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95 साल के एक किसान की सालों की मेहनत और ‘द बेटर इंडिया’ पर एक कहानी ने उन्हें दिलाया पद्म श्री!

“मेरे पिता कभी भी गाजर की खेती करने के लिए तैयार नहीं हुए। लेकिन मुझे यह करना था- और कुछ समय के लिए सब कुछ बहुत अच्छा रहा। हम अपनी गाजरों के लिए इलाके में मशहूर थे। पर कुछ पारिवारिक मतभेदों के कारण मुझे मेरे पिता से अलग होना पड़ा और मेरे हाथ में कुछ भी नहीं बचा।

कुछ समय के लिए, मैंने और मेरी पत्नी ने दूसरों के खेतों में मजदूरी की, ताकि हम अपने सात बच्चों का पेट भर सकें। जल्द ही, मेरी कड़ी मेहनत को देखते हुए, एक खेत के मालिक ने मुझे गाजर उगाने के लिए अपनी छह एकड़ ज़मीन लीज़ पर देने का प्रस्ताव रखा और कहा कि जब भी मुझसे हो पाए तब मैं उसे पैसे दे दूँ।

मैंने कड़ी मेहनत की, अपनी फसल उगाई और कुछ ही सालों में, गाजर की खेती से मुझे काफ़ी मुनाफ़ा हुआ। मैंने अपनी खुद की 40 एकड़ ज़मीन खरीदी। समय के साथ, मेरी बेटियों की शादी हो गयी, बड़े बेटे को नौकरी मिल गयी और मेरा छोटा बेटा, अरविन्द हमारी गाजर की खेती संभालने लगा। मेरे लिए यह एक खुशहाल बुढ़ापा था।

पर फिर, अरविन्द जब 20 साल का था, तो उसका एक्सीडेंट हो गया और उसके कुल्हे की हड्डी टूट गयी। मैं तब तक काफ़ी बूढ़ा हो चूका था और पूरे खेत की देखभाल नहीं कर सकता था। हर बीतते दिन के साथ हालात खराब होने लगे। इसलिए, बहुत दुखी मन से, मैंने अपनी दिन-रात की मेहनत से कमाई 10 एकड़ ज़मीन बेच दी।

लेकिन इस सबके बावजूद, मैंने गाजर उगाने के साथ-साथ गाजर के बीज़ और अलग-अलग किस्में विकसित करना नहीं छोड़ा। और इसी तरह मैंने ‘मधुवन गाजर’ बनाई और यहाँ तक पहुँचा।

इस पूरे समय में, मुझे कई बार ‘गुजरात के पहले गाजर किसान’ के तौर पर सम्मानित किया गया। पर मेरे बारे में बहुत कम लोग जानते थे। फिर जुलाई 2017 में एक दिन, मानबी कटोच नाम की किसी पत्रकार ने मेरे बारे में पूछने के लिए अरविन्द को फ़ोन किया। वो लगभग 2 घंटे तक मुझसे सवाल पूछती रही और अरविन्द ने हम दोनों के लिए अनुवादक का काम किया। कुछ दिनों के बाद, मेरी कहानी ‘द बेटर इंडिया’ पर आई! यह मुझ पर बनी कोई फ़िल्म देखने जैसा था।

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जैसे ही कहानी प्रकाशित हुई, मुझे कॉल पर कॉल आना शुरू हो गये। उनमें से एक फ़ोन दिल्ली के एक बड़े होटल और खेत के मालिक का आया। वे खुद हमारे खेत पर आये और हमारे गाजर के बीज खरीदे। फिर जब वह दिल्ली वापिस गए, तो उन्होंने हमारे दिल्ली आने के लिए हवाई-जहाज की दो टिकटें भेजीं। मैं तो पहले कभी टैक्सी में भी नहीं बैठा था – हवाई जहाज में बैठना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।

इसके बाद कई राज्यों से ऑर्डर आने शुरू हो गए और अब हम भारत के आठ अलग-अलग राज्यों में अपने गाजर और बीजों की सप्लाई करते हैं।

कल रात, 8:30 बजे, अरविंद को केंद्रीय मंत्रालय से फोन आया। उन्होंने कहा कि मुझे ‘पद्म श्री’ के लिए नामित किया गया था। पहले तो हमें विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन फिर मीडिया से फ़ोन आने लगे। उनमें से कुछ तो अभी भी यहीं हैं, जब मैं आपसे बात कर रहा हूँ (मुस्कुराते हुए)!

मैं 97 साल का हूँ। मैंने अपना जीवन पूरी तरह से जिया है। लेकिन आज सिर्फ़ एक कहानी ने मुझे कुछ ऐसा दिया जो कभी भी पैसा नहीं दे सकता था।

– वल्लभभाई वसरामभाई मारवानिया, गुजरात के जूनागढ़ जिले के ख़मधरोल गाँव के एक 97 वर्षीय उन्नत गाजर किसान हैं, जिन्हें ‘पद्म श्री’ से नवाज़ा गया है।

इस सच्चे हीरो और हमारे पाठकों को बधाई, जिन्होंने भारत को बेहतर बनाने में उनका साथ दिया।

उनकी पूरी कहानी पढ़ने के लिए क्लिक करें!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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