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छत्तीसगढ़ : गाँव में लड़की के जन्म पर 5, 000 रूपये की एफडी करवाती है यह ग्राम पंचायत!

त्तीसगढ़ में महासमुंद जिले के पिथौरा ब्लॉक में स्थित ग्राम पंचायत सपोस पूरे भारत में एक आदर्श ग्राम पंचायत की मिसाल पेश कर रही है। ग्राम पंचायत सपोस के अंतर्गत दो गाँव, सपोस और गबौद आते हैं। इन दोनों गांवों के विकास के लिए ग्राम पंचायत उम्दा कार्य कर रही है।

आज पूरे भारत में इस ग्राम पंचायत को, ‘ग्रीन ग्राम पंचायत सपोस’ के नाम से जाना जा रहा है। गाँव मे हरियाली के साथ- साथ, शांति और सद्भावना बनाये रखने के लिए भी अच्छा काम हो रहा है।

“हमने गाँव के हर एक घर को हरे रंग से रंगा है, इससे हमारा उद्देश्य गाँव में न सिर्फ़ हरियाली का संदेश देना, बल्कि गाँव में ऊँच-नीच, जाति-समुदाय के भेदभाव को भी खत्म करना है। हर किसी के घर का एक ही रंग है और यही एकता का रंग हम गाँववालों की सोच और दिल को देना चाहते हैं। आज हमारे गाँव में लोग सभी भेदभावों को भुलाकर, एक साथ गाँव के विकास के लिए प्रयासरत हैं,” यह कहना है उप- सरपंच किशोर चंद्र बघेल का।

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किशोर चंद्र बघेल, एक रिटायर्ड फौज़ी हैं। उन्होंने साल 1995 से लेकर साल 2012 तक देश की सेवा की और फिर अपनी इच्छा से सेवानिवृत्ति ली। इस बारे में बात करते हुए, उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया, “मैं सेना में जाने से पहले भी सामाजिक कार्यों से जुड़ा रहता था। रालेगण सिद्धि के अन्ना हजारे मेरे आदर्श हैं। उन्हीं से प्रेरित होकर, मैंने अपने गाँव को भी विकास की राह देने का निर्णय किया। इसलिए, अपने गाँव की सेवा करने के लिए मैंने जल्दी रिटायरमेंट ले ली।”

किशोर चंद्र बघेल

साल 2015 में किशोर चंद्र बघेल को सभी गाँव वालों ने सर्वसम्मिति से उप-सरपंच बनाया। गाँव की सरपंच, श्रीमती अनुसुइया देवी हैं, जिनके सहयोग से किशोर चंद्र ने गाँव में बदलाव की मुहीम छेड़ी। पिछले कुछ ही सालों में सभी गाँववालों के साथ से ग्राम पंचायत ने सपोस और गबौद, दोनों गांवों की तस्वीर बदल दी है।

आज द बेटर इंडिया के साथ जानिए ग्रीन ग्राम पंचायत सपोस द्वारा किये जा रहे विकास कार्यों के बारे में!

दो बार स्वच्छता के लिए सम्मानित हो चुके इस गाँव की सुबह ‘राष्ट्रगान’ के साथ होती है। हर सुबह गाँव में स्पीकर पर राष्ट्रगान चलाया जाता है, जिसे हर को व्यक्ति अपने घर में सुन सकता है। गाँव में लगभग 20 स्पीकर लगे हैं, जिनका इस्तेमाल ज़रूरी घोषणा करने के लिए किया जाता है।

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हर गली- चौराहे पर आपको सीसीटीवी, स्पीकर, और गाँव का मैप लगा मिलेगा। स्ट्रीट लाइट्स के लिए सामान्य ट्यूबलाइट की जगह एलईडी का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि बिजली की बचत हो। हर एक गली में, सड़क के दोनों ओर पेड़-पौधे लगाकर छोटे- छोटे उद्यान बनाये गये हैं।

गाँव की हर गली में स्पीकर और स्ट्रीट लाइट्स लगी हैं

गाँव के बीच में भी दो बड़े बगीचे हैं और साथ ही, एक खेल मैदान भी है। गाँव की हर एक सड़क आपको साफ़- सुथरी मिलेगी। घरों से निकलने वाले कचरे के लिए पंचायत ने हर घर के बाहर डस्टबिन लगवाए हैं। बाद में, इस कचरे को इकट्ठा करके, गाँव के बाहर कचरा प्रबंधन के लिए भेजा जाता है।

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आज गाँव के हर एक घर में शौचालय है और कोई भी बाहर शौच के लिए नहीं जाता है। अगर कोई व्यक्ति खुले में शौच करते हुए पकड़ा जाता है, तो उससे 200 रुपये का जुर्माना वसूल किया जाता है। साथ ही, खुले में शौच करते वक्त पकड़ने वाले व्यक्ति को 100 रुपये का इनाम दिया जाता है।

गाँव के हर घर के बाहर उद्यान हैं

‘नो हूकिंग’ गाँव

“हमारे गाँव में शत- प्रतिशत विद्युतीकरण है और गाँव में बिजली की चोरी पर भी रोक लगाई गयी है। इसके लिए लोगों को जागरूक किया गया और अब कोई भी तार डालकर बिजली की चोरी नहीं करता है। इसलिए हमारा गाँव ‘नो हूकिंग’ गाँव है,” किशोर चंद्र ने गर्व से बताते हुए कहा।

उनके मुताबिक, गाँव में लगभग पूरे 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होती है और साथ ही, गाँव को ‘नल जल योजना’ से जोड़ा गया है, जिससे पूरे गाँव में पेयजल की सुलभता है।

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नशा-मुक्त गाँव

सपोस व गबौद, दोनों ही गाँव पूरी तरह से नशा-मुक्त हैं। ग्राम पंचायत ने एक बैठक का आयोजन करके, सभी ग्रामीणों से इस संदर्भ में विचार- विमर्श किया और ‘नशामुक्ति अभियान’ की पहल की। इस समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले गाँव में शराब की बिक्री पर रोक लगाईं गयी।

इसके बाद गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, और अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया। अब कोई भी दुकानदार गाँव में नशीला पदार्थ नहीं बेचता है।

जनसभा करते ग्राम पंचायत के लोग

“हालांकि, यह आसान कदम नहीं था, इसलिए हमने गाँव की औरतों और युवाओं को इसमें शामिल किया। औरतों और युवाओं की एक- एक समिति बनाई गयी है। इस समिति का काम लोगों को जागरूक करना और सभी ग्रामीणों पर निगरानी रखना है, ताकि सभी नशा-प्रतिबंध का कड़ाई के पालन करें,” किशोर ने कहा।

इसके अलावा, ग्राम पंचायत की कोशिश है कि गाँव में स्वशासन स्थापित हो और इसलिए, अब गाँव की समस्याओं को पंचायत में ही हल किया जा रहा है। पंचायत कार्यालय में भी सभी कर्मचारी पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करते हैं।

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अपना जंगल, अपना साम्राज्य

किशोर बताते हैं कि गबौद गाँव में लगभग 147 हेक्टेयर में घना जंगल है और इस जंगल को हनन से बचाने की पूरी ज़िम्मेदारी गाँव के लोगों ने ली हुई है। जब आस-पास के जंगलों को किसी न किसी अधिग्रहण नीति और लकड़ी के तस्करों द्वारा लगभग खत्म कर दिया गया, तो गाँव वालों ने मिलकर अपने जंगल को बचाने का निर्णय लिया।

यह सिलसिला पिछले 25 सालों से जारी है। जंगल की रखवाली के लिए गाँव के लोग बारी- बारी से पहरेदारी करते आ रहे हैं। इस जंगल के रख- रखाव के लिए गाँव के लोग नियमित रूप से श्रमदान भी करते हैं।

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स्वरोज़गार पर जोर

गाँव की लड़कियों और महिलाओं के लिए सिलाई-प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया गया है। यहाँ पर उन्हें स्वरोज़गार की योजनाओं के बारे में भी बताया जाता है। साथ ही, गाँव की महिलाओं को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। “हमारा गाँव ज़्यादातर खेती पर निर्भर है। और अब हम खेती में भी अलग-अलग तरह के आधुनिक तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं। मशरूम की खेती गाँव के लिए बढ़िया साबित हो रही है। इसलिए हमने सोचा कि अब गाँव की महिलाओं को भी  इससे जोड़ा जाये,” किशोर ने कहा।

सिलाई प्रशिक्षण केंद्र

इसके अलावा, गाँव में प्रगतिशील किसानों द्वारा दो डेयरी फार्म और मत्स्य पालन के लिए तालाबों का निर्माण किया गया है। इससे गाँव के लोगों के लिए और भी रोज़गार के साधन बन रहे हैं।

ग्राम पंचायत की ख़ास योजनायें

“हमने गाँव में लड़कियों को ध्यान में रखते हुए कई नई पहल भी शुरू की हैं, जिनमें ‘सरपंच बिटिया रानी सहायता योजना’ और ‘सरपंच कन्या आशीर्वाद योजना’ शामिल हैं। ‘सरपंच बिटिया रानी सहायता योजना’ के अंतर्गत, गाँव में जब भी किसी कन्या का जन्म होता है, तो ग्राम पंचायत की तरफ से उस कन्या के नाम पर 5, 000 रूपये का फिक्स-डिपोजिट करवाया जाता है,” किशोर ने द बेटर इंडिया को बताया।

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इस फिक्स-डिपोजिट के पैसों को आगे चलकर उस बच्ची की शिक्षा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, ग्राम पंचायत सभी गाँव वालों को प्रेरित करती है कि वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए बचत करें। गाँव की दूसरी योजना, ‘सरपंच कन्या आशीर्वाद योजना’ के अंतर्गत, जब भी गाँव में किसी लड़की की शादी होती है, तो पंचायत की तरफ से कोई ख़ास तोहफ़ा उस लड़की के लिए दिया जाता है।

गाँव की लड़की की शादी में तोहफ़ा देते ग्राम पंचायत के सदस्य

‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ मॉडल

छत्तीसगढ़ की इस आधुनिक ग्राम पंचायत की एक ख़ासियत यह भी है कि यह ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ मॉडल के ज़रिए काम कर रही है। किशोर बताते हैं कि वे गाँव के विकास कार्यों के लिए निजी संगठनों के साथ सहभागिता में कार्य करते हैं। गाँव में सिलाई प्रशिक्षण केंद्र, सामुदायिक भवन आदि का निर्माण निजी संगठनों और गाँव के विकास फण्ड से जमा हुए पैसे से किया गया है।

गाँव का सामुदायिक भवन

गाँव में होने वाले लगभग सभी विकास कार्यों में गाँव एक लोगों की भागीदारी है। गाँव के लोग न सिर्फ़ सामाजिक तौर पर, बल्कि आर्थिक तौर पर भी ग्राम पंचायत में योगदान करते हैं। गाँव का हर एक व्यक्ति अपनी तरफ से गाँव के ‘विकास-फण्ड’ में चंदा देते हैं। इतना ही नहीं, ये लोग नियमित रूप से अपनी स्वेच्छा से लाइट टैक्स और हाउस टैक्स भी देते हैं, ताकि ग्राम पंचायत का कोई भी काम सरकारी फण्ड की कमी के चलते रुक न जाये।

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गाँव में जो भी लोग सरकारी आय फिर स्थायी प्राइवेट नौकरियों से जुड़े हैं, वे भी गाँव के विकास के लिए पूर्ण योगदान करते हैं। कुछ समय पहले ही, गाँव के जो भी लोग सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं, उन्होंने मिलकर गाँव में वॉटर कूलर लगवाया है। जिससे गाँव से होकर गुजरने वाले राहगीरों की प्यास बुझाई जा सके।

किशोर अंत में बताते हैं कि कुछ ही दिनों में गाँव के कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र की भी शुरुआत हो जाएगी। अब उनका ध्यान गाँव में एक अस्पताल और हाई स्कूल बनवाने पर है, ताकि सभी गाँववालों के लिए अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा मुहैया हो सके। “अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है। हमारी उम्मीद है कि विकास का सिलसिला यूँ ही चलता रहे और हमें सभी का सहयोग मिलता रहे।”

यक़ीनन, ग्राम पंचायत सपोस देश के सभी गांवों के लिए एक प्रेरणा है। इस ग्राम पंचायत और यहाँ के गाँववालों से साबित किया है कि यदि आप अपने गाँव की तस्वीर बदलना चाहें, तो आपको किसी और पर निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं है। आपको बस खुद एक छोटा-सा कदम उठाना है और कारवां बनता चला जायेगा।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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