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26 साल की उम्र में 18 पेटेंट्स है इस युवक के नाम, सोनम वांगचुक के साथ मिलकर पढ़ाते हैं बच्चों को

“पढ़ाई मुझे ज़्यादा अच्छी नहीं लगती थी कभी भी, क्यूंकि किताबों में जो कुछ भी लिखा हुआ था, वो दिख ही नहीं रहा था कि मैं कहाँ पर यूज़ करूँ। इसका इस्तेमाल कहाँ पर कर सकते हैं, वो कुछ समझ ही नहीं आता था। मैं घरवालों को पूछता था कि किसलिए पढ़ना ज़रूरी है? टीचर से पूछता था पढ़ने के बाद, कि इसका उपयोग कहाँ होगा? तो सभी लोग बोलते थे, कि… मार्क्स लाने के लिए पढ़ना होता है। या फिर अच्छी नौकरी मिलने के लिए पढ़ना होता है। तो.. उस वक़्त से ही मैं संतुष्ट नहीं था ऐसे एजुकेशन सिस्टम से,” यह कहना है भारत के सबसे कम उम्र में सबसे ज़्यादा पेटंट धारक बनने वाले अजिंक्य कोट्टावार का।

 

अजिंक्य का जन्म महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के पाटनबोरी नामक छोटे से गाँव में हुआ। उनके पिता इस गाँव से 75 किमी दूर वणी में स्थित स्पिन्निंग मिल में कार्यरत थे और माँ इसी गाँव के सरकारी स्कूल में टीचर थीं। अजिंक्य की प्राथमिक शिक्षा इसी गाँव में पूरी हुई।

पर उनका कहना है कि इस गाँव में उन्हें शिक्षा से ज़्यादा सवाल मिले, जिनके हल ढूंढते-ढूंढते ही आज 25 साल की उम्र में उन्होंने अपने नाम 18 पेटेंट्स कर लिए है और 19वें की तैयारी में हैं।

अजिंक्य अपने गाँव में स्कूल से ज़्यादा खेतों में, नदी के पास, या काम करते हुए लोगों के पास ज़्यादा नज़र आते। अक्सर बच्चों को भी पानी की भारी मटके उठाकर ले जाता देख उनके मन में आता कि कोई ऐसी मशीन होनी चाहिए, जिससे ढेर सारा पानी एक साथ आसानी से नदी से लोगों के घरों तक पहुँच जाए। और सच में आगे चलकर अजिंक्य ने एक ऐसा ड्रम बनाया जिसके नीचे चक्के लगे है और जिसके घुमने से उसके अन्दर लगे फ़िल्टर से पानी साफ़ भी हो जाता है। इस ड्रम में एक दस साल का बच्चा भी 200 लीटर पानी बड़ी आसानी से खींच कर ले जा सकता है।

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नौवीं तक पाटनबोरी में पढ़ने के बाद अजिंक्य को आगे की पढ़ाई के लिए यवतमाल भेज दिया गया।

“गाँव से शहर आने के बाद मुझे अपने प्रश्नों के हल मिलने लगे। ‘गाँव में बिजली क्यूँ नहीं थी, यहाँ क्यूँ है?‘ या ‘शहर में जिन मशीनों से काम आसान होता है, वह मशीनें गाँव तक क्यूँ नहीं पहुँचती?’ इन जैसे कई सवालों की जड़ तक जाने के लिए मैं उनकी तह तक जाने लगा,” अजिंक्य ने अपने जीवन के बारे में बताते हुए हमसे कहा।

मशीनों में उनकी रुची को देखते हुए अजिंक्य के माता-पिता ने उन्हें बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग करने की सलाह दी। पर भारत के ज़्यादातर बच्चों की तरह, अजिंक्य को भी अब तक यह पता नहीं था कि इंजीनियरिंग में पढ़ाया क्या जाता है या इसके अलग-अलग विभागों में क्या फर्क है।

“एडमिशन लेने से पहले मैं कॉलेज गया और सब विभागों के लैब में जाकर देखा। यहाँ पर मुझे मैकेनिकल का वर्कशॉप सबसे ज़्यादा दिलचस्प लगा, इसलिए मैंने यह ब्रांच ले लिए,” अजिंक्य ने अपने इंजीनियरिंग के बारे में बात करते हुए बताया।

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अजिंक्य अभी द्वितीय वर्ष में ही थे कि उन्होंने अपना पहला आविष्कार कर दिखाया। यह आविष्कार था – “A VARIABLE VOLUME PISTON CYLINDER ASSEMBLY”. यह एक ऐसा यंत्र था जिसकी मदद से आप किसी भी गाड़ी को केवल एक बटन दबाकर अलग-अलग सीसी में तब्दील कर सकते हैं।

इंजीनियरिंग के चौथे और आख़िरी वर्ष तक पहुँचने तक अजिंक्य एक और आविष्कार कर चुके थे – “A MULTI FUEL INTERNAL COMBUSTION ENGINE”. इस इंजन को पेट्रोल, डीजल, बैटरी या फिर मिश्रित इंधन के साथ भी चलाया जा सकता है। अजिंक्य का कहना है कि जहाँ फ़िलहाल मार्किट में मिल रहीं बैटरी वाली गाड़ियाँ एक बार चार्ज करने पर केवल 120 किमी ही चलती है, वहीं यह इंजन एक बार चार्ज करने और एक लिटर पेट्रोल के साथ करीब 300 किमी तक चलेगी। हाल ही में इस अविष्कार पर काम करने के लिए अजिंक्य ने ‘महिन्द्रा’ के साथ हाथ मिलाया है।

 

2013 में यवतमाल से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद अजिंक्य को एनआईटी, सिलचर (National Institute Of Technology , Silchar) में स्थान मिल गया। वहां जाने का उनका उद्देश्य केवल ज़्यादा से ज़्यादा रिसर्च कर, लोगों के लिए और उपयोगी चीज़े बनाना था। अजिंक्य सिलचर जाकर आस-पास के किसानों और गाँववालों से मिलने लगे और उनसे काफ़ी कुछ सीखने और समझने लगे। इसी तरह उन्होंने वहां चाय की पत्ती से बायो-डीजल तैयार किया। पर उनका इस तरह गाँववालों से मिलना-जुलना और अपने ही स्तर पर संशोधन करना कॉलेज प्रशासन के कुछ लोगों को पसंद नहीं आया और उन्हें तुरंत यह सब बंद करने को कहा गया।

“मैं वहां सीखने गया था, किताबों और डिग्रियों में तो मुझे कभी इंटरेस्ट था ही नहीं। जब उन लोगों ने कहा कि सीखना और रिसर्च करना बंद कर दो, तो मुझे लगा कि फिर मेरा यहाँ क्या काम और मैं वहां से निकल आया,”

अजिंक्य की इस बात को सुनकर मुझे 3 इडियट्स के फुन्सुख वांगडू की याद आ गयी।

अगला किस्सा भी अजिंक्य ने इसी बात पर सुनाया, याने की असल ज़िन्दगी के फुंसुक वांगडू, सोनम वांगचुक के बारे में। अजिंक्य का कहना है कि उन्होंने 2009 में जब से फ़िल्म ‘3 इडियट्स’ देखी थी, तब से उनका सपना था कि एक दिन वे सोनम वांगचुक के साथ काम करें। एनआईटी से 2014 में लौटने के बाद से उनकी यह इच्छा और प्रबल हो गयी थी। वे चाहते थे कि सोनम से मार्गदर्शन लेकर वे एक ऐसे एजुकेशन सिस्टम की शुरुआत करें, जिसमें बच्चों को किताबी कीड़ा बनकर डिग्री लेने की बजाय चीज़ों को खुद करके कुछ नया सीखने पर जोर दिया जाए।

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आख़िर उनकी यह इच्छा तब पूरी हुई जब करीब 12 पेटेंट्स अपने नाम करने के बाद 2016 में उन्होंने सोनम वांगचुक को एक ईमेल किया। करीब 36 घंटे बाद सोनम का उन्हें जवाब आया, कि वे उनसे मिलना चाहते हैं।

“शुरुआत में मैं उनके साथ लद्दाख में ही काम करना चाह रहा था। पर सोनम जी ने मुझे अपने इलाके में जाकर वही करने को कहा, जो वे लद्दाख में कर रहे थे और यहीं से मेरे जीवन ने एक नया मोड़ लिया,” अजिंक्य ने बताया!

अपने जिले में लौटकर अजिंक्य अलग-अलग स्कूल-कॉलेजों में जाकर बच्चों को प्रैक्टिकल तरीके से उनके ही सिलेबस को पढ़ाने लगे। इस तरह उन्होंने यवतमाल में ही करीब 22, 000 बच्चों में अपना ज्ञान बांटा। इस दौरान उन्होंने पांचवी से लेकर दसवीं कक्षा तक के सिलेबस को मॉडल्स में ढाल दिया, जिससे बच्चे पढ़कर नहीं बल्कि देखकर और खुद काम करके हर एक विषय को सीख सकते हैं।

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“यदि आप किसी बच्चे को यह बताये कि टेबल कैसे एक जगह से दूसरी जगह रखा जाता है, तो वह टेबल को रखने का केवल एक ही तरीका सीखेगा। पर अगर आप बस टेबल उसके सामने रखकर उसे इसे हटाने को कहे, तो वह इसे हटाने के कई तरीके सोचेगा, उठाकर रखना है या सरकाकर रखना है वगैराह-वगैराह,” अजिंक्य तर्क देते हुए कहते हैं।

2018 में उन्होंने ‘ज्ञान फाउंडेशन’ की शुरुआत की, जहाँ पांचवी से दसवीं तक के बच्चे बिना क़िताब के हर विषय सीखते हैं!

अजिंक्य ने इस शिक्षा संस्था के लिए 4000 से ज़्यादा प्रोजेक्ट बनाए हैं। केवल गणित के लिए ही 500 मॉडल्स है, जिनसे 2500 कॉन्सेप्ट्स को सीखा जा सकता है।

इनके अलावा विज्ञान, भूगोल और इतिहास जैसे विषयों के लिए भी प्रोजेक्ट्स, मॉडल्स और गेम्स बनाए गए हैं। अजिंक्य का दावा है कि इतिहास की केवल आधे घंटे की क्लास होती है, जिसमें खेले गए गेम्स के ज़रिये वो जो कुछ सीखते है, वह उन्हें हमेशा याद रहता है।

“किसी भी मशीन के बारे में सीखने के लिए मैं बच्चों के हाथ में सिर्फ़ एक स्क्रू ड्राईवर दे देता हूँ। उन्हें उस मशीन को खोलने की, जोड़ने-तोड़ने की पूरी आज़ादी होती है। मैं समझता हूँ अपने हाथों और अनुभव से जो वो सीख सकते है, वह किताबों से कभी नहीं सीख सकते,” अजिंक्य शिक्षा-प्रणाली पर अपनी राय देते हुए कहते हैं।

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अजिंक्य के नाम एक ही दिन में अपने नाम पूरे चार पेटेंट्स करने का भी रिकॉर्ड है।

वे हँसते हुए इसके बारे में बताते हैं, “वैसे तो यह एक संयोग ही है। दरअसल, 2015 से लेकर 2018 तक मैं बिलकुल बेरोज़गार था। मैंने आविष्कार तो किये थे पर पेटेंट करवाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। 2016 में मुझे एक स्पोंसर मिले, जिन्होंने इसका खर्च उठाने की ज़िम्मेदारी ली। मैंने अपने बचे हुए चारों पेटेंट फाइल कर दिए और वे एक ही दिन में पास हो गए।“

अजिंक्य के नाम भारत में सबसे कम उम्र में सबसे अधिक पेटेंट्स अपने नाम करने का रिकॉर्ड है, जिसके लिए उनका नाम इंडिया बुक ऑफ़ रिकॉर्ड और लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड में दर्ज है।

हाल ही में उन्होंने बारिश के पानी को सीधा ज़मीन के भीतर पहुँचाकर, धरती के जल स्तर को बढ़ाने के लिए एक आविष्कार किया है, जो उनका 19वां पेटेंट होगा।

“मेरे ज़्यादातर आविष्कार आस-पास की समस्याओं से जुड़ी होती हैं। हमारे गाँव में शुरू से ही पानी की कमी रही है। हम बोरवेल कर-करके ज़मीन से पानी निकाल तो रहे हैं, लेकिन ज़मीन को वह पानी वापस नहीं कर रहे। इसलिए मैंने एक ऐसा यंत्र बनाया है, जो आपकी छत पर गिर रहे पानी को सीधे ज़मीन के भीतर पहुंचाएगा। क्या आप जानते हैं कि एक 1500 sq.ft की छत पर एक साल में करीब 3 लाख लीटर बारिश का पानी गिरता है? हमारे इस यंत्र से एक मिनट में करीब 70 लीटर पानी ज़मीन में वापस पहुँचाया जा सकता है,” अजिंक्य ने अपने रिसर्च के बारे में बात करते हुए बताया।

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अजिंक्य, जो सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कई खोज कर चुके हैं, आगे भी इस क्षेत्र में कुछ नया करना चाहते हैं। साथ ही वे ‘ज्ञान फाउंडेशन’ को हर गाँव हर शहर तक पहुंचाना चाहते है, जिसकी शुरुआत उन्होंने यवतमाल में एक नया सेंटर खोलकर कर दी है। उन्होंने अब इंजीनियरिंग के सिलेबस के लिए भी इस तरह का मॉडल बनाना शुरू कर दिया है और वे चाहते हैं कि शिक्षा की मुख्यधारा में किताबों के साथ-साथ इस मॉडल का भी समावेश हो।

छात्रों को सन्देश देते हुए वे कहते हैं, “हमारी शिक्षा प्रणाली की विडंबना यह है कि दसवीं के बाद हमें अपने पसंद का विषय चुनने को कहा जाता है पर दसवीं तक की पढ़ाई ही ऐसी नहीं होती कि हमें हमारी पसंद का पता चले। न ही हमें यह बताया जाता है कि किस कोर्स को चुनने से क्या काम करना होगा। मेरी सलाह यह है कि छात्र अपना विषय चुनने से पहले एक दूरदर्शी सोच रखे। आप जाईये और आगे आपको इस विषय से जो नौकरी मिलने वाली है उन नौकरियों को करने वाले लोगों से मिलिए। अगर आपको वह काम दिलचस्प लगता है, तभी वह विषय चुनिए।”

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अजिंक्य अभिभावकों से भी अपील करते हैं कि वे अपने बच्चों को उनकी प्रतिभा के हिसाब से अपना भविष्य चुनने की आज़ादी दें।

“माता-पिता छोटी-छोटी चीज़ों से अपने बच्चों की प्रतिभा को पहचान सकते हैं। उदाहरण के तौर पर एक खिलौने को ही ले लीजिये। किसी बच्चे को उस खिलौने के रंग में दिलचस्पी होगी, किसी को इस बात में कि वह चलती कैसे है, किसी को उसे सजाने में, तो कोई बच्चा शुरू से ही इस बात का हिसाब रखता है कि इस एक खिलौने के दाम में उसे कितने दूसरे छोटे खिलौने मिल सकते हैं। यह सब दर्शाते हैं कि उसे आर्ट पसंद है या विज्ञान, कॉमर्स अच्छा लगता है या डिजाइनिंग। बच्चे को वीडियो में चीज़े होता हुआ देखकर नहीं, बल्कि अपने हाथों से उस चीज़ को बनाकर देखने दीजिये, तभी वह उस काम को करने के सौ तरीकों के बारे में सोचेगा भी और करेगा भी,” अजिंक्य इस सन्देश के साथ विदा लेते हैं!


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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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