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चाय की जैविक खेती से हर साल 60-70 लाख रूपये कमा रहा है असम का यह किसान!

“अगर हम प्रकृति का सम्मान करेंगे, तो प्रकृति हमारा सम्मान करेगी। यह बहुत सरल बात है।”

ह कहना है तेनज़िंग बोडोसा का। असम के उदलगुरी जिले के कचिबारी गाँव में बोडोलैंड क्षेत्र में तेनज़िंग के दो खेत हैं, जो हर तरीके से जीव-जन्तु, ख़ासकर कि हाथियों के लिए अनुकूल हैं। ये विश्व के ऐसे पहले ऐसे खेत हैं, जहाँ हाथी न सिर्फ़ आराम से घूम-फिर सकते हैं, बल्कि उन्हें यहाँ खाना भी मिलता है।

हालांकि, एक समय ऐसा भी था, जब तेनज़िंग अपने पिता और दादा की तरह किसान नहीं बनना चाहते थे।

तेनज़िंग बोडोसा

तेनज़िंग को छठी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। दरअसल, उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी पुश्तैनी 2 एकड़ ज़मीन की सारी ज़िम्मेदारी उनकी माँ पर आ गयी। ऐसे में, अपनी माँ की मदद करने के लिए, 10 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने घर छोड़ दिया और काम करना शुरू कर दिया। शुरुआत के कुछ सालों तक, उन्होंने छोटे-मोटे काम किये और उसके बाद मलेशिया की एक कम्पनी में काम करने लगे। वहाँ उन्होंने गाड़ी चलाना, मशीन ठीक करना, इंटरनेट पर काम करना और साथ ही, अच्छे से अंग्रेज़ी बोलना भी सीखा।

“उन 13 सालों में मैंने बहुत कुछ सीखा– गाड़ी चलाना, मैकेनिक का काम, मशीन को संभालना और छोटी-मोटी फैक्ट्री लगाना। इस सब से मुझे हर तरह के काम को करने का आत्मविश्वास मिला,” तेनज़िंग ने द बेटर इंडिया के साथ बात करते हुए कहा।

पर उनकी माँ चाहती थीं कि वे घर वापिस आकर खेती संभाल लें। आख़िरकार, 12 दिसम्बर 2006 को तेनज़िंग असम में अपने घर लौट आये।

अपने चाय के फार्म में तेनज़िंग

उनका परिवार पहले धान की खेती करने के साथ-साथ सब्ज़ियाँ भी उगाता था, पर जब तेनज़िंग वापिस लौटे, तब असम में हर कोई चाय की खेती कर रहा था। ऐसे में उन्होंने अलग-अलग चाय के बागानों के दौरे किये। यहाँ से उन्हें पता चला कि चाय का निर्यात आसानी से किया जा सकता है। साथ ही, बहुत-सी कंपनियां चाय खरीदती हैं, जिससे इसकी मार्केटिंग करना भी आसान है। इसलिए उन्होंने भी चाय की खेती करने का फ़ैसला किया। लेकिन उनके परिवार ने कभी भी चाय की खेती नहीं की थी और उन्हें इसके बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं थी। इसके लिए उन्होंने अपने दोस्तों की मदद ली।

पर जितने भी जानकारों से वे मिले, ज्यादातर ने उन्हें खेती के लिए जीन-रूपांतरित (जेनेटिकली मॉडिफाइड) बीज खरीदने के साथ रासायनिक उर्वरक व कीटनाशकों के प्रयोग की सलाह दी। उन सबके अनुसार, कम समय में अच्छी उपज लेने का यह सबसे बढ़िया तरीका था। इस क्षेत्र में ज्यादा जानकारी न होने के कारण तेनज़िंग उनके निर्देश मानने लगे।

पर वे जब भी अपने खेतों में कीटनाशको का छिड़काव करते, तो उन्हें सिर में दर्द होने लगता और साथ ही, उन्हें उल्टी भी आने लगती थी। उनकी माँ को भी रासायनिक उर्वरक इस्तेमाल करने की योजना पसंद नहीं आई, क्योंकि उन्होंने पहले कभी भी ऐसे खेती नहीं की थी।

तेनज़िंग बताते हैं, “मेरे दादाजी, पिताजी या माँ , किसी ने भी कभी भी खेती में रसायनों का प्रयोग नहीं किया था। हम हमेशा गौ-मूत्र या गोबर से बनी खाद का प्रयोग करते थे। मैंने देखा कि हमारे तालाब की मछलियाँ भी मरने लगीं। ये कीटनाशक ज़हर के अलावा और कुछ नहीं हैं। हर कोई अपने दिन की शुरुआत चाय से करता है और मैं उन्हें ज़हर नहीं दे सकता था।”

उन्होंने इसके लिए विकल्प तलाशना शुरू किया। हालांकि, सभी ने उनसे कहा कि चाय की जैविक खेती नहीं की जा सकती है। पर तेनज़िंग ने इंटरनेट पर रिसर्च की और तब उन्हें बंगलुरु के डोड्डाबल्लापुर निवासी डॉ. एल. नारायण रेड्डी के बारे में पता चला, जो कि जैविक खेती कर रहे थे। तेनज़िंग ने उनके पास जाकर जैविक खेती सीखी। उन्होंने इसके आलावा भी कई और प्रशिक्षण लिए, पर वे इस ट्रेनिंग से संतुष्ट नहीं हुए। आख़िरकार 2007 में, उनका संपर्क कनाडा के एक एनजीओ ‘फर्टाइल ग्राउंड’ से हुआ और उन्हें तेनज़िंग ने अपने यहाँ बुलाया। वहाँ से विशेषज्ञों ने आकर उन्हें उनके अपने खेतों में ट्रेनिंग दी।

इसके बाद, तेनज़िंग ने साल 2007 में चाय की जैविक खेती शुरू की। हालांकि, शुरुआत में उन्हें कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पर धीरे- धीरे चाय की पत्तियों की गुणवत्ता और उपज बढ़ती गयी।

चाय की खेती करने वाले लगभग 12,000 किसानों में से तेनज़िंग अकेले ऐसे किसान थे, जो कि जैविक खेती कर रहे थे।

तेनज़िंग के फार्म की चाय

पर अब अपनी इस जैविक चाय का प्रचार, उनके लिए एक नयी चुनौती था। उस समय उन्होंने अपनी खुद की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का फ़ैसला किया, जहाँ चाय की प्रोसेसिंग से लेकर पैकिंग का काम तक उन्होंने खुद करना शुरू किया। उन्होंने बताया,

“मैंने एक छोटा-सा प्रोसेसिंग यूनिट लगाया और अपनी चाय को एक चाय कंपनी की मदद से कनाडा, जर्मनी, अमेरिका और युके भेजने लगा। एक ग्लोबल मार्किट ढूँढना मेरे लिए बहुत मुश्किल काम था। हर चीज़ एक बड़ी चुनौती थी।”

आज तेनज़िंग के पास अपनी 25 एकड़ ज़मीन है, जिसमें से 7.5 एकड़ पर वे चाय की खेती करते हैं और बाकी में, विभिन्न प्रकार के फल और सब्ज़ियाँ उगाते हैं। साथ ही, वे धान की खेती भी करते हैं। सिर्फ़ चाय की खेती से ही इनकी 60 से 70 लाख रुपये की सालाना कमाई हो जाती है।

इनके खेत का सबसे आकर्षक हिस्सा मध्यवर्ती क्षेत्र (बफर ज़ोन) है, जो इनके खेतों के लगभग आख़िरी छोर पर है और यहाँ से भूटान की सीमा पर जंगल की शुरुआत होती है। उस हिस्से को तेनज़िंग ने वैसा का वैसा ही छोड़ दिया है। न तो वहाँ के जंगल काटे हैं और न ही उन्हें जलाया है। बल्कि वहाँ उन्होंने बांस के पेड़ लगाये हैं, ताकि जंगली हाथी अपनी भूख मिटा सकें। इस खेत के आस-पास कोई बाड़ भी नहीं लगाई गयी है, जिससे कोई भी जंगली जानवर खेत के इस हिस्से में आराम से घूम सकते हैं।

कभी- कभी, आपको यहाँ कम से कम 70-80 हाथी एक साथ देखने को मिल सकते हैं। हॉर्नबिल, जंगली सुअर, हिरण, मोर और बहुत-से पक्षी यहाँ आमतौर पर देखे जा सकते हैं।

तेनज़िंग का कहना है, “आप हर एक फसल की जैविक खेती कर सकते हैं और साथ ही पर्यावरण में संतुलन बनाये रख सकते है। जब हम पर्यावरण में संतुलन बनाए रखेंगे, तभी अधिक से अधिक जानवर और पक्षियों को भी देख सकते हैं।”

तेनज़िंग के अनुसार, चाय बेचने वाली कंपनियाँ किसानों को अपने खेतों में सिर्फ़ चाय की ही खेती करने के लिए गुमराह करती हैं। लेकिन भारत का जलवायु ऐसा है कि यहाँ आप सेब से ले कर स्ट्रॉबेरी, और चाय से लेकर चावल तक, कुछ भी उगा सकते हैं। पर फिर भी यहाँ के किसान अलग-अलग फसल नहीं उगाते। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि जब हम फसल के लिए रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, तो फिर उसी खेत में खाने वाले फलों की खेती करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा मिट्टी भी धीरे-धीरे कम उपजाऊ होने लगती है, क्योंकि बहुत-से जरूरी सुक्ष्म जीव कीटनाशकों के प्रयोग से मरने लगते हैं।

पर अगर किसान जैविक खेती करें, तो वे सारे मौसमी फल, सब्जी और धान तक उसी खेत में उगा सकते हैं, जहाँ चाय की खेती हो रही है। इससे किसानों में आत्मनिर्भरता बढ़ती है। साथ ही, अपने लिए भोजन उगाने से यह तय होता है कि हर किसी को पर्याप्त भोजन मिले। इससे किसानों को अपनी उपज ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े के लिए निर्यात करने का मौका भी मिलता है।

तेनज़िंग का मानना है कि शहरों में रहने वाले लोगों को भी खेती के बारे में जानकारी होनी चाहिए और उन्हें अपने घर में और छतों पर जितना हो सके उतनी साग़-सब्ज़ियाँ उगानी चाहियें। इससे देश में भूखमरी की समस्या भी सुलझेगी और किसानों को निर्यात क्षेत्र में जाने का अवसर मिलेगा। और अगर सब जगह जैविक खेती की जाए, तो हमारा पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

तेनज़िंग ने आगे कहा, “जब मैंने जैविक खेती करना शुरू किया था, तो इससे मेरे खेतों का पर्यावरण भी सुधर गया और अब हाथियों को भी यहाँ रहना अच्छा लगता है। हाँ, ये जानवर कभी-कभी मेरे चाय के पौधों और घर को नुकसान पहुँचा जाते हैं, पर इससे कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। उन्हें भी तो जिंदा रहना है और मैं उनके लिए भी खेती कर रहा हूँ। मैं इतना स्वार्थी क्यों बनूँ कि सिर्फ़ अपने लिए ही खेती करूँ?”

तेनज़िंग की सफलता ने बहुत-से लोगों को प्रेरित किया है। नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश से भी किसान उनके खेतों में जैविक खेती के गुर सीखने आते हैं। अब तक उन्होंने करीब 30,000 किसानों को प्रशिक्षित किया है।

जो भी किसान जैविक खेती करना चाहते हैं, तेनज़िंग उन्हें सलाह देते हैं कि खेती के लिए वे कुछ भी बाज़ार से न खरीदें। बल्कि वे ‘1 परिवार, 1 एकड़ और 1 गाय’ फ़ॉर्मूला का सुझाव देते हैं। जिसका मतलब है कि गाय के गौ-मूत्र तथा गोबर से बनी खाद, एक एकड़ की ज़मीन में जैविक खेती करने के लिए काफ़ी है और यह उपज एक परिवार के लिए पर्याप्त है।

हालांकि, तेनज़िंग के खेत असम और उसके आस-पास के क्षेत्रो में मशहूर है, पर उनकी कहानी दो साल पहले दुनिया के सामने आई, जब उनके खेत में हाथियों की लड़ाई में एक हाथी की मौत हो गयी थी। इस घटना से तेनज़िंग बहुत आहत हुए और उन्होंने इस संदर्भ में वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फण्ड (WWF) को लिखा और तब तक लिखते रहे, जब तक कि वे उनके गाँव में मदद के लिए आ नहीं गए। 2 साल की मेहनत के बाद डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की टीम उनके खेत देखने के लिए आई। उनके खेतों में हाथियों को बिना किसी डर के बेख़ौफ़ घूमते देख कर वे काफ़ी प्रभावित हुए। उसी समय तेनज़िंग के दोनों खेतों को विश्व के सबसे पहले हाथियों के अनुकूल खेतों के रूप में प्रमाणित किया गया।

हर साल करीब 100 पर्यटक, विश्व के अलग अलग हिस्सों, जैसे जापान, चीन, यु.के, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी से, तेनज़िंग के खेतों को देखने आते हैं ।

इनमें से कुछ चाय के ग्राहक होते हैं, तो कुछ जैविक खेती के बारे में जानने और सीखने आते हैं, और कुछ उनके खेतों में जंगली हाथी देखने आते हैं। साथ ही कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो स्वयंसेवा करने आते हैं। बहुत से मेहमान 2 महीने से ज्यादा भी रुक जाते हैं और तेनज़िंग को उनका आदर-सत्कार करना अच्छा लगता है।

आख़िर में तेनज़िंग कहते हैं, “मुझे जंगल पसंद है, क्योंकि मैं गाँव में बड़ा हुआ हूँ। मुझे हर एक पेड़ से प्यार है। मैं जंगल के हर सूक्ष्मजीव, हर जंतु, हर जानवर की इज्ज़त करता हूँ। मुझे उनके साथ आगे बढ़ना पसंद है और मैं अपनी इसी ज़िन्दगी में खुश हूँ।”

तेनज़िंग बोडोसा से आप tenzingb86@yahoo.in पर संपर्क कर सकते हैं।

मूल लेख: मनाबी कटोच
संपादन: निशा डागर


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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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