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3000 से भी ज़्यादा कारीगरों को रोज़गार देकर, ‘पश्मीना’ की विरासत को सहेज रहा है यह कश्मीरी युवक!

श्मीर को अपनी ख़ूबसूरत वादियों के साथ-साथ शिल्पकलाओं के लिए भी जाना जाता है। ऊन और रेशम के बने कालीन, घास की बनी टोकरी, कसीदा (ख़ास तरह की कश्मीरी कढ़ाई) आदि के अलावा कश्मीर की ‘पश्मीना’ विश्व-प्रसिद्द है।

पश्मीना या फिर कश्मीरी, बहुत ही महीन ऊन होती है, जिसे पारम्परिक रूप से काता जाता हैं और फिर बहुत ही कौशल के साथ बुनाई की जाती है। कश्मीरी और पश्मीना के मतलब एक ही हैं। हिमालयन क्षेत्रों की देसी भाषा में इसे ‘पश्मीना’ कहते हैं, और ‘कश्मीरी’ शब्द का इस्तेमाल ज़्यादातर यूरोप के देशों में होता है।

पश्मीना शब्द फ़ारसी भाषा के ‘पश्म’ से आया है, जिसका मतलब होता है कोई ऐसा फाइबर जिसे बुना जा सके। यह ख़ास ऊन, हिमालयन इलाकों में पायी जाने वाली एक विशेष प्रजाति की ‘कश्मीरी बकरी’ के बालों से बनती है। इन बालों को इकट्ठा करके, इन्हें बहुत ही महीन ऊन में तब्दील करने का सभी काम स्थानीय कारीगरों द्वारा हाथ से किया जाता है।

‘कापरा हिर्कुस’ प्रजाति की बकरी के बालों से पश्मीना ऊन बनती है

इस ऊन को कातने, बुनने और फिर इससे शॉल, स्कार्फ़ आदि बनाने का काम कश्मीरी कारीगरों द्वारा हाथ से बड़ी ही सफ़ाई से किया जाता है।

“सदियों से, ‘पश्मीना’ का उत्पादन कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है। यहाँ के स्थानीय कारीगरों के लिए यही उनके रोज़गार का ज़रिया है। पर आज इन स्थानीय कारीगरों की जगह भी मशीन (पावरलूम) ने ले ली है। इससे न सिर्फ़ कारीगरों से उनका काम छिन गया, पर हम हमारी असली पश्मीना संस्कृति को भी खो रहे हैं। इसलिए, मैंने सोचा कि कुछ किया जाए,” यह कहना है 29 वर्षीय जुनैद शाहदार का।

जुनैद शाहदार (फोटो साभार)

कश्मीर में श्रीनगर के रहने वाले जुनैद शाहदार एक व्यावसायिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके परिवार की टेक्सटाइल में कच्चे माल का बिज़नेस है और अपनी ग्रेजुएशन के दिनों से ही जुनैद भी बिज़नेस से जुड़े हुए हैं। हालांकि, कश्मीर यूनिवर्सिटी से अपनी एमबीए पूरी करने के बाद वे अपने पारिवारिक व्यवसाय से कुछ अलग करना चाहते थे।

“मैं कुछ अलग करना चाहता था, जिसमें मेरी सोच, मेरा आईडिया लगा हो। फिर एक दिन मैं अपने पापा के साथ उनके ऑफिस में था, जब कोई कारीगर उनसे मिलने आया। वह कारीगर काम न मिलने से बहुत परेशान थे। उस वक़्त मुझे लगा कि इन लोगों के लिए कुछ करने की ज़रूरत है। और इस तरह से ‘फंब फैशन’ स्टार्ट हुआ,” जुनैद ने कहा।

साल 2016 में जुनैद ने अपना ऑनलाइन स्टार्टअप, ‘फंब’ शुरू किया।

‘फंब’ एक ऑनलाइन स्टोर है, जहाँ से कोई भी ‘पश्मीना’ से बने उत्पाद खरीद सकता है

कच्ची ऊन (अनप्रोसेस्ड) को स्थानीय भाषा में ‘फंब’ कहते हैं, इसीलिए उन्होंने अपने स्टार्टअप का नाम ‘फंब’ रखा। फंब एक पश्मीना फैशन हाउस है, जहाँ से पश्मीना से बने कपड़े खरीद सकते हैं। यहाँ पश्मीना का पूरा काम हाथ के कारीगरों द्वारा किया जाता है।

जुनैद ने आगे बताया, “हमारा उद्देश्य लोगों तक असली और शुद्ध पश्मीना पहुँचाना है, जिसके लिए हम स्थानीय कारीगरों के साथ काम कर रहे हैं। इससे इन हाथ के कारीगरों को भी काम मिल रहा है और साथ ही, हमारी संस्कृति भी आगे बढ़ रही है।”

फंब के साथ आज कश्मीर के अलग-अलग इलाकों से लगभग 3, 000 कारीगर काम कर रहे हैं। कताई, बुनाई, कढ़ाई और फिर आख़िरी उत्पाद बनाना, ये सभी काम अलग-अलग कारीगर अपने घरों पर ही करते हैं।

जुनैद बताते हैं कि उनके प्रोडक्ट्स के लिए कच्चा माल यानी कि ऊन लद्दाख से आती है। इसे फिर कताई करने वाले कारीगरों के यहाँ पहुँचाया जाता है। एक बार महीन ऊन तैयार हो जाए, तो बुनकर इसकी बुनाई करते हैं। इसके बाद जो भी कपड़ा बनाना हो, जैसे कि शॉल, स्कार्फ़, मफ़लर आदि बनाया जाता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (पश्मीना वीविंग)

पश्मीना बनाना बिल्कुल भी आसान नहीं है। इसके लिए आपको बहुत ध्यान और सब्र से काम करना पड़ता है। हाथ का काम है, तो काफ़ी वक़्त भी लगता है। जिसकी वजह से कई बार जुनैद और उनकी टीम को मुश्किलें भी झेलनी पड़ती हैं। पर वे कभी भी अपने प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता पर समझौता नहीं करना चाहते हैं। उनका प्रयास है कि वे अपने हर एक ग्राहक को असली और बहुत ही उच्च गुणवत्ता वाली पश्मीना दें, ताकि लोगों को मशीन से बने और हाथ से बने पश्मीना के बीच का फर्क समझ आये।

बाज़ार की चुनौतियों के बारे में बात करते हुए जुनैद कहते हैं, “हमारा सबसे बड़ा प्रतिद्विंदी चीन है। क्योंकि वहाँ मशीन पर बना पश्मीना बहुत जल्दी बन जाता है और कम दाम का भी होता है। इसलिए जब भी कोई बड़ा ऑर्डर आता है और वक़्त कम होता है, तो वहाँ हम पावरलूम इंडस्ट्री का मुक़ाबला नहीं कर पाते हैं। ऐसा हुआ भी है कि हमें अमेरिका से ऑर्डर आया था, पर वक़्त की कमी के चलते हमें जाने देना पड़ा। क्योंकि फंब, पश्मीना की गुणवत्ता पर समझौता नहीं कर सकता।”

पर धीरे-धीरे जुनैद और उनकी टीम की कोशिशें रंग ला रही हैं और फंब फैशन हाउस बाज़ार में अपनी पहचान बना रहा है।

पिछले तीन सालों में जुनैद की पश्मीना की पहुँच भारत के साथ अमेरिका, दुबई, जर्मनी और मिडिल-ईस्ट देशों तक हो गयी है। इतना ही नहीं, आज श्रीनगर में उनका एक स्टोर भी है। और अब उनका सालाना टर्नओवर 2 करोड़ रूपये से भी ज़्यादा का है।

श्रीनगर में ‘फंब’ पश्मीना स्टोर और पश्मीना शॉल

जुनैद बताते हैं कि वे पश्मीना में ही नयी-नयी चीज़ों में इन्वेस्ट कर रहे हैं। हाल ही में, उन्होंने सूटिंग पर काम किया, पश्मीना के कोट, ब्लेज़र आदि बनाए। हालांकि, शुरू में उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली और घाटा भी हुआ। पर फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।

कुछ वक़्त बाद ही सही, पर लोगों का ध्यान उनके इस स्पेशल सेक्शन पर गया और अब यह अच्छा कर रहा है। फ़िलहाल, उनकी टीम महिलाओं के लिए पश्मीना से बने लहंगों के कलेक्शन पर भी काम कर रही है।

हालांकि, हर दिन उन्हें किसी न किसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ता है। “बहुत से पुराने कारीगरों को हम खोते जा रहे हैं। क्योंकि अपनी उम्र के चलते अब उनके लिए मुमकिन नहीं कि बहुत देर तक लगातार काम कर पायें। इसके अलावा, आज की पीढ़ी में बहुत ही कम ऐसे लोग हैं, जो हाथ का काम करना चाहते हैं, क्योंकि उनके लिए इंडस्ट्री ही नहीं है। इसलिए हमारा पूरा ध्यान अभी से इस बात पर है कि आगे के लिए कैसे तैयार रहा जाए,” जुनैद ने कहा।

जुनैद की टीम नयी-नयी चीज़ों में इन्वेस्ट कर रही है

आने वाले समय में माहिर कारीगरों की कमी रहेगी और इससे शुद्ध और असली पश्मीना की बाज़ार में आपूर्ति करना मुश्किल हो जायेगा। इसलिए, पश्मीना की विरासत को बनाए रखने के लिए आज के युवाओं को ही आगे आना होगा।

जुनैद की कोशिश है कि वे युवाओं के साथ-साथ घर सम्भालने वाली महिलाओं को भी इस काम से जोड़ें। इससे उनकी भी आमदनी होगी और साथ ही, पश्मीना और हाथ की कारीगरी भी बची रहेगी।

जुनैद का उद्देश्य फंब को वैश्विक स्तर पर आगे ले जाना है। वे चाहते हैं कि पूरे भारत में पश्मीना स्टोर हो और ऑनलाइन शॉप के जरिए, वे बाकी देशों में भी पश्मीना की मांग पूरी करें।

पश्मीना सिर्फ़ कश्मीर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की विरासत है। “अगर हम पावरलूम की बजाय अपने लोगों के हाथों से बनी पश्मीना पर खर्च करें, तो न सिर्फ़ इन लोगों के घर का चूल्हा जलता रहेगा, बल्कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था को भी फ़ायदा होगा।”

फंब फैशन हाउस की वेबसाइट पर जाने के लिए क्लिक करें!

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(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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