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22 वर्षीय छात्र ने ली स्लम के बच्चों की ज़िम्मेदारी, आईआईटी के लिए तैयार करना है लक्ष्य!

कितनी ही बार आप किसी कॉलेज के छात्र से सुनते हैं कि वह तीन बच्चियों की ज़िम्मेदारी लेना चाहता है, और अगर सुनते हैं, तो एकदम चौंक जाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ, जब मुझे पता चला कि भोपाल के राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से एम. ए कर रहे 22 वर्षीय श्रीनिवास झा, स्लम में रहने वाली तीन गरीब बच्चियों की पूरी ज़िम्मेदारी लेकर उनकी ज़िंदगी संवारना चाहते हैं।

श्रीनिवास फिलहाल इन बच्चियों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं और साथ ही इनकी आगे की ज़िंदगी को लेकर इनके माता- पिता से बात कर रहे हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए श्रीनिवास ने बताया,

“नंदिनी, प्रियंका और सोनाली, तीनों बहने हैं। उनके घर की आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं है, पर मेरा विश्वास है कि ये तीनों बहने अपनी ज़िंदगी में बहुत आगे जा सकती हैं। इसलिए मैं चाहता हूँ कि मैं इनकी पूरी ज़िम्मेदारी लूँ और उन्हें इस स्लम से निकालकर एक अलग दुनिया में भेजूं, ताकि इनकी आने वाली ज़िंदगी बेहतर हो।”

एक छात्र होने के साथ-साथ श्रीनिवास झा की एक और पहचान है; भोपाल के स्लम ‘अन्ना नगर’ के बच्चों के ‘श्रीनिवास भैया’ के रूप में। अपनी पहल, ‘आरोह तमसो ज्योति‘ मतलब ‘अंधकार से प्रकाश की ओर’ के ज़रिए, श्रीनिवास और उनके साथी, निःस्वार्थ भाव से स्लम में रहने वाले बहुत-से गरीब बच्चों का जीवन संवार रहे हैं।

श्रीनिवास निवास झा (फेसबुक)

“हम अक्सर ट्रैफिक सिग्नल या फिर स्टेशन आदि पर बच्चों को भीख माँगते या फिर अख़बार, चने आदि बेचते हुए देखते हैं। कई बार ख्याल भी आता है कि ये बच्चे ऐसा क्यों कर रहे हैं और हम उनसे बात करने की कोशिश करते हैं। ऐसे ही एक बार मैंने एक बच्चे को रोका और उससे बात करना शुरू किया। पर उससे बात करते हुए 10 मिनट भी नहीं हुए होंगें कि कहीं से दो आदमी आये और उस बच्चे को अपने साथ ले गये। मैं बिल्कुल हैरान था कि ये लोग कौन थे,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए श्रीनिवासने कहा।

इस बारे में श्रीनिवास ने अपने कुछ दोस्तों से बात की, तो उन्हें पता चला कि कैसे कई गिरोह, गरीब और यतीम बच्चों को भिक्षावृत्ति और बाल-मज़दूरी में झोंक देते हैं। यह जानकर श्रीनिवास को लगा कि किसी भी तरीके से उन्हें इन बच्चों के लिए कुछ करना चाहिए।

उन्होंने अपने एक दोस्त, राहुल अग्रवाल (जो कि नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, भोपाल में पढ़ रहे थे) के साथ इस बारे में चर्चा की। राहुल ने उन्हें और भी कई छात्रों के साथ जोड़ा और इन सभी ने मिलकर शहर की झुग्गी-झोपड़ियों का सर्वे किया और भोपाल में ‘अन्ना नगर’ नामक एक स्लम से अपनी मुहिम शुरू की।

“हमने धीरे-धीरे करके वहाँ जाना शुरू किया। पर वहाँ बस्ती में कोई हमसे बात करने को तैयार ही नहीं था। सब हमें नज़रअंदाज करके निकल रहे थे। किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि हम क्या करना चाहते हैं,” श्रीनिवास ने कहा।

पर कहते हैं न, कि अगर आपके इरादे मज़बूत हो, तो आपको रास्ता मिल ही जाता है। श्रीनिवास और उनके साथियों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उन्होंने हार नहीं मानी और वे जैसे-तैसे स्लम के लोगों से बात करने की कोशिश में जुटे रहे। उनके इस प्रयास का ही नतीजा था कि उनकी मुलाक़ात आरती से हुई, जिसने बस्ती के लोगों और श्रीनिवास की टीम के बीच एक सेतु का काम किया। बस्ती में बहुत से लोगों के मन में उन्हें लेकर संदेह था, पर अब आरती के ज़रिये बस्ती वाले उनकी बात सुन रहे थें!

स्लम में श्रीनिवास और उनकी टीम ने बच्चों का सर्वे किया कि कौन बच्चा पढ़ना चाहता है और कौन नहीं? शुरू में, सिर्फ़ 20 बच्चों को उन्होंने चुना। श्रीनिवास और उनकी टीम का उद्देश्य इन बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलवाकर इनके भविष्य को संवारना है।

‘आप पूरी दुनिया नहीं बदल सकते, लेकिन अगर आपकी वजह से किसी एक बच्चे या फिर एक इंसान की भी दुनिया बदल जाए, तो क्या बुरा है’ – बस इसी सोच पर काम करते हुए, श्रीनिवास ने साल 2015 में इन 20 बच्चों के साथ ‘आरोह’ की शुरुआत की।

रक्षा-बंधन कार्ड लिए आरती

सिर्फ़ 4-5 महीनों में ही यह तादाद बढ़कर 50 हो गयी। ये सभी बच्चे ऐसे थे, जो आगे पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके माता-पिता उनकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते थे।

श्रीनिवास बताते हैं, “शुरुआत में इन बच्चों के माता-पिता को राज़ी करना काफ़ी मुश्किल रहा। वे इन्हें हमारे पास पढ़ने के लिए नही भेजते थे। फिर इन बच्चों को भी रेगुलर होने में काफ़ी वक़्त लगा।”

जब श्रीनिवास ने यहां काम करना शुरू किया, तो इन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बिल्कुल ना के बराबर थी। कईयों को तो उनका नाम तक लिखना भी आरोह के स्वयंसेवकों ने सिखाया। पर आज लगभग 4 साल बाद, आरोह की टीम जो कभी 4 लोगों से शुरू हुई थी, वह लगभग 150 लोगों तक पहुंच चुकी है। साथ ही, आज ये 50 बच्चे अच्छे से पढ़-लिख रहे हैं। इन 50 बच्चों में से 12 बच्चों का दाखिला प्राइवेट स्कूलों में करवाया गया है।

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“आज मुझे यह बताते हुए बहुत गर्व होता है कि हमारे बच्चे आज स्कूल में अव्वल आते हैं। उनके लिए उनके माँ-बाप, गार्डियन सब हम ही हैं। हम लोग उनके स्कूल की मीटिंग में जाते हैं, तो वहां टीचर्स भी हैरान हैं कि स्लम में रहने वाले बच्चों के आज 90-95% नंबर आ रहे हैं।”

‘आरोह’ के स्वयंसेवकों के साथ अन्ना नगर के बच्चे

आगे की योजना पर बात करते हुए श्रीनिवास कहते हैं कि उन्होंने ‘आरोह’ को कभी भी कोई बड़ा एनजीओ या फिर संस्था
बनाने का नहीं सोचा है। उन्हें अपने लिए आरोह से कोई पैसा नहीं कमाना है, बस उनकी इच्छा है कि इसके ज़रिये इन बच्चों का जीवन संवर जाए।

शुरू में तो ये सभी लोग आपस में ही मिलकर कुछ न कुछ इकट्ठा करके बहुत-से काम कर लेते थे। किसी महीने वे लोग फ़िल्म देखने नहीं जाते या फिर किसी और चीज़ पर खर्च नहीं करते, और वह पैसे इन बच्चों के लिए दे देते। ऐसे कर-करके उन्होंने इन बच्चों की कॉपी-किताब, कपड़े आदि का खर्च चलाये रखा। पर फिर जब इन बच्चों ने पढ़ाई में अच्छा करना शुरू किया, तो उनका दाखिला अच्छे स्कूलों में करवाने के लिए इन लोगों ने फंड-रेज़ करना शुरू किया।

“हमने कभी पानी-पुरी का स्टॉल लगाया, तो कभी कुछ और बेचा। पर हमारी मेहनत अब साकार हो रही है। हमारे बच्चे हमारी पहचान बन रहे हैं,” श्रीनिवास ने गर्व से कहा।

फंड्स के लिए लगाये पानीपूरी स्टॉल

श्रीनिवास ने द बेटर इंडिया को चार ऐसे बच्चों के नाम बताए, जिनका प्रदर्शन स्कूल में बहुत ही अच्छा है – लावण्या सावंत, सुजीत प्रजापति, सिद्धार्थ लोखंडे और मयूरी जवारे। ये चारों बच्चे पढ़ाई में बहुत अच्छे हैं और आगे चलकर कुछ अच्छा करना चाहते हैं। इसलिए अब श्रीनिवास और उनकी टीम ख़ास तौर पर इन चार और अपने अन्य कुछ बच्चों के लिए स्पॉन्सर ढूंढ रही है ताकि इनकी शिक्षा में कोई रूकावट न आये।

“अगर आज समृद्ध लोग इन बच्चों में से एक-एक बच्चे की शिक्षा का खर्च भी उठा लें, तो यकीनन बदलाव लाया जा सकता है,” श्रीनिवास कहते हैं!

इन बच्चों के बारे में बताते हुए श्रीनिवास ने कहा कि सुजीत कभी सिग्नल पर खड़े होकर अख़बार बेचता था। घर में भी आर्थिक तंगी इतनी थी, कि उसकी पढ़ाई तो दूर की बात, घर चलाना भी मुश्किल था। 

पहले सुजीत अख़बार बेचता था और अब वह अपने स्कूल में टॉपर है!

फिर आरोह की टीम ने सुजीत को पढ़ाना शुरू किया और पढ़ाई में उसकी रूचि देखते हुए, एक प्राइवेट स्कूल में उसका दाखिला करवाया।

हालांकि, उसकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई। सुजीत के पिता को यह विश्वास दिलाना कि उनका बेटा ज़िन्दगी में कुछ कर सकता है और वह सुरक्षित हाथों में है, काफ़ी चुनौतीपूर्ण था। लेकिन आरोह की टीम ने हर एक चुनौती का सामना किया और आज सुजीत को सफ़ल होते देखकर उसके पिता फूले नहीं समाते हैं।

कुछ ऐसी ही कहानियां बाकी बच्चों की भी हैं, जिनमें से किसी के पिता छोटे-मोटे मैकेनिक हैं, तो किसी की माँ दूसरों के घरों में काम करके खर्च चलाती हैं।

अब श्रीनिवास चाहते हैं कि वे इन बच्चों को उनके करियर के लिए तैयार करें। इसलिए, वे इन बच्चों की आईआईटी-जेईई और मेडिकल आदि की कोचिंग शुरू करवाना चाहते हैं।

“मुझे पता है कि ये सभी बच्चे बहुत आगे जायेंगें। इन्हें बस थोड़ी-सी मदद और साथ की ज़रूरत है। वैसे तो हम भोपाल में कोचिंग इंस्टिट्यूट आदि से बात कर रहे हैं, अगर वे इन बच्चों को मेरिट के आधार पर स्पोंसर कर पाएं तो,” श्रीनिवास ने कहा।

आरोह की टीम

अंत में श्रीनिवास केवल इतना ही कहते हैं कि अगर कभी भी कोई भोपाल आए, तो अन्ना नगर स्लम के इन बच्चों से मिलें। आपको अंदाज़ा होगा कि एक छोटा-सा कदम कैसे इन बच्चों के जीवन में बड़े से बड़े बदलाव का कारण बन सकता है।

यदि आप इस बदलाव का हिस्सा बनाना चाहते हैं, तो श्रीनिवास झा से 07566309722 पर संपर्क करें!

(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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