in ,

शोर्ट-सर्किट अलार्म से लेकर मौसम का हाल बताने वाले स्टेशन तक, ग्रामीणों के लिए किये इनोवेशन!

“अगर कोई बच्चा स्कूल में पढ़ाई में अच्छा न हो, तो सब समझ लेते हैं कि वह कुछ नहीं कर सकता। पर बहुत ही कम लोग यह जानने की कोशिश करते हैं कि उस बच्चे में और क्या काबिलियत हो सकती है। पर आज यह सबसे बड़ी ज़रूरत है कि हम बच्चों की, युवाओं की बात सुनें और उन्हें मौका दें, कुछ अलग करने का,” यह कहना है 30 वर्षीय इनोवेटर अब्दुल कलीम का।

पारम्परिक पढ़ाई, हमेशा से ही अब्दुल कलीम की समझ से परे थी, लेकिन क्रियात्मक और रचनात्मक प्रतिभा की कोई कमी नहीं थी। उन्हें बस मशीनों और तकनीक का जुनून था।स्कूल में पास होने के लिए हमेशा ही उन्हें जद्दोज़हद करनी पड़ती थी, पर वहीं रिमोट से कंट्रोल होने वाली लाइट्स या फिर पंखे आदि बनाने में उन्हें कभी कोई मुश्किल नहीं हुई।

उत्तर-प्रदेश के देवरिया जिले में अपने गाँव के घर में उनका कमरा किसी लैब या वर्कशॉप से कम नहीं था।

अब्दुल कलीम

शिक्षा उनके परिवार का आधार थी, क्योंकि पिता शिक्षक थे और बाकी भाई-बहन भी अच्छा पढ़-लिख रहे थे। ऐसे में, अब्दुल का पढ़ाई के प्रति बिल्कुल भी रुझान न होना, अक्सर उनके माता-पिता को खटकता था। इसके अलावा, उनके आस-पड़ोस वाले भी उन्हें कोई न कोई ताना देते ही रहते। लेकिन अब्दुल अपनी मशीनों की दुनिया में खुश रहते।

“जब भी कुछ होता था, तो मैं हमेशा ही उसके होने के पीछे का कारण ढूंढता; उसका लॉजिक पता लगाने की कोशिश करता। हमेशा सवाल करता रहता और मेरे इन्हीं सवालों ने धीरे-धीरे इनोवेशन का रूप लेना शुरू कर दिया। मैंने कभी भी मशीनों को पढ़ा नहीं, पर उनके साथ खेलना और उन्हें इस्तेमाल करते हुए जानना, अच्छा लगता था,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए अब्दुल ने कहा।

यह भी पढ़ें: एक सर्जन की सोच और एक आम कारीगर के अनुभव का मेल है दुनिया का मशहूर ‘जयपुर फुट’!

अपने सबसे पहले इनोवेशन के बारे में बात करते हुए अब्दुल ने कहा कि बचपन में उन्होंने एक क्रिस्टल बर्ड खरीदी थी। कई दिन तक तो वे उससे खेलते रहे, पर फिर उनके दिमाग में उससे कई और तरह की चीज़ें बनाने के आईडिया आने लगे।

“मैंने उस क्रिस्टल बर्ड से एक ‘ग्रीटिंग मशीन’ बनाई, जिसमें यह बर्ड एक बैनर के साथ बाहर निकलती थी, जिस पर लिखा था ‘ईद मुबारक,'” अब्दुल ने बताया।

क्रिस्टल बर्ड को ‘ग्रीटिंग बर्ड’ में बदला

हर दिन अब्दुल किसी न किसी मशीन के साथ खेलते रहते। उनसे तंग आकर उन्हें घरवालों ने एक अलग कमरा दे दिया, जहाँ वे अपने सारे आविष्कारों के शौक पूरा कर सकते थे। धीरे-धीरे अब्दुल के आविष्कारों ने इस कमरे को मानों किसी तकनीकी लैब में तब्दील कर दिया।

यह भी पढ़ें: 60 वर्षीय दिव्यांग ने ई-वेस्ट का इस्तेमाल कर बनाई ई-बाइक, मथुरा का ‘देसी जुगाड़’ बना प्रेरणा!

उनकी इस लैब पर एक छोटा-सा विडियो देखने के लिए क्लिक करें!

इनोवेशन करते रहने के अलावा अब्दुल को हर रोज़ अख़बार पढ़ने में भी काफ़ी दिलचस्पी रहती थी। अख़बार से उन्हें देश-दुनिया के बारे में जानकारी मिलती, तो कभी-कभी अपना कोई आविष्कार बनाने के लिए प्रेरणा। दरअसल, अब्दुल हमेशा से ही ऐसे आविष्कारों को करने के लिए तत्पर रहे हैं, जिनसे आम जनता की कोई समस्या हल हो। ख़बरों से उन्हें जनता की बहुत-सी मुश्किलों के बारे में पता चलता और वे जैसे-तैसे उस पर कुछ करने की कोशिश करते।

एक बार उन्होंने अपने आस-पड़ोस में ही कहीं चोरी होने की ख़बर पढ़ी। इस ख़बर से प्रेरित होकर उन्होंने घरों में चोरी को रोकने के लिए एक ‘अलार्म सिस्टम’ बनाने का फ़ैसला किया।

“यह मोबाइल डोर इनफॉर्मर, मोबाइल नेटवर्किंग पर आधारित था। इसे बनाने के लिए मैंने तीन नोकिया 3300 हैंडसेट का इस्तेमाल किया। इसे मैंने ऐसे बनाया था कि यदि घर के मालिक की अनुपस्थिति में घर का दरवाज़ा कोई खोले, तो यह मालिक के फ़ोन से लास्ट डायल नंबर पर कॉल करेगा और साथ ही, सारे घर की लाइट भी स्विच ऑन हो जाएंगी,” अब्दुल ने बताया।

अपने स्कूल के बाद उन्होंने साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन की। हालांकि, उन्होंने यह विषय सिर्फ़ इसलिए चुना था, क्योंकि उनके दोस्तों ने कहा कि यह आसान है।

यह भी पढ़ें: बिहार: 14 साल की उम्र में बनाई ‘फोल्डिंग साइकिल,’ अपने इनोवेशन से दी पोलियो को मात!

इस बात पर हंसते हुए अब्दुल कहते हैं, “खैर, यह आसान तो नहीं था, पर मुझे काफ़ी-कुछ सीखने को मिला।”

साइकोलॉजी में लोगों के नज़रिए तथा उनके विचारों को समझना सिखाया जाता है और वे हमेशा मशीनों को समझने की कोशिश में रहे, ताकि उनकी मदद से लोगों की रोज़मर्रा की समस्याओं का हल ढूंढ सके।

मोबाइल डोर इनफॉर्मर के बाद उन्होंने गमलों में पौधों को पानी देने के लिए एक ‘ऑटोमेटिक वाटरिंग सिस्टम’ बनाया।

उन्होंने ऐसा डिवाइस बनाया, जो अपने सेंसर की मदद से मिट्टी में नमी के स्तर का पता करके, आवश्यकता अनुसार गमलों में पानी दे सकता है। और जैसे ही नमी का स्तर सामान्य हो जाये, तो यह डिवाइस पानी देना बंद कर देता है।

उन्होंने कहा, “यह बहुत छोटी-सी ज़रूरत है, पर अगर आपको कहीं बाहर जाना है और आपके घर में आपके पौधों को पानी देने के लिए कोई नहीं है, तो आप इस सिस्टम का इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं। मैं लोगों की ऐसी ही छोटी-छोटी परेशानियां दूर करना चाहता हूँ।”

उनका ‘आटोमेटिक वाटरिंग सिस्टम’

इसी तरह एक बार उन्होंने सुना कि बिजली आदि के तार ठीक करते समय करंट लगने से किसी की मौत हो गयी है, तो उन्हें लगा कि उन्हें इन लोगों के लिए कुछ करना चाहिए। अपने शोध के दौरान उन्होंने पाया कि ज़्यादातर करंट की समस्या शोर्ट-सर्किट की वजह से होती है। इस पर काम करते हुए उन्होंने एक ‘शोर्ट-सर्किट अलार्म’ बनाया।

Promotion

आपके घर की या फिर कहीं भी किसी वायर में शोर्ट सर्किट हुआ है, तो इस अलार्म की मदद से आप पता लगा सकते हैं।

शोर्ट-सर्किट अलार्म

साल 2009 में अब्दुल को अख़बार के ज़रिए ही ‘नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन’ के बारे में पता चला। उनके दोस्तों और शिक्षकों ने उन्हें अपने इनोवेशन भेजने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपने आविष्कार भेजे और 21 नवंबर 2009 को तत्कालीन राष्ट्रपति, प्रतिभा पाटिल ने उन्हें उनके आविष्कारों के लिए सम्मानित किया।

यह भी पढ़ें: कभी आर्थिक तंगी के चलते छूट गया था कॉलेज, आज कृषि के क्षेत्र में किये 140 से भी ज़्यादा आविष्कार!

इस फाउंडेशन ने उन्हें एक ‘सीरियल इनोवेटर’ के तौर पर देखा, जो कि कई तरह की तकनीक पर काम कर सकता है।

सम्मान पाते अब्दुल कलीम

साल 2014 में उनकी मुलाक़ात हावर्ड यूनिवर्सिटी के एक ग्रेजुएट गौतम कुमार से हुई, जिन्हें अब्दुल के आविष्कारों में सुनहरा भविष्य नज़र आया!

यह भी पढ़ें: गाँव में पानी न होने के चलते छोड़नी पड़ी थी खेती, आज किसानों के लिए बना रहे हैं कम लागत की मशीनें!

गौतम और अब्दुल ने साथ में मिलकर, ‘मिट्टी में नमी का स्तर पता लगाने वाले सेंसर’ की टेक्नोलॉजी पर आगे काम किया तथा सेंटर फॉर इंटरनेशनल प्रोजेक्ट्स ट्रस्ट (CIPT) के लिए मोबाइल वैदर प्रेडिक्शन स्टेशन पर भी काम किया। यह प्रोजेक्ट कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के अर्थ इंस्टिट्यूट के साथ था। सौर ऊर्जा से संचालित उनका यह मौसम का हाल बताने वाला स्टेशन, कम से कम लागत में लग सकता है।

झारखंड के बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने राज्य के अंगारा ब्लॉक में इस तकनीक को स्थापित करने की योजना दी थी। इसकी मदद से लगभग 700 किसानों को सीधा फायदा पहुंचेगा।

कलीम द्वारा बनाया गया बहुत कम लागत का ‘वेदर स्टेशन’

इससे पहले भी अब्दुल ने एक ‘फ्लड अलर्ट मशीन’ बनाई थी। वैसे तो, उनकी इस मशीन को कहीं भी कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिली, पर अब्दुल का कहना है कि यह मशीन भारत के ऐसे गांवों के लिए कारगर है, जो कि हर साल बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा झेलते हैं।

“जब भी मुझे कहीं बाढ़ आने की ख़बर मिलती, तो मैं सोचता था कि आख़िर क्यों गाँव के लोग पहले ही कहीं और शिफ्ट नहीं हो जाते। ऐसे कम से कम उनकी ज़िन्दगी तो बचेगी। पर साथ ही, यह भी सवाल होता कि आख़िर उन्हें बाढ़ के बारे में कौन बतायेगा? फिर मुझे पता चला कि इस काम के लिए भी लोगों को नियुक्त किया जाता है, जो कि गाँव के आस-पास नदी, बाँध, झील आदि में पानी का स्तर समय-समय पर चेक करते हैं और प्रशासन को सुचना देते हैं। लेकिन यह इतनी लम्बी प्रक्रिया है कि प्रशासन समय रहते कुछ नहीं कर पाता,” अब्दुल ने कहा।

इसलिए उन्होंने बाढ़-पीड़ित गांवों के लिए एक ‘अलर्ट सिस्टम’ बनाने का विचार किया। इसमें उन्होंने नदी में अलग-अलग लेवल पर स्केल फिट किये और फिर इन्हें एक अलार्म के साथ जोड़ा। जैसे ही, पानी का स्तर तीसरे लेवल (बाढ़ की आशंका) तक आएगा, तो तुरंत इस डिवाइस से जुड़े साईरन बजने लगेंगें और गाँव वालों को सुचना मिल जाएगी कि बाढ़ आ सकती है।

यह भी पढ़ें: अपने सस्ते और असरदार आविष्कारों से लाखों किसानों को आत्मनिर्भर बना रहा है 20 साल का यह किसान!

कई बार उन्होंने लोगों के घरों के लिए उनकी ज़रूरत के हिसाब से भी अविष्कार बनाये हैं, जैसे कि उन्होंने अपने एक जानकार के घर के लिए ‘यूनिवर्सल लाइट कंट्रोलिंग रिमोट’ बनाया था। अब्दुल हमेशा से ही लोगों के लिए अविष्कार करना चाहते थे, ताकि उनकी हर दिन की परेशानियाँ हल हों।

हालांकि, बहुत बार प्रशासन और अपने आस-पास के लोगों का अपने प्रति उदासीन रवैया देख, उन्हें दुःख होता है, लेकिन वे कभी निराश नहीं होते। बल्कि, जब भी उन्हें वक़्त मिलता है, तो वे अपने किसी न किसी नए अविष्कार पर काम शुरू कर देते हैं।

यह भी पढ़ें: बिना किसी डिग्री के छोटे छोटे आविष्कार करके गिरीश बद्रगोंड सुलझा रहे है किसानो की मुश्किलें !

फ़िलहाल, वे नोएडा में एक लिथेनियम कंपनी के साथ कंसलटेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस काम के दौरान उन्हें काफ़ी कुछ सीखने को भी मिल रहा है, क्योंकि आने वाले समय में लिथेनियम बैटरी का अच्छा इस्तेमाल होगा। हालांकि, उनका सपना अभी भी अपने गाँव में खुद का एक स्टार्ट-अप शुरू करने का है, जहाँ वे लोगों की ज़रूरत के लिए आविष्कार बनाएं और साथ ही, गाँव के बच्चों को भी सिखाएं।

अंत में वे सिर्फ़ इतना कहते हैं,

“यदि कोई सामान्य व्यक्ति या फिर ग्रामीण परिवेश का कोई बच्चा, अगर कुछ नया अविष्कार करता है, भले ही वह बहुत बड़ा न हो, पर हमें उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। क्योंकि ज़रूरी नहीं कि आप बड़े हैं या अनुभवी हैं, तो आपको ही सब कुछ पता है; हो सकता है किसी छोटे इंसान का कोई छोटा-सा ही सवाल बहुत सी समस्याओं का समाधान खोल दे।”

यदि आपको अपने लिए किसी रोज़मर्रा की ज़रूरत का इनोवेशन करवाना हो, तो आप अब्दुल कलीम से 7011479828 पर संपर्क कर सकते हैं!

(संपादन – मानबी कटोच)


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

शेयर करे

Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

ज़िंदगी की छोटी-छोटी खुशियाँ हमेशा ही बहुत ख़ास और ज़रूरी होती हैं!

कुमाऊंनी होली! जब उत्‍तराखंड का पर्वतीय समाज झूम उठता है शास्‍त्रीय रागों और ठुमरी की तान पर!