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इंदौर: आईएएस अफ़सर ने सिर्फ़ 6 महीनों में 100 एकड़ ज़मीन से कराया 13 लाख टन कचरे का प्रबंधन!

साल 2014 में जब मध्य-प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले शहर इंदौर को स्वच्छ सर्वेक्षण में बहुत ही निराशाजनक स्थान मिला, तो यहाँ के प्रशासन के साथ-साथ नागरिकों ने भी तय किया कि उन्हें मिलकर अपने शहर के लिए कुछ करना होगा।

उनकी कोशिशें सफ़ल रहीं और आज इंदौर भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में से एक है। द बेटर इंडिया के साथ जानिये, महज़ 3 सालों में कैसे आया यह बदलाव!

स्त्रोत: नितिन सिंह/फेसबुक

प्रशासन और नागरिकों ने हर उस बात का ध्यान रखा, जो उनके शहर को गंदा बनाती थी। सड़कों पर कचरा न फेंकना, सार्वजनिक स्थानों पर डस्टबिन लगाना और सभी लोगों का घर से सूखा और गीला कचरा अलग-अलग करके सफ़ाई कर्मचारियों को देना।

लेकिन फिर भी, शहर के 100 एकड़ इलाके में सालों से जमा हो रहे कचरे का पहाड़ प्रशासन और लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था। ऐसा नहीं था कि नगर निगम इस पर काम नहीं कर रही थी, लेकिन यह काम बहुत ही धीमी गति से हो रहा था।

और फिर, साल 2018 में आईएएस अफ़सर आशीष सिंह को इंदौर नगर निगम का कमिश्नर नियुक्त किया गया।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए आईएएस सिंह ने कहा, “2018 में जब मैंने इंदौर नगर निगम (आईएमसी) ज्वाइन किया, तो 13 लाख मेट्रिक टन कचरा इस ज़मीन पर इकट्ठा हो रखा था। पिछले दो सालों में आईएमसी सिर्फ़ 2 लाख मेट्रिक टन कचरे का प्रबंधन करा पाई थी। इस कचरे के ढेर के आस-पास के रहवासी क्षेत्रों में लोगों के लिए रहना दूभर हो गया था। साथ ही, भविष्य में इस ज़मीन के उचित उपयोग के लिए इस कचरे का प्रबंधन अत्यंत आवश्यक था।”

आईएमसी ने साल 2016-17 में इस ज़मीन पर रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट शुरू किया था और यह काम बाहर के एक ठेकेदार को दिया गया। इसी वर्ष सूखे और गीले कचरे को कहीं भी खुले में फेंकने पर रोक लगाई गयी थी।

इस काम को आउटसोर्स करने से दो बातें सामने आई, पहली यह कि काम बहुत धीमी गति से हो रहा था और दूसरी ये कि इसमें लागत बहुत ज़्यादा थी।

साभार: आशीष सिंह

बचपन से ही प्रशासनिक सेवाओं में शामिल होने का सपना देखने वाले सिंह ने यहाँ के हालातों को देखते हुए अपनी एक अलग ही रणनीति बनाई। उन्होंने इस काम को कम से कम समय में पूरा करने का फ़ैसला किया और वह भी नगर निगम द्वारा किसी भी अतिरिक्त खर्च के बिना।

उनका सुझाव था कि इस डंपसाईट को ख़ूबसूरत गोल्फ़-कोर्स में तब्दील किया जाए, जहाँ लोग घूमने-फिरने और खेलने आयें।

“बायो-रेमेडिएशन या बायो-माइनिंग, प्लास्टिक, धातु, कागज़, कपड़े और अन्य ठोस चीजों से इकट्ठे हुए कचरे को मिट्टी से अलग करके रीसायकल करने की इको-फ्रेंडली तकनीक है। इस पर अच्छी तरह से काम हुआ और 5 दिसंबर 2018 को इस 13 लाख मेट्रिक टन कचरे का बायो-रेमेडिएशन पूरा कर लिया गया।”

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आगे बताते हुए, उन्होंने कहा कि इस तरह के लैंडफिल में सबसे ऊपरी परत आमतौर पर धूल भरी होती है और इसमें कई तरह के मटेरियल हो सकते हैं, जो सक्रिय जैविक अवस्था में हो। इसलिए सबसे पहले इस परत को जैविक या हर्बल सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करके स्वस्थ और स्थिर किया जाता है।

इस परत में से प्लास्टिक, रबर, कपड़े आदि कचरे को निकालकर, अलग-अलग रीसायकल करने वालों को भेज दिया जाता है। 

आशीष सिंह (बाएं), कचरे को रीसायकल कर बनाई गयी मूर्ति (दाएं). साभार: आशीष सिंह

इस मिशन में सिंह का साथ दिया नगर-निगम के अतिरिक्त-आयुक्त रोहन सक्सेना और असद वारसी ने, जो शहरी विकास मंत्रालय के इको-प्रो पर्यावरण सर्विस के साथ काम करते हैं।

सिंह ने कहा, “पिछले पायलट प्रोजेक्ट्स के विपरीत, हमने किसी भी एजेंसी को यह काम आउटसोर्स नहीं किया। इस पूरे कचरे को साफ़ करने की लागत लगभग 65 करोड़ रुपये होती और यह हमारी वित्तीय क्षमता से परे था। चूंकि हमें बड़ी संख्या में भारी मशीनरी की आवश्यकता थी, इसलिए हमने मशीनरी किराये पर लेने का और अपने संसाधनों का उपयोग करके इसे संचालित करने का निर्णय लिया। हमने इस मशीनरी को दो शिफ्टों में संचालित किया और छह महीने में काम पूरा कर लिया। दिलचस्प बात यह है कि हमने इस पूरी प्रक्रिया में 10 करोड़ रुपये से भी कम खर्च किए!”

पहले सिर्फ़ 2 लाख मेट्रिक टन कचरे के प्रबंधन में दो साल लग गये। लेकिन यहाँ सिंह और उनकी टीम ने मात्र छह महीनों में 13 लाख मेट्रिक टन कचरे का प्रबंधन करवा दिया और नतीजा किसी चमत्कार से कम नहीं है।

कचरा-प्रबंधन के बाद (साभार: आशीष सिंह)

इस कचरे का प्रबंधन इको-फ्रेंडली तरीके से कैसे किया गया, इस पर बात करते हुए सिंह ने कहा, “बायोमाइनिंग प्रक्रिया से निकली दुबारा इस्तेमाल की जा सकने वाली सभी चीजों को रीसाइक्लिंग के लिए भेजा गया था। रिसाइकिल करने योग्य पॉलीथीन को सीमेंट फैक्ट्री और सड़क बनाने के लिए दे दिया गया। इस प्रक्रिया में जो मिट्टी इकट्ठा हुई, उसे फिर से उसी ज़मीन को भरने के लिए इस्तेमाल किया गया और अब यहाँ हरियाली लायी जा रही है। निर्माण और इमारतों के ढहने से इकठ्ठा हुए कचरे को फिर से निर्माण-योग्य बनाने के लिए भेजा गया है। और बाकी बचे 15% कचरे को एक सुरक्षित लैंडफिल में भेज दिया गया है।”

इस प्रोजेक्ट के बाद जो ज़मीन मिली है, उसकी कुल कीमत लगभग 400 करोड़ रूपये है और अब इसे एक गोल्फ़-कोर्स बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

इंदौर के इस उदाहरण ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए और यदि प्रशासन इस पर गंभीरता से काम करें, तो इस तरह के लैंडफिल को हरी-भरी जगहों में तब्दील किया जा सकता है।

मूल लेख – तन्वी पटेल

(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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