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बदलाव : कभी भीख मांगकर करते थे गुज़ारा, आज साथ मिलकर किया गोमती नदी को 1 टन कचरे से मुक्त!

10 फरवरी 2019, रविवार की सुबह, स्वयंसेवकों के एक समूह ने उत्तर-प्रदेश के लखनऊ में गोमती नदी के घाट की साफ़-सफाई की और वहाँ जमा हुए प्लास्टिक के ढेर को हटाया।

हालांकि, इस तरह से सफाई की पहल कोई नई बात नहीं है, क्योंकि लगभग हर शहर में सामाजिक रूप से जागरूक नागरिक समूह यह कर रहा है। पर यह अभियान बाकी सबसे अलग था, क्योंकि ये 17 स्वयंसेवक, जिन्होंने यहाँ घाटों से प्लास्टिक के कचरे को साफ किया, वे कभी भिखारी हुआ करते थे।

तीन घंटे से भी कम समय में, उन्होंने नदी के दो घाटों को साफ कर दिया और फावड़े, झाडू आदि का इस्तेमाल करके एक टन कचरा निकाला, जिसे इस सप्ताह में लखनऊ नगर निगम द्वारा इकट्ठा कर लिया जाएगा।

इस अनूठी पहल का नेतृत्व शरद पटेल ने किया, जो लखनऊ में एक एनजीओ ‘बदलाव’ के संस्थापक हैं। बदलाव का उद्देश्य भीख मांगने की सामाजिक बुराई को समाप्त कर, इन लोगों के लिए पुनर्वास और रोजगार के अवसरों की दिशा में काम करना है।

शरद पटेल

ये सभी स्वयंसेवक ऐसे लोग हैं, जो कभी अथाह गरीबी का शिकार थे और शरद के उनकी ज़िंदगी में आने से पहले भीख मांगकर अपना गुज़ारा कर रहे थे।

शरद ने अपना ‘भिक्षावृत्ति मुक्ति अभियान,’ साल 2014 में शुरू किया। उनका उद्देश्य है कि ये सभी लोग भीख मांगना छोड़कर अपने पैरों पर खड़े हों, ताकि ये भी सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करें।

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हालांकि, शरद के लिए इन लोगों को भीख मांगना छोड़कर, कोई रोज़गार करने के लिए मनाना आसान नहीं रहा। उन्होंने इन लोगों को काम दिलवाने में मदद की और उन्हें बहुत-सी संस्थाओ से जोड़ा। इससे इन लोगों को किसी की दया पर निर्भर होने की ज़रूरत नहीं, बल्कि ये सब स्वाभिमान से जी सकते हैं।

भिक्षावृत्ति मुक्ति अभियान

शरद बताते हैं कि कई लोग अब जगह-जगह जाकर ‘लेमन टी’ बेचते हैं, किसी ने स्ट्रीट फ़ूड के स्टॉल लगाना शुरू किया है, तो कई लोग रिक्शा आदि चला रहे हैं। उनकी कोशिश यही है कि इन सबको ऐसे किसी काम से जोड़ा जाए, जिसमें लगभग 10, 000 रूपये प्रति माह ये लोग कमा सकें। क्योंकि आज के जमाने में एक इंसान के लिए अपने महीने भर का खर्च चलाना बहुत मुश्किल है।

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“जब मैंने इन लोगों को नौकरी दिलवाने में मदद की, तब ये सभी लोग बेघर थे। इनके पास कोई साधन नहीं था, जहाँ ये अपनी कमाई से बचत कर सकें। कई बार फूटपाथ पर सोते हुए, इनके पैसे चोरी हो जाते थे। ऐसे में, इन सब लोगों को अपने पैरों में खड़ा करने की हमारी सभी कोशिशें व्यर्थ जा रही थीं और इसलिए, मैंने इनके लिए एक आश्रय-घर खोलने का फ़ैसला किया,” शरद ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया।

क्राउडफंडिंग के ज़रिए, उन्होंने इन लोगों के लिए एक अस्थायी आश्रय-घर शुरू किया और यहाँ पर लगभग 20 लोग आराम से रह सकते हैं। फ़िलहाल, यहाँ 18 लोग रहते हैं और इनमें से एक दृष्टिहीन भी है।

उनका मुख्य ध्यान इन लोगों का हृदय परिवर्तन कर, उनमें व्यवहारिक बदलाव लाना है। जो लोग सालों से भीख मांगकर अपना गुज़ारा कर रहे हैं, उनके लिए आसान नहीं है कि वे अचानक से अपनी आदतें बदल दें। भिक्षावृत्ति के साथ-साथ इन सभी को अन्य सामाजिक बुराइयों से भी निकलना है, जैसे कि नशा करना, स्वच्छता से न रहना और सबसे बड़ी बात, इन्हें ये समझाना कि इनकी समाज के प्रति भी कुछ ज़िम्मेदारियाँ हैं।

“हमने इन लोगों के पूरे दिन की गतिविधियों की एक योजना बनाई हुई है। सुबह उठकर योग, व्यायाम आदि करवाना, फिर अच्छे से नहा-धोकर, अपने-अपने काम के लिए निकल जाना और साथ ही, अन्य कुछ बातें, जैसे कि साफ़-सफ़ाई का महत्व, शिक्षा का महत्व, श्रमदान करना और अपने आस-पास की चीज़ों के प्रति जागरूक रहना आदि, इन सब पर भी चर्चा होती है, शरद ने बताया।

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चौपाल के दौरान विचार-विमर्श करते हुए

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यहाँ तक पहुंचने के लिए शरद ने बहुत-सी मुश्किलों का सामना किया। लेकिन अब उनके प्रयास सफल होने लगे हैं। शरद ने बहुत ही उत्साह के साथ द बेटर इंडिया को बताया,

“हमारे एक साथी हैं नरेन देव यादव, जिन्हें सालों पहले कोढ़ की बीमारी के चलते उनके घर वालों ने ही दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया था। तब से वे भिक्षावृत्ति से अपना गुज़ारा कर रहे थे। जब हमारी उनसे मुलाक़ात हुई, तो उन्होंने हमसे कहा कि हम भले ही उन्हें पुनर्वासित कर दें, लेकिन वे भिक्षा मांगना नहीं छोड़ेंगें, क्योंकि यही उनकी किस्मत में लिखा है।”

नरेन अपने परिवार के रवैये के कारण ज़िंदगी से बिल्कुल हताश थे। पर धीरे-धीरे शरद और उनकी टीम के प्रयासों के चलते उनका आत्म-विश्वास बढ़ा। और आज वे अपने दम पर अपनी ज़िंदगी बीता रहे हैं। इतना ही नहीं, वे शरद के हर अभियान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। साथ ही, सेंटर पर और जहाँ भी उन्हें मौका मिले, वहाँ श्रमदान करते हैं।

फोटो साभार: शरद पटेल

इन सभी लोगों में बहुत से लोग अनपढ़ हैं और इन सबके लिए शरद की टीम अलग से कक्षाएँ लगाती हैं। शिक्षा के जैसे ही समाज के अन्य मुद्दों के प्रति भी ये सभी लोग जागरूक हो रहे हैं। हर रविवार को शरद एक चौपाल का आयोजन करते हैं, जहाँ ये लोग बैठकर विचार-विमर्श कर, ऐसे मुद्दों को बताते हैं जिन पर ये लोग काम करना चाहेंगें। इन मुद्दों में नशा-मुक्ति के लिए जागरूकता, स्वच्छता के प्रति जागरूकता आदि शामिल है और साथ ही, अब ये लोग समझने लगे हैं कि भिक्षावृत्ति भी एक सामाजिक मुद्दा है।

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गोमती नदी के घाटों को साफ़ करने का कदम, शरद की इस बड़ी पहल का हिस्सा है। इसके माध्यम से, वे न केवल इन पुनर्वासित लोगों के जीवन में बदलाव लाना चाहते हैं, बल्कि वे पूरे समाज में परिवर्तन चाहते हैं। शरद का कहना है कि इन लोगों को सिर्फ़ आश्रय या रोज़गार देना उनका लक्ष्य नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि देश के नागरिक होने के नाते वे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ भी समझें।

हर रविवार को ये सभी लोग, शहर भर में स्वच्छता अभियान पर काम कर रहे हैं। साल 2019 की बसंत पंचमी से शुरू हुई इस नेक पहल का पहला चरण होलिका दहन के दिन तक चलेगा।

फोटो साभार: शरद पटेल

हालांकि, बहुत बार फंड्स की कमी के चलते, शरद और उनकी टीम को परेशानियाँ झेलनी पड़ती है। शरद कहते हैं, “हम अपनी तरफ से जितना कर सकते हैं, करने की कोशिश करते हैं। हमारी कोशिश यही है कि पैसे की कमी के कारण हमारी कोई भी पहल रुक न जाए। अभी हमने इन लोगों के लिए जो अस्थायी आसरा बनाया है, उसका पूरा सामान हमें दिल्ली की ‘गूँज संस्था’ ने स्पोंसर किया है। पर हमारा उद्देश्य इन लोगों के लिए एक स्थायी आश्रय घर बनाना है।”

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यक़ीनन, शरद पटेल की यह पहल काबिल-ए-तारीफ़ है। ऐसे अभियान को यदि पूरे देश में फैलाया जाए, तो शायद एक दिन भारत को भिक्षावृत्ति के दलदल से बाहर निकाला जा सकता है। लेकिन इसके लिए शरद पटेल जैसे और भी लोगों को साहस करके आगे आना होगा।

यदि आप शरद पटेल की इस पहल के बारे में अधिक जानना चाहते हैं या फिर उनके अभियान से जुड़ना चाहते हैं, तो 9506533722 या फिर 7522002401 पर डायल करें।

और यदि आप इन लोगों के लिए किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद करना चाहते हैं, तो यहाँ क्लिक करें!

(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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