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जिनकी आवाज़ के सब दीवाने थे, कभी उस ‘के. एल सहगल’ ने गाना तो क्या बोलना भी छोड़ दिया था!

मारे देश में लता मंगेशकर को सुर-साम्राज्ञी कहा जाता है, तो मोहम्मद रफ़ी साहब और किशोर साहब बहुत से लोगों के लिए सुरों के जादूगर हैं। भारतीय सिनेमा में ऐसे बहुत से गायक और कलाकार हुए हैं, जिन्होंने न सिर्फ़ भारतीयों के दिलों पर बल्कि पूरे विश्व में अपनी छाप छोड़ी है।

ऐसे ही एक कलाकार थे के. एल. सहगल, जिन्हें हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा जाता है। पूरा नाम था कुंदन लाल सहगल और लोग इन्हें ‘शहंशाह-ए-संगीत’ और ‘ग़ज़ल किंग’ के तौर पर भी जानते हैं। भारतीय सिनेमा का वह गायक, जिसके दौर का वह इकलौता मालिक था। उनके दौर को अगर ‘सहगल युग’ भी कह दें, तो शायद गलत नहीं होगा।

सहगल का पब्लिसिटी फोटो

साल 1932 से 1946 तक सिनेमा को सहगल युग कहा जाता है। इस दौरान सहगल ने ग़ज़ल, खयाल, ठुमरी, चैती, दादरा आदि सब गाया। उन्होंने हिंदी और बंगाली, दोनों ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनायी। कहा जाता है कि सहगल वो पहले गायक थे, जो बंगाली नहीं थे पर फिर भी रबीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अपने लिखे हुए गीत गाने की इजाज़त दी थी। टैगोर ने जब उन्हें सुना, तो वे भी सहगल के गायन के मुरीद हो गये।

4 अप्रैल 1904 को जन्में के. एल. सहगल जम्मू-कश्मीर से थे। यहाँ उनके पिता अमरचंद सहगल राज-दरबार में तहसीलदार थे और उनकी माँ केसर बाई सहगल एक धार्मिक महिला थीं। उनकी माँ का संगीत से बहुत लगाव था और इसी का असर सहगल पर पड़ा। अपने पिता की नामंजूरी के बावजूद वे भजन, गीत आदि गाते ही रहते थे।

पर एक वक़्त था जब सहगल ने गाना तो क्या बोलना भी बंद कर दिया था!

दरअसल, 13 साल की उम्र में सहगल को लगा कि उनकी आवाज़ फट रही है। उम्र के इस दौर में ऐसा होना शायद स्वाभाविक था। पर सहगल इस बदलाव को नहीं समझ पा रहे थे और उन्होंने गाना तो क्या, बोलना भी छोड़ दिया। कुछ महीनों तक जब वे नहीं बोले तो घरवालों को फ़िक्र हुई।

जब हर तरह का जतन करके उनका परिवार थक गया, तो किसी की सलाह पर उन्हें किसी फ़कीर के पास ले गए। वे बाबा कहीं न कहीं उनकी परेशानी समझ गये थे और उन्होंने सहगल से सिर्फ़ रियाज़ करते रहने के लिए कहा। सहगल ने फिर से गाना शुरू किया और इसके बाद उनकी गायकी कभी नहीं रुकी।

सहगल की एक पेंटिंग

संगीत की दुनिया का जाना-माना नाम बनने से पहले सहगल ने सेल्समैन के तौर पर काम किया और पंजाब रेलवे में टाइम कीपर की नौकरी भी की। उनके लिए उस वक़्त संगीत एक शौक था और इसलिए जब भी उनके दोस्तों की महफ़िल जमती तो वे अपनी गायकी से माहौल जमा देते थे।

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एक बार सहगल ऐसे ही एक महफ़िल में अपने दोस्तों के लिए गा रहे थे और तभी हिंदुस्तान रिकॉर्ड कंपनी में काम करने वाले एक शख्स ने उन्हें सुना। इसके बाद तो जैसे सहगल की दुनिया ही बदल गई। शुरूआती दौर में, उनका देव गांधार राग में ‘झुलाना झुलाओं’ गाना काफ़ी मशहूर हुआ। धीरे-धीरे सिनेमा जगत में उनके नाम के चर्चे होने लगे।

गायिकी में उनका सितारा जितना चमका, उतना ही एक्टिंग के लिए भी लोगों ने उन्हें सराहा। साल 1935 में उन्होंने ‘देवदास’ फिल्म के हिंदी रीमेक में देवदास की भूमिका निभाई। यह फिल्म सुपरहिट हुई और इस तरह सहगल बन गये हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार।

साल 1935 में आई फिल्म ‘देवदास’ ने उन्हें बनाया था सुपरस्टार

सहगल की गायिकी के अंदाज़ को अपना आदर्श मानते हुए बहुत से उम्दा गायकों ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। हर किसी को बस सहगल जैसे गाना था। मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, किशोर कुमार, हर किसीने उनकी गायन-शैली को अपनाया। पर जैसे-जैसे इंडस्ट्री और तकनीक आगे बढ़ी सबका अपना अलग स्टाइल बन गया।

कहते हैं कि गायक मुकेश एक वक़्त पर बिल्कुल सहगल की तरह गाते थे। मुकेश ने ‘दिल जलता है, तो जलने दे’ गाना इस तरह गाया था कि लोगों ने इसे सहगल का गाना समझ लिया। पर कला और कलाकार के प्रशंसक रहे सहगल ने जब यह गाना सुना तो मुकेश को खुश होकर अपना हार्मोनियम दे दिया।

बंगाली और हिंदी के अलावा उर्दू, पंजाबी और तमिल जैसी भाषाओं में भी सहगल ने गया। साल 1947 में 18 जनवरी को सिनेमा जगत के इस चमकते सितारे ने सिर्फ़ 42 साल की उम्र में इस दुनिया से विदा ली। मात्र 15 सालों के करियर में सहगल ने सिनेमा जगत को वो विरासत दी, जिसकी गाथाएं सदियों तक गाई जाएँगी।

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(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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