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मॉडलिंग छोड़,14 सालों से लड़ रहे हैं छुआछूत की लड़ाई; मल उठाने वालों को दिलवाया सम्मानजनक काम!

“एक तरफ हम हैं, जो बड़े घरों में रहते हैं और इतना कमाते हैं कि अगर कोई खाना पसंद न आये, तो फेंक सकते हैं और दूसरी तरफ़ ये लोग हैं, जो हमारी ही तरह इंसान तो हैं, लेकिन किसी के मल को अपने सिर पर ढोते हैं, गली-मोहल्लों की सफ़ाई करते हैं, गाँव में कोई पशु मर जाये तो उसे ठिकाने लगाते हैं। समाज की इतनी सेवा करने के बाद भी उन्हें खाने के लिए हमारी फेंकी हुई जूठन मिलती है!”

– संजीव कुमार

संजीव कुमार बिहार में खगड़िया जिले के परबत्ता गाँव में पिछले 14 सालों से छुआछूत के खिलाफ़ अपनी लड़ाई लड़ रहे है। इसी गाँव के मूल निवासी संजीव कुमार ने दिल्ली में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की। एमबीए करने के बाद उन्होंने मॉडलिंग करना शुरू किया। उन्हें अच्छे प्रोजेक्ट्स भी मिल रहे थे और साथ ही, उन्होंने अपनी निजी एजेंसी भी शुरू कर दी थी।

पर 2005 में अपनी दीदी की सास की मृत्यु हो जाने पर जब वे अपने गाँव गए, तो यहाँ हुई एक घटना ने उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी।

संजीव कुमार

“दीदी के ससुराल वालों ने भोज दिया था। सभी लोग खा-पी रहे थे और हम ऐसे ही टहलने थोड़ा बाहर निकल गये। यहाँ हमने देखा कि लोग जिस जगह खाने के बाद जूठे पत्तल डाल रहे हैं; वहीं कुछ लोग खड़े होकर उन पत्तलों में बचा हुआ खाना इकट्ठा कर रहे हैं,” संजीव ने याद करते हुए कहा।

संजीव को यह कुछ अटपटा सा लगा और उन्होंने जाकर पूछा कि आप क्या कर रहे हैं, तो उनमें से एक ने जवाब दिया कि हम ये ले जाकर खायेंगें। यह सुनकर संजीव चौंक गये। इसके बाद, संजीव को उनकी दीदी के ससुर ने बताया कि ये डोम जाति के लोग हैं और ये इसी तरह जूठन पर जीते हैं।

दूसरे दिन, संजीव इन लोगों के बारे में पूछते-पूछते इनके निवास-स्थान, ब्लॉक कैंपस पहुँच गये। यहाँ उन्होंने देखा कि कुछ लोग बांस के छाज बना रहे हैं, तो वहीं पास में महिलाएं अपने अपने कामों में लगीं थीं। वे उनमें से एक बूढ़े दादा के पास नीचे ही बैठ गये और उनके काम के बारे में पूछने लगे। तभी उनकी नज़र पास में बैठे बच्चे पर गयी।

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“हमने देखा कि एक पतीले में वही रात का खाना है और एक बच्चा और एक छोटा-सा कुत्ता, दोनों ही उसी में से खा रहे हैं। यह देखकर हमारा दिल बैठ सा गया। हर दिन हम इंसानियत का दम भरते हैं और यहाँ इंसान की कोई कीमत ही नहीं,” संजीव ने भावुक होते हुए कहा।

इसके बाद संजीव बहुत भारी मन से दिल्ली वापिस लौट आये। अक्सर लोग इस तरह की घटनाओं को अपनी दैनिक ज़िंदगी की व्यस्तता में भुला देते हैं। पर संजीव की बैचेनी बढ़ती ही रही। घर, ऑफिस या फिर उनके रैंप शो; किसी भी काम में उनका दिल नहीं लगता था। उन्होंने समाज में जाति व्यवस्था, डोम समुदाय, छुआछूत आदि पर पढ़ना शुरू किया और तब समाज की बहुत ही भद्दी तस्वीर उनके सामने आई। इस तस्वीर को देखकर उनके मन में उथल-पुथल मच गयी।

आख़िरकार, 2006 में अपना अच्छा-ख़ासा भविष्य दिल्ली में छोड़, डोम समुदाय के लिए कुछ ठोस करने के इरादे से वे हमेशा के लिए अपने गाँव लौट आये!

फोटो साभार: संजीव कुमारसंजीव ने यहाँ पहुँचते ही अपना काम शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने डोम समुदाय के निवास-स्थान के बारे में पता लगाया, तो उन्हें पता चला कि ये लोग गाँव-बस्ती से एक दम बाहर रहते हैं। दूसरे दिन ही वे उनके यहाँ पहुँच गये।

“हमने उनसे ऐसे ही जाकर बात करना शुरू कर दिया। उस समय मुझे उनकी स्थानीय भाषा भी ख़ास समझ नहीं आती थी और न ही वे मेरी बात पूरी समझ पाते थे। मुझे नहीं पता था कि क्या कैसे करना है, बस एक ही चीज़ थी मन में कि नहीं कुछ तो करना है। फिर उनकी बस्ती में उनके बच्चों को देखकर मुझे लगा कि इन्हें पढ़ाना चाहिए, क्योंकि पहली पीढ़ी ने जो भुगता है, उसे हम नहीं बदल सकते। लेकिन अगर आने वाली पीढ़ी को एक मुकाम दे देंगें, तो इनकी हर एक पीढ़ी संवर जाएगी।”

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धीरे-धीरे संजीव ने उनके बच्चों को हर रोज़ नहाकर साफ़ कपड़े पहनना सिखाया। वे खुद साबुन खरीदकर ले जाते और उन बच्चों को नहलाते, उनके कपड़े धो देते। यह देखकर इन लोगों का विश्वास उन पर बनने लगा। क्योंकि उनको  किसी ऊँची जाति के इंसान ने इतनी इज्ज़त कभी नहीं दी थी।

यहाँ के बीडीओ संजीव के काम से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने संजीव से मिलकर उनसे उनका उद्देश्य पूछा। उनके विचार सुनने के बाद बीडीओ ने उन्हें प्रशासनिक विभाग में ही दो कमरे देने का प्रस्ताव दिया, जहाँ वे आराम से रह सकते थे और यहीं बच्चों को पढ़ा सकते थे।

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बीडीओ की मदद से संजीव ने लगभग 25 डोम बच्चों पढ़ाना शुरू किया और साथ ही, सरकारी ज़मीन पर गैर-अधिकारिक रूप से रह रहे डोम लोगों को पुनर्वासित भी करवाया। संजीव ने डोम समुदाय की महिलाओं के उत्थान पर भी ध्यान दिया।

उन्होंने बताया, “इन लोगों के पास कोई घर-शौचालय की व्यवस्था नहीं होती है। तो ये महिलाएँ ऐसे ही खुले में बस साड़ी आदि का परदा टांग कर नहाती थीं। कोई भी आते-जाते हुए उन्हें देखता, और बहुत ही घिनौने तंज करता। यह सब देख मैंने उन्हें समझाना शुरू किया कि अगर आज आप लोग ऐसे रहेंगी, तो आपकी बेटियां भी सुरक्षित नहीं रहेंगी।” संजीव के लगातार प्रयासों से यहाँ की महिलाओं में भी बदलाव आया।

लेकिन उनके इस काम की खबर पूरे गाँव में फ़ैल चुकी थी और उनकी अपनी जाति के लोग ही उनके दुश्मन बन गये। उनका मानना था कि संजीव ने उनके समुदाय का सिर शर्म से झुका दिया है और वह इस लायक नहीं कि अब गाँव में रहे। उनकी बहन के ससुराल वालों ने भी उन्हें अपने यहाँ रखने से इंकार कर दिया।

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अब संजीव को समझ आया कि उन्हें अपना सफ़र अकेले ही तय करना होगा, क्योंकि अपनी पहल को यूँ अधुरा छोड़कर वापिस लौट जाना उनके लिए कोई विकल्प नहीं था।

“तब तक मैं सबके लिए डोम बन चूका था, क्योंकि मैं उन्हीं लोगों के साथ रहता, खाता-पीता था। मुझे यहाँ सब लोग संजीव डोम बुलाने लगे। आज भी पूरे जिले में संजीव डोम के रूप में ही मेरी पहचान है,” संजीव ने दृढ़ता से कहा।

इसके बाद, संजीव की मुश्किलें और बढ़ती गयीं। उन्होंने बेइज्जती, समाज से बहिष्कार, मार देने की धमकियाँ, आदि सब कुछ झेला और आज भी बहुत हद तक यह सिलसिला जारी है। लेकिन इस सबके बावजूद संजीव के कदम नहीं रुके।

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साल 2007 में उन्होंने ‘बहिष्कृत हितकारी संगठन’ की शुरुआत की। वे हर एक दिन लगभग 16 किलोमीटर चलकर 40 गांवों में जाते और वहां डोम समुदाय के लोगों से मिलते, उनसे बातें करते और धीरे-धीरे उन्होंने इन्हें आपस में जोड़ना शुरू किया। उन्होंने ज़मीनी स्तर पर इन 40 गांवों के डोम समुदायों को जोड़कर, उनकी एक अलग पंचायत बनाई। इस पंचायत के लिए चुनाव किये और फिर इन्हीं डोम लोगों में से ‘प्रमुख,’ ‘उप-प्रमुख’ आदि चुने गये।

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“इस चुनाव के पीछे का उद्देश्य था कि हम इन लोगों को सशक्त महसूस कराएँ। हम कभी भी पंचायत में चुने हुए लोगों को उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके पद से बुलाते थे। जब भी हम डोम प्रमुख को बुलाते तो ‘प्रमुख साहब’ कहते और यह शब्द उनके दिल में एक अलग ही आत्मविश्वास भर देता था,” संजीव ने बताया।

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डोम पंचायत ने नियम बनाया कि जहाँ भी उन्हें सम्मान नहीं मिलेगा, वे वहां नहीं जायेंगें। पर यह आसान नहीं था क्योंकि इनकी आजीविका और रोज़ी-रोटी इसी पर निर्भर करती थी। लेकिन फिर इन्होंने रोज़गार के लिए अन्य साधन जैसे कि बांस की टोकरी, छाज आदि बनाकर बेचना शुरू किया।

डोम पंचायत में ब्लॉक प्रेसिडेंट चुनी गयीं घूरो देवी कहती हैं, “पहले हमारी दशा बहुत ही दयनीय थी, हम कूड़ा-कचरा, मल और मरे हुए जानवर उठाने आदि का काम करते थे। लोग हमारे ऊपर ये सब काम थोप देते थे। लेकिन जबसे हम संगठन में शामिल हुए, तो हमाँरी दशा सुधरी और इन कामों को करने का दबाब कम होने लगा।”

सामाजिक विरोध के अलावा आर्थिक तौर पर भी संजीव की मुश्किलें कम नहीं थीं। आय का कोई साधन न होने पर संजीव इधर-उधर से चंदा इकट्ठा करते और डोम लोगों की संगोष्ठी, आयोजन आदि करवाते। आज भी उनके पास स्थायी आय का कोई साधन नहीं है और वे जैसे-तैसे खुद का निर्वाह कर पाते हैं। पर फिर भी, उन्होंने जो चिंगारी जलाई उसने मशाल का रूप ले लिया।

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डोम पंचायत के बाद संजीव ने एक और बहुत बड़ा कदम उठाया- गंगा तक की पदयात्रा। इन समुदायों को गंगा के पानी को छूने की भी इजाज़त नहीं होती। सबसे बड़ी बिडम्वना है कि उसी घाट पर मसान में यही लोग मृत्यु के बाद लोगों को अग्नि देकर मोक्ष के द्वार तक पहुंचाते हैं।

संजीव ने डोम समुदाय की 75 महिलाओं को तैयार किया और उनके सिर पर मटकी रखी गयीं। फिर ढोल आदि के साथ गाते-बजाते संजीव की अगुवाई में डोम समुदाय का कारवां गंगा स्नान के लिए निकला। उनके रास्ते में उनके विरोधियों ने बहुत सी मुश्किलें खड़ी कीं। रास्ते में पेड़ आदि गिरा दिए गये, लोग संजीव को गालियाँ दे रहे थे कि उन्होंने सवर्णों का नाम डूबा दिया, तो बहुत से लोग पत्थर तक बरसाने पर उतर आये। लेकिन फिर संजीव के समर्थन में आने वाले लोगों की भी कोई कमी नहीं थी।

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“इस आयोजन में सबसे ज़्यादा साथ हमारा प्रशासन ने दिया। खुद जिला अधिकारी हमारे साथ इस कारवां में साथ चले और उन्होंने डोम समुदाय के लोगों को गले लगाया,” संजीव ने कहा।

संजीव का यह अभियान सफल रहा और न सिर्फ़ आम लोगों में, बल्कि राजनैतिक गलियारों में भी इसकी चर्चा हुई। मीडिया में तो संजीव का काम पहले ही चर्चा में था, लेकिन उनके इस साहस ने उन्हें पूरे देश में पहचान दिलवा दी। संजीव को स्टार प्लस के शो ‘सत्यमेव जयते’ में भी बुलाया गया । इसके अलावा, उनके काम पर एक डॉक्युमेंट्री भी बनायी गयी।

अब हर साल आयोजित होने वाली उनकी यह पदयात्रा इतना बड़ा आयोजन बन गयी है कि खुद कई राजनेता इसमें भाग लेने के लिए आते हैं। जहाँ एक तरफ अपना समाज उनका दुश्मन बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ संजीव के काम से नक्सलवादियों का इन गांवों पर चुंगल कम होने लगा। इसलिए उनके प्रभाव को कम करने के लिए साल 2010 में नक्सलियों ने उन्हें अगवा का लिया।

पर उन्हें बचाने के लिए पूरा डोम समुदाय नक्सलियों के खिलाफ़ खड़ा हो गया और नक्सलियों को उन्हें छोड़ना पड़ा।

“उन्हीं की वजह से आज मैं जीवित आपसे बात कर पा रहा हूँ,” संजीव ने गर्व से कहा।

इस घटना के कुछ समय पहले ही सजीव की शादी हुई थी, और हमले से घबराकर उनकी पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया। पर संजीव ने डोम समुदाय का साथ नहीं छोड़ा।

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पर जिस डोम समुदाय के लिए उन्होंने अपना परिवार त्याग दिया, आज उसी डोम समुदाय के बहुत से बच्चों के लिए वे पिता समान हैं। उन्होंने इस समुदाय के लगभग 150 बच्चों को स्कूल-कॉलेज में अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में मदद की है। आज बहुत से बच्चे अच्छी जगह नौकरी कर रहे हैं और यही बात संजीव को सुकून देती है।

आज भी संजीव के पास कोई स्थायी नौकरी या फिर इतने साधन नहीं है कि वे अपना खर्च भी चला सकें। उनके परिवार की तरफ से उन्हें थोड़ी-बहुत मदद आती है, लेकिन फिर भी इस संघर्ष में अक्सर वे खुद को अकेला खड़ा पाते हैं। यदि डोम समुदाय से कोई उनके लिए खाना न देकर जाये, तो कई बार दो-तीन दिन तक उन्हें भूखा रहना पड़ता है। लेकिन संजीव को अब किसी परेशानी का अहसास नहीं होता। वे सिर्फ़ चलते रहना चाहते हैं।

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डोम समुदाय के बाद अब संजीव, मुसहर समुदाय के लोगों के जीवन को संवारने में लगे हुए हैं।

“आज हमने इन गांवों में इतने संजीव खड़े कर दिए हैं कि अगर कल को मुझे कुछ हो भी जाए तो अब यह अभियान नहीं रुकेगा,” यह कहते हुए संजीव निकल पड़ते हैं अपने अगले अभियान के लिए!

अपने अथक प्रयासों से हर तरह की चुनौती को पार करके, बिहार की तस्वीर बदल रहे संजीव को आज लोगों के साथ और समर्थन की ज़रूरत है। हमें उम्मीद है कि उनके संघर्ष की इस कहानी को पढ़ने के बाद लोग उनकी सोच को समझेंगे और छुआछुत जैसी सामाजिक बुराइयों से मुक्त भारत के सपने को साकार करने के लिए कदम उठायेंगें।

संजीव कुमार से आप 6204911130 पर संपर्क कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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