन के सम्मान में गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। उनके जीवन पर आधारित एक फिल्म ‘अ मैन हु न्यू इनफिनिटी’ भी बनायी गयी थी।

इस महान भारतीय को हमारा नमन!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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