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मधुमक्खियों को देश भर के खेतों में ले जाकर, किसानों की फ़सल दुगनी कर रहा है यह युवक!

हाराष्ट्र के रायगड़ जिले के म्ह्सला गाँव में पले-बढ़े निलेश पोतदार ने साल 2000 में बी.कॉम की डिग्री हासिल की और नौकरी के लिए मुंबई आ गए। यहाँ पर पहले वे जिस मकान में रहते थे उसके आगे थोड़ी सी जगह में वे अपनी बागबानी का शौक पूरा कर लेते थे। पर फिर जब वे नौकरी बदलकर ठाने में रहने आये, तो ऊपरी मंजिल पर घर होने की वजह से बागबानी से उनका नाता जैसे छूट ही गया।

“मेरे दादाजी किसान थे, इसलिए मुझे बचपन से ही पेड़-पौधों में दिलचस्पी थी, पर इस नए मकान में मैं इसकी कमी महसूस करने लगा,” निलेश कहते है।

निलेश का ज़्यादातर काम इन्टरनेट में होने की वजह से वे खेती के बारे में हुए नए-नए शोध और वर्कशॉप्स के बारे में जानकारी लेते रहते थे। जल्द ही वे इन वर्कशॉप्स में जाने भी लगे।

“मुझे इन वर्कशॉप्स में इतना मज़ा आने लगा, कि मैंने एक वर्कशॉप में शामिल होने के लिए एक महीने की छुट्टी ले ली,” निलेश ख़ुशी से बताते हैं।

नौकरी करते हुए अभी तीन-चार साल ही हुए थे, जब निलेश ने इस बात का फ़ैसला कर लिया था, कि उन्हें खेती में ही अपना भविष्य बनाना है।

पर खेती करने के लिए ज़मीन की ज़रूरत होती है, जो उनके पास नहीं थी। अब वे ऐसे विकल्प खोजने लगे, जिसमें उन्हें ज़मीन की ज़रूरत भी न पड़े और वे खेती-बाड़ी से जुड़े भी रहे। इसी दौरान उन्हें मधुमक्खी-पालन के बारे में पता चला। इसके बारे में जानकारी लेने के लिए उन्होंने एक कोर्स किया और कई एक दिवसीय कार्यशालाओं में भी गए। इसके बाद उन्हें राजस्थान में एक किसान के बारे में पता चला, जो मधुमक्खी पालन करते थे। निलेश उनके पास पहुँच गए और उनके पास रहकर कुछ दिन तक उन्होंने इस काम को सीखा। उन्हीं के परिचित कुछ और मधुमक्खी-पलकों के पास भी वे बारी-बारी जाकर रहे।

“जब मैं पहले दिन शहद निकालने गया, तो मुझे एक मधुमक्खी ने काट लिया। उसका दर्द इतना था कि शुरू में तो मुझे लगा कि मैं यह नहीं कर सकता। पर जैसे-जैसे दर्द कम हुआ, मेरा हौसला और बढ़ गया, मुझे लगा कि यह तो कुछ भी नहीं है, मैं यह ज़रूर कर सकता हूँ,” निलेश ने हँसते हुए बताया।

साल 2013 में निलेश ने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दिया और पूरी तरह इस काम में लग गए। करीब एक साल तक पैसे न होने की वजह से वे इस काम को शुरू नहीं कर पाए। पर फिर नवम्बर 2014 में किसी तरह पैसों का इंतजाम करके उन्होंने मधुमक्खियों की 100 पेटियां खरीद ली।

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शुरुआत में आई मुश्किलों के बारे में बताते हुए निलेश कहते हैं, “किसान यह शब्द हमारे देश में गरीबी का पर्यायवाचक माना जाता है। मेरे माता-पिता के लिए भी यह बहुत बड़ा धक्का था कि मैं अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़कर, मधुमक्खी पालने जा रहा हूँ। मैंने किसी तरह उन्हें तो मना लिया था, पर शुरुआत में इस काम का तजुर्बा न होने की वजह से मुझे कई बार नुकसान झेलना पड़ा। पर यह मेरे मन का काम था और मैं इसमें हार नहीं सकता था।“

हर मुश्किल का सामना करते हुए निलेश आगे बढ़ते रहे और आज वे एक वक़्त पर 270 पेटियों में मधुमक्खी पालन का काम करते हैं।

 

दिसंबर से लेकर मार्च तक सरसों की फ़सल के दौरान निलेश पंजाब में रहते हैं। वहां के खेतों में जाकर अपनी मधुमखियों को छोड़ते हैं और शहद इकठ्ठा करके लाते हैं। इसी तरह लीची के मौसम में हिमाचल में, बाजरे के मौसम में मध्य-प्रदेश में और राजस्थान में भी वे 2-2 महीनें बिताते हैं।

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निलेश के इस काम से न सिर्फ़ उनके साथ काम करने वाले 4 मजदूरों को रोज़गार मिला है, बल्कि किसानों की फ़सल भी दुगनी हो गयी है।

“मधुमखियाँ पोलीनेशन का काम करती हैं, उनके होने से फूलों के पराग और बीज यहाँ से वहां होते हैं और उत्पाद ज़्यादा होता है,” निलेश ने बताया।

निलेश के साथ सालों से काम कर रहे किसान अब उनके समय पर न आने पर, उन्हें फोन करके बुलाते हैं और साथ ही जागरूक किसान उनसे मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण भी ले लेते है।

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निलेश इस बात का ख़ास ध्यान रखते हैं कि शहद निकालते हुए मधुमक्खियों को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो। उनके मुताबिक़ वे शहद निकालने का वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल करते हैं, जो उन्हें कोर्स के दौरान सिखाया गया था और जिसमें इन मधुमक्खियों को कोई हानि नहीं पहुँचती।

जिस भी खेत में वे जाते हैं, वहां इन मधुमक्खियों के बीच ही तम्बू लगा कर रह लेते है और सप्ताह में एक बार शहद निकालते हैं। इस ताज़े और कच्चे मधु को वे स्थानीय डीलरों को ही बेचते है। अभी तक उन्होंने इसे रिटेल में बेचने का विचार नहीं किया है। उनका कहना है कि उन्हें इसी तरह जगह-जगह जाकर किसानों के काम आने में आनंद मिलता है।

पूरे भारत का भ्रमण करने वाले निलेश से जब हमने उनके सबसे पसंदीदा जगह के बारे में पुछा तो उन्होंने कहा, “पंजाब के किसान और लोगों की तो बात ही निराली है जी। कई बार, जिस खेत पर मुझे जाना होता है, वह इतने जंगलों में जाकर होता है कि वहां तक जाने के लिए कोई गाड़ी भी नहीं होती, ऐसे में मैं पैदल ही निकल पड़ता हूँ, पर पंजाब में भले ही कोई आपको जानता भी न हो, पर जब उन्हें पता चलता है कि मैं बाहर से आया हूँ, तो कोई न कोई मुझे खेत तक छोड़ ही आता है।“

निलेश अपने मधुमक्खी पालन के इस काम से सालाना 4-5 लाख रुपयों का मुनाफ़ा कमा लेते हैं। उनका मानना है कि पैसे से ज़्यादा उनके लिए संतुष्टि मायने रखती है, जो उन्हें इस काम को करके मिल रही है।

“खेती के लिए मधुमक्खियों का होना बहुत ज़रूरी है और यह बात मैं हर एक किसान तक पहुँचाना चाहता हूँ। अगर हर किसान हर साल सिर्फ़ एक पेटी मधुमक्खी ही पाल ले, तो उनकी फ़सल की पैदावार में ज़रूर बढ़ोतरी होगी और साथ ही शहद बेचकर अतिरिक्त आमदनी भी,” निलेश ने किसानों को यह सन्देश दिया।

उम्मीद है कि निलेश की यह कोशिश ज़रूर कामयाब होगी! निलेश से मधुमक्खी पालन से सम्बंधित कोई भी प्रश्न पूछने के लिए अथवा बी-बॉक्स खरीदने के लिए आप उन्हें 8097441113 पर संपर्क कर सकते हैं!

 


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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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