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आवारागर्द लड़कियाँ

मुझे पसंद हैं
बेबात कहकहे लगातीं लड़कियाँ
हाथ में फुटबॉल लिए
बारिश का इंतज़ार करतीं
कीचड़ से लथपथ
फ़ुटबॉल को आसमान तक
किक लगातीं 
लड़कियाँ

 

कड़ी धूप में,
माँ बाबा की नज़र बचाकर
मोहल्ले की गलियों में
सायकल चलातीं
मोटे भूरे पिल्ले को चुरा
पड़ौसी की दीवार फाँदकर
चम्पत हो जानेवाली लड़कियाँ
सहेलियों की गुड़ियों की शादी में
दुल्हन का बाप बनी
या फिर खेल खेल में
किराने की दूकान चलातीं लड़कियाँ
कंकड़ पत्थर वाले चावल दाल के लिए
भाव ताव करतीं लड़कियाँ

 

हमउम्र लडकों के साथ छिपकर
सिगरेट के कश लगातीं
लड़कों की हमराज़ बन
उनके ख़त पहुँचातीं लड़कियाँ
या फ़िर, उनके इश्क़ के ज़ख्मों पे
फाहे लगातीं लड़कियाँ –
“चल यार, कोई दूसरी ढूँढे देती हूँ”

 

मुझे पसंद है
अबे तबे करने वाली
और दुपट्टे को
कहीं रखकर भूल जाने वाली लड़कियाँ

 

गोलगप्पे वाले से
दो मुफ्त गोलगप्पों के लिए
लड़ जाने वाली
या फिर ट्रेन के ऊपरली बर्थ पर बैठे
मज़े मज़े
केलेवाले की टोकरी से केले चुरातीं लड़कियाँ

 

मुझे और भी पसंद है
ट्राफिक सिग्नल तोड़कर
हवलदार को ठेंगा दिखतीं
फर्राटे से अपनी गाड़ी भगातीं लड़कियाँ
या फिर रात को
अद्धा या पौव्वा चढ़ाकर
हॉस्टल के कमरे में
ठुमके लगातीं
और फिर–
किसी पुराने इश्क़ की याद में,
ज़ारोज़ार आँसू बहातीं लड़कियाँ

 

मुझे मस्त लगती हैं,
किसी प्यारे लड़के को देख,
आँखें फाड़े, सीटियाँ बजातीं लड़कियाँ

 

मुझे और भी पसंद हैं
गणपति उत्सव में,
दुशेला कसे, फेटा बाँधे
ढोल ताशे बजातीं, नाचतीं
मुंबई की लोकल में,
तीज त्यौहार मनातीं,
अपना छोटा सा संसार सजातीं लड़कियाँ

 

दरअसल मुझे पसंद हैं,
मीठे गुड़ सी,
और तनी कटार सी
सारी आवारागर्द लड़कियाँ
पानी की तरह बहकर
पत्थर पहाड़ के बीच
रास्ता ढूँढ लेने वालीं
दुनिया के मनहूस बगीचे में खिलीं
जंगली फूल और दूब की तरह बिछी लड़कियाँ
जो मौसम की हर मार और अंधड़
झेलकर जिंदा रहती हैं

 

सभ्यता और समय की खेती में,
हर बार खाद न बनकर,
अनाज की बाली बनकर
उग आने वाली लड़कियाँ

 

मुझे प्यार है इन से
क्यों कि ये चुनना जानती हैं
अपनी मर्ज़ी –
अपनी आवारागार्दियाँ!

ये लड़कियाँ !

 

मेरे लिए हिन्दी कविता प्रोजेक्ट की सबसे मज़ेदार बात रही है कवियों से, लेखकों से कलाकारों से मिलना. उनके साथ आत्मीय और आवारागर्द दिन बिताने का अवसर मिलना. जब कविता ठीक तरह से कवि का प्रतिनिधित्व नहीं करती है, मेरे हिसाब से वो वहीं अपनी सारगर्भिता, अपनी ईमानदारी खो बैठती है. हम उस साहित्य को सम्मान देते हैं जो साहित्यकार के जीवन से निकला है. आजकल कविता लिखने की होड़ है, जोड़-तोड़ है. किसानों पर कविता लिखने वाले अधिकतर कवि उनके प्रति संवेदना नहीं रखते. नारी-विमर्श में पुरस्कार प्राप्त कवि अपनी पत्नियों को नौकरानी बना कर अपना काम बजा लेने वाली ही समझते हैं. ‘उच्छृंखल नदी हूँ मैं’ लिखने वाली कवियित्रियाँ एक साँस घुटते रिश्ते में जी रही होती हैं.. तो आप जोड़-तोड़ करके लाइक्स-वाइक्स बटोर तो लें लेकिन क्या मतलब है उसका? आपका दिल भी अपने काम को जानता है, आप तो स्वयं की खाल में ख़ुश नहीं हैं यह बात देर-सवेर ज़ाहिर हो ही जाती है.

 

उपरोक्त कविता ‘आवारागर्द लड़कियाँ‘ लिखी है रंजना मिश्रा ने. एक बार की बात है हम पूना (Pune) में थे. रात के दो से आगे का वक़्त था, हम चार लोग थे. रास्ते में एक किनारे बंद दुकान के आगे बैठे हलक फाड़ के किशोर कुमार के गाने गाये जा रहे थे, नाचा जा रहा था. इसलिए ये कविता कैसी भी हो वह मैं नहीं तौल रहा हूँ, न तौलना चाहता हूँ. बस इतना बताना चाहता हूँ कि यह ईमानदार है.

 

और रंजना से एक ठुमरी सुन लीजिये, ये गायिका नहीं हैं वैसे. और आप जानते हैं न कि ठुमरी शब्द ठुमकना से उपजा है 🙂

—–

लेखक –  मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.


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Written by मनीष गुप्ता

हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.

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