in , ,

अपने कश्मीर को दोबारा ‘जन्नत’ बनाना चाहती हैं, डल झील की सफ़ाई में लगी 6-साल की जन्नत!

गर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त; हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त !!

-‘गुल-ए-परेशान’ किताब से (पेज – 271)

(अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है, यही हैं)

कहते है 17वीं सदी में जब मुग़ल बादशाह जहाँगीर कश्मीर घूमने आये, तो उन्होंने इस जगह को धरती का स्वर्ग बताया था। पर कहाँ है वह धरती और कहाँ है वह जन्नत? कभी इस जन्नत की शान रही डल झील आज दम तोड़ने को है!

“डल हमारे लिए सब कुछ था, हम तो यहाँ का पानी पीते थे जी! और हम सब हाउस बोट वालों की जेबों में डॉलर होते थे डॉलर। पर फिर सब बदल गया।“

तारीक़ अहमद पाटलू आज भी उन दिनों की बातें करते नहीं थकते, जब कश्मीर देशी और विदेशी पर्यटकों से भरा होता था और उनकी मेहमान नवाज़ी करने को ही उनके जैसे हाउस बोट वाले अपना धर्म समझते थे।

कश्मीर के श्रीनगर में डल झील पर तारीक़ का पुश्तैनी हाउस बोट है। पीढ़ी दर पीढ़ी उनके परिवार ने यहीं एक काम किया था। धरती की जन्नत मानी जाने वाली इस जगह की सबसे ख़ूबसूरत झील पर ख़ूबसूरत सी हाउस बोट पर रहना किसी ख्व़ाब सा था और तारीक़ और उनका परिवार ऎसी ही ख्व़ाब जैसी ज़िंदगी जी रहा था। पर फिर 1986 में, जब तारिक़ नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके अब्बा का एक हादसे में इंतकाल हो गया।

परिवार में सबसे बड़े होने के नाते, एक छोटे भाई और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी तारीक़ के कंधों पर आ पड़ी। ऐसे में उन्होंने अपने भाई बहनों को पालने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी अपनी पढ़ाई छोड़ दी और इस छोटी सी उम्र में अपने हाउस बोट को चलाने की ज़िम्मेदारी अपने सर ले ली।

पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। 1989 के बाद कश्मीर में हालात इतने बिगड़े, कि हाउस बोट समुदाय के लोगों के लिए अपना पेट पालना तक मुश्किल हो गया।

photo source

“यकीन मानिए यहाँ का माहौल बाकी सब जगहों जैसा ही है। जिस तरह मुंबई में ब्लास्ट होता है, लेकिन फिर अगले दिन सब नार्मल हो जाता है, वैसे ही कश्मीर भी है। यहाँ पूरी सिक्यूरिटी है टूरिस्ट के लिए। पर इस बात को हम बाहर के लोगों तक कैसे पहुंचाते? बाहर के लोग यहाँ आने से डरने लगे थे, जिसका सीधा असर हम जैसे लोगों पर हो रहा था। घोड़े वाले, शिकारे वाले, दूकानदार, कारीगर…हम हाउस बोट वाले…हम सब के लिए अपने परिवार का पेट भरना मुश्किल हो गया था,” तारिक़ भावुक होते हुए कहते हैं।

ऐसे में तारीक़ और उन जैसे लोग दिल्ली जाकर कनोट प्लेस और साउथ एक्स जैसी जगहों पर बैठते और लोगों से कश्मीर आने की अपील करते। धीरे-धीरे तारीक़ ने दिल्ली में अपना एक छोटा सा ट्रेवल एजेंसी खोल लिया, जिसका मकसद पर्यटकों को दोबारा कश्मीर जाने के लिए प्रेरित करना था।

“मैं उनसे कहता कि उनकी सुरक्षा की, रहने की, सैर की… सारी ज़िम्मेदारी मेरी। बस मेरी एक ही दरख्वास्त होती कि वे एक बार कश्मीर ज़रूर जाएँ,” तारीक़ ने बताया।

 

यह भी पढ़े – इस सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल का दिन शुरू होता है शौचालय की सफाई से!

 

करीब 14 साल तक इस तरह कभी दिल्ली, तो कभी श्रीनगर आते-जाते हुए तारीक़ और उनके साथी पर्यटकों को कश्मीर तक लाने में सफ़ल हुए और 2003 में तारीक़ फिर एक बार हमेशा के लिए अपने डल झील के पास वापस आ गए।

पर डल अब वैसा नहीं रह गया था, जैसा वो इसे छोड़ गए थे।

डल झील की वर्तमान परिस्थिति (फोटो साभार – तारीक़ माटलू)

“जिस डल की ख़ूबसूरती के चर्चे विदेश तक थे, जिस डल का हम पानी पीते थे, आज उसमें नहाने को भी जी नहीं करता था,” तारीक़ ने बताया।

 

यह भी पढ़े – स्वच्छता का वादा और औरतों का साम्मान करने पर मुफ्त सवारी करवाता है नोयडा का यह ऑटोचालक!

 

ऐसे में उन्हें अपने एक अंग्रेज़ पर्यटक की बात याद आई…

“मैं एक बार एक अंग्रेज़ पर्यटक को डल में शिकारे पर घुमा रहा था। मैंने देखा कि सिगरेट पीने के बाद उसने उसे बुझाकर एक कागज़ में लपेटकर अपनी जेब में रख लिया। जब मैंने उससे ऐसा करने की वजह पूछी, तो उसने कहा कि अगर वो इस सिगरेट को डल में फेंकता तो डल का पानी ज़हर बन जाता।“

Promotion

इसी वाकये को याद करते हुए तारीक़ ने फ़ैसला किया कि अब वो खुद डल को साफ़ करेंगे। उन्हें जब भी समय मिलता, वो अपने शिकारे पर निकल जाते और डल झील से प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और बाकी कचरा निकालते।

समय बीता और तारीक़ की बेटी, जन्नत पाँच साल की हो गयी। अपने बाबा को डल की सफ़ाई में लगा देख, जन्नत ऐसे कई सवाल करती, जिनका जवाब ढूंढते हुए तारीक़ का इसे दुबारा ख़ूबसूरत बनाने का जूनून और बढ़ जाता।

जन्नत ने एक बार अपने पिता से पुछा कि, “बाबा डल को कौन गंदा करता है? ये इतना गंदा कैसे हो गया? आप तो कहते थे डल बिलकुल साफ़ था।“

इस बात का जवाब ढूंढने के लिए तारीक़ इस बात की तह तक गए और उन्होंने इसके पीछे तीन कारण पाए।

  1. पूरे श्रीनगर में व्यवस्थित ड्रेनेज सिस्टम का न होना
  2. डल के चारों ओर इमारतों, रास्तों और आबादी का बढ़ना
  3. एसटीपी याने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का ठीक से काम न करना

ऊपर दी गयी सारी जानकारी तारीक़ की डिटेल रिपोर्ट में मौजूद है, जिसे उन्होंने आरटीआइ के ज़रिये जानकारी हासिल करके बनाया है।

“डल झील तक कुल 19 नालियाँ आती हैं। उन सभी से आते हुए प्लास्टिक का कचरा यहाँ आकर जमा हो जाता है, पर चारों ओर से बंद हो जाने की वजह से इन्हें निकलने का रास्ता नहीं मिल पाता। पानी का बहाव भी ठीक से न होने की वजह से इसमें काई जमती जाती है,” तारीक़ बताते हैं।

तारीक़ के इस जूनून को जन्नत तक पहुँचने में भी वक़्त नहीं लगा और उसने भी अपने हाथों में जाल उठाये डल को साफ़ करना शुरू कर दिया।

डल को साफ़ करती जन्नत

“मेरा एक ही ख्व़ाब है कि मैं अपने डल को एक दिन साफ़ देख सकूँ। मेरा बाबा मुझे बताता है कि ये इंशा अल्लाह एक दिन ज़रूर होगा,” अपनी मीठी सी आवाज़ में जन्नत हमें बताती है।

खेलने कूदने की उम्र में ये बच्ची हर रविवार को अपने बाबा और दूसरे साथियों के साथ शिकारे पर डल की सफ़ाई करने निकल पड़ती है। पर उसका कहना है कि वह सन्डे का इसीलिए इंतज़ार करती है, ताकि वह अपने इस मिशन पर जा सके और उसे इसमें बड़ा मज़ा आता है।

“पिछले दिनों जब हम रैनावारी की तरफ सफ़ाई करने गए, तो वहां इतनी गन्दगी और बदबू थी कि जन्नत को उल्टियाँ होने लगी। ऐसे में हमने उसकी सेहत का ध्यान रखते हुए उसे यहाँ आने से मना कर दिया। बड़ी मुश्किल हुई उसे इस बात के लिए मनाने में,” तारीक़ ने बताया।

 

यह भी पढ़े – पुणे: आदिवासी महिलाओं को पुराने कपड़ों से पैड बनाने की ट्रेनिंग दे रहा है यह युवक!

 

जन्नत बड़ी होकर एक वैज्ञानिक बनना चाहती है, क्यूंकि उसका मानना है,

“साइंटिस्ट बनने से चाँद पर भी तो जा सकते है ना? और डल को साफ़ करने के लिए मशीनों की भी तो कमी है। मैं साइंटिस्ट बन जाऊँगी, तो उन मशीनों को बनाउंगी, जो मेरे डल को हमेशा साफ़ रखे।“

इतनी छोटी सी बच्ची को इस नेक काम में लगा देख और भी लोग इनके साथ जुड़ने लगे।

तारीक़ ने अब फेसबुक पर ‘मिशन डल लेक’ नामक एक पेज की भी शुरुआत की हैं, जहाँ वो लोगों से मदद की अपील करते हैं।

अगर आप जन्नत और उनके बाबा की डल को बचाने में मदद करना चाहते हैं, तो उनके इस पेज से ज़रूर जुड़े। यदि आप श्रीनगर में रहते हैं तो उनकी इस मुहिम में शामिल भी हो सकते हैं।

“मैं और मेरा बाबा अकेले पूरे डल को साफ़ नहीं कर सकते। डल के हवाले से मेरी सब लोगों से अपील है कि सब हमारी मदद करें। मैं डल की जन्नत हूँ… मेरे इस डल को भी जन्नत बना दो। यहाँ बहुत सारे डस्टबिन लगे है, आप सबसे कहें कि कचरा डस्टबिन में डालें,” जाते-जाते मासूम जन्नत हमसे ये अपील कर जाती है!


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

Promotion

देश में हो रही हर अच्छी ख़बर को द बेटर इंडिया आप तक पहुँचाना चाहता है। सकारात्मक पत्रकारिता के ज़रिए हम भारत को बेहतर बनाना चाहते हैं, जो आपके साथ के बिना मुमकिन नहीं है। यदि आप द बेटर इंडिया पर छपी इन अच्छी ख़बरों को पढ़ते हैं, पसंद करते हैं और इन्हें पढ़कर अपने देश पर गर्व महसूस करते हैं, तो इस मुहिम को आगे बढ़ाने में हमारा साथ दें। नीचे दिए बटन पर क्लिक करें -

₹   999 ₹   2999

Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

अनार की आधुनिक खेती कर बदली लोगों की सोच, पद्म श्री विजेता है गुजरात का यह दिव्यांग किसान!

बदलाव : कभी भीख मांगकर करते थे गुज़ारा, आज साथ मिलकर किया गोमती नदी को 1 टन कचरे से मुक्त!