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डॉ. राधाबिनोद पाल: वह भारतीय न्यायधीश, जिन्हें जापान ने अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ा!

जापान के टोक्यो में स्थित यासुकुनी तीर्थस्थान में युद्ध के दौरान मारे गये जापानी नागरिकों के स्मारकों के अलावा एक और स्मारक है, जो जापान और भारत के रिश्तों को बहुत ख़ास बना देता है। यह स्मारक समर्पित है भारतीय न्यायधीश राधाबिनोद पाल को!

भारत में भले ही बहुत कम लोगों ने राधाबिनोद पाल का नाम सुना हो, लेकिन जापान में आज भी उनका नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। साल 2007 में जब जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत के दौरे पर आये, तो उन्होंने संसद में अपने भाषण के दौरान पाल को श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री शिंजो राधाबिनोद पाल के परिवार से मिलने कोलकाता भी गये।

पर क्या आप जानते हैं कि एक भारतीय न्यायधीश को जापान में इतना आदर और सम्मान क्यूँ मिलता है?

यह कहानी है न्यायधीश राधाबिनोद पाल की, जिन्होंने बेहिचक पूरे विश्व को बताया कि “किसी भी युद्ध में कोई ‘सही पक्ष’ नहीं होता”!

जस्टिस डॉ. राधाबिनोद पाल

दूसरे विश्व युद्ध के समय साल 1945 में जापान को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। इस युद्ध के ख़त्म होने के बाद , संयक्त राष्ट्र अमेरिका, ब्रिटेन तथा फ्रांस ने जर्मनी और जापान के नेताओं और कुछ अन्य युद्ध-अपराधियों को सज़ा देना चाहते थे। इसलिए इन देशों ने युद्ध की समाप्ति के बाद ‘क्लास ए वार क्राइम्स’ नामक एक नया कानून बनाया, जिसके अन्तर्गत आक्रमण करने वाले को मानवता तथा शान्ति के विरुद्ध अपराधी माना गया।

इसे लागू करने के लिए जापान में ‘इंटरनेशनल मिलिट्री ट्रिब्यूनल फॉर द फार ईस्ट’ (आईएमएफटीई) ने संयुक्त राष्ट्रों से 11 न्यायधीशों की एक टीम बनाई, जिन्हें इन अपराधियों की सज़ा तय करने के लिए टोक्यो लाया गया। और फिर शुरू हुआ ‘टोक्यो ट्रायल्स’। वही जर्मनी में इसी तर्ज़ पर में ‘नूर्नबर्ग ट्रायल्स’ शुरू हुआ।

यह ट्रायल 3 मई 1946 को शुरू हुआ और लगभग ढाई साल चला। 28 आरोपियों के ख़िलाफ़ यह मुकदमा चला, जिनमें से अधिकांश जापानी प्रधानमंत्री हिदेकी तोजो के युद्ध मंत्रिमंडल के सदस्य थे। इन 28 आरिपियों में से एक को मानसिक रूप से अस्वस्थ्य घोषित किया गया था और ट्रायल के दौरान दो की मौत हो गई थी।

12 नवंबर, 1948 को बाकी बचे 25 आरोपियों को क्लास-ए (शांति के ख़िलाफ़ अपराधों) के 55 मामलों में दोषी ठहराया गया और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। एक के बाद एक सभी न्यायधीश उन्हें ‘दोषी’ करार देते जा रहे थे कि अचानक एक आवाज़ आई – “दोषी नहीं हैं”। इस एक आवाज़ को सुन कर पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया।

असहमति की यह आवाज़ कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक प्रतिष्ठित न्यायाधीश और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति राधाबिनोद पाल की थी।

(बाएं से दाएं) जनरल तोजो, टोक्यो ट्रायल के दौरान न्यायाधीशों का पैनल

युद्ध न्यायाधिकरण में पाल की भागीदारी, गिरजा शंकर बाजपेयी के अथक प्रयासों का परिणाम थी, जो वाशिंगटन डीसी में भारत के एजेंट जनरल थे (वह बाद में स्वतंत्र भारत के विदेश मंत्रालय में पहले महासचिव बने)।

वैसे तो शुरूआती योजना यह थी कि जिन देशों ने जापान के आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर किए थे, वे ही अपने यहाँ से न्यायाधीशों को भेजेंगे। लेकिन गिरजा शंकर बाजपेयी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत को अपना न्यायधीश भेजने का मौका मिलना चाहिए क्योंकि भारतीय सैनिकों की भी इस युद्ध में भागीदारी रही और वे मारे भी गये।

बाजपेयी और अमेरिकी विदेश विभाग के बीच लंबी बहस के बाद यह सहमति बनी कि भारत,युद्ध-न्यायाधिकरण में अपना भी एक न्यायाधीश भेजेगा। बाजपेयी ने बाद में कहा कि उन्होंने ‘भारत के लिए समानता का दावा’ स्थापित करने के लिए यह फ़ैसला लिया था। उस समय जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के उच्च न्यायलयों को इस बारे में सम्पर्क किया तो कोलकाता से राधाबिनोद पाल का जबाव सबसे पहले आया और उन्हें इस ट्रायल के लिए टोक्यो भेजा गया।

इस मुकदमे की शुरुआत से ही ट्रायल के बारे में न्यायधीश पाल ने अपना कानूनी दृष्टिकोण रखा। मुकदमें में कई पहलुओं को देखने का उनका नज़रिया बाकी न्यायधीशों से अलग था। क्योंकि वे एक राष्ट्रवादी थे और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का भी समर्थन करते थे।

आईएमएफटीई के न्यायाधीश, टोक्यो, जापान, 1946-1948. पिछली कतार (बाएं से दाएं): राधाबिनोद पाल-भारत, बी.वी.ए. रोलिंग-नीदरलैंड, एडवर्ड स्टुअर्ट मैकडॉगल-कनाडा, हेनरी बर्नार्ड-फ्रांस, हार्वे नॉर्थक्रॉफ्ट-न्यूजीलैंड और डेल्फिन जरनिला-फिलीपींस। अगली कतार (बाएं से दाएं): लॉर्ड पैट्रिक-यूके, एमजी क्रैमर-यू.एस. (जुलाई 1946 में इन्हें अमेरिकी न्यायाधीश जॉन पी हिगिंस के स्थान पर बुलाया गया था), सर विलियम वेब-ऑस्ट्रेलिया, जू-एओ मेई-चीन और एमजी आई. एम. ज़ार्यानोव-सोवियत संघ (रूस)।

उनका मानना ​​था कि इस ट्रायल के ज़रिये अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्याय के नाम पर संयुक्त राष्ट्र खुद को सही और जापान को ग़लत साबित कर, यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उन्होंने ‘दुष्टों’ पर धार्मिक विजय प्राप्त की है। साथ ही, कहीं न कहीं वे एशिया पर अपना अधिपत्य जमाने की कोशिश में थे।

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इस सबसे असंतुष्ट पाल ने लिखा था कि मानवता और शांति के खिलाफ़ इन्हें आरोपी साबित करने की यह कानूनी प्रक्रिया मात्र एक दिखावा है। इसके साथ ही उन्होंने जापान की क्रूरता को भी नहीं नकारा, बल्कि उन्होंने युद्ध के दौरान जापान के अत्याचारों (जैसे नानजिंग नरसंहार) को अमानवीय बताते हुए कहा कि इन सभी आरोपियों को क्लास बी (युद्ध अपराध) और क्लास-सी (मानवता के विरुद्ध) के अंतर्गत दोषी मानना चाहिए।

पाल ने संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु बम विस्फोटों की भी स्पष्ट रूप से आलोचना की और उनकी तुलना नाज़ी अपराधों से की।

न्यायधीश पाल की असहमति जापान का साथ देने के लिए नहीं थी, बल्कि इसलिए थी कि वे मानते थे इस ट्रायल में कई कमियां हैं और इससे कभी भी उचित न्याय नहीं हो पायेगा।

राधाबिनोद पाल का जापान में स्मारक

राधाबिनोद पाल का जन्म साल 1886 में ब्रिटिश भारत के बंगाल में हुआ था। साल 1905 का बंगाल विभाजन हो या फिर साल 1919 का जलियाँवाला बाग हत्याकांड, पाल ने हमेशा ही ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध किया। बाकी स्वतंत्रता सेनानियों की तरह वे भी भारतीय स्वतंत्रता के लिए हमेशा तत्पर रहे।

टोक्यो ट्रायल में पाल के फ़ैसले को विवादस्पद माना गया। उनके विरोधियों ने उनकी इस फ़ैसले पर आलोचना की तो बहुत से लोगों ने उनके फ़ैसले को साहसिक और निष्पक्ष माना। न्यूयॉर्क टाइम्स को एक साक्षात्कार देते हुए जापान-इंडिया गुडविल एसोसिएशन के अध्यक्ष, हिदैके कासे ने कहा,

“हम न्यायधीश पाल की उपस्थिति के लिए बहुत आभारी थे- कोई अन्य विदेशी नहीं था, जिसने स्पष्ट रूप से कहा कि जापान एकमात्र ऐसा देश नहीं है, जिसने ग़लत किया था।”

इस ट्रायल के बाद पाल को संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग के लिए चुना गया, जहाँ उन्होंने 1952 से 1966 तक अपनी सेवा दी।

फ़ोटो साभार

80 वर्ष की उम्र में 10 जनवरी 1967 को उनका निधन हो गया। आज भले ही भारत में उनकी विरासत के बारे में लोगों को ज्यादा नहीं पता, लेकिन जापान में उनकी प्रशंसा और सम्मान में कई पुस्तकें प्रकाशित हुई। साल 2007 में, एनएचके (जापानी पब्लिक ब्रॉडकास्टर) ने उनके जीवन पर आधारित 55 मिनट की एक डॉक्युमेंट्री भी जारी की थी।

इतना ही नहीं, साल 1966 में उन्हें जापान के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से सम्मानित किया गया। उनका नाम हमेशा ही भारत और जापान के बीच रिश्ते की सबसे मजबूत कड़ी रहा है। समय-समय पर दोनों ही देश पाल के सम्मान में और भारत-जापान के रिश्ते पर चर्चा करते रहे हैं।

कोलकाता उच्च नन्यायलय में लगी उनकी प्रतिमा

जो लोग राधाबिनोद पाल के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, वे 16 एफ, डोवर लेन,  दक्षिण कोलकाता में पाल के परिवारिक निवास-स्थान पर जा सकते हैं। इसे अब एक संग्रहालय में बदल दिया गया है, जिसमें पाल द्वारा लिखित दस्तावेज़, लेख, तस्वीरें और पत्रिकाएं आज भी संभाल कर रखी गयी हैं।

इसके अलावा नेटफ्लिक्स पर चार पार्ट की एक मिनीसीरीज़ भी जारी की गयी है, जो कि टोक्यो ट्रायल पर आधारित है। इस सीरीज़ में राधाबिनोद पाल की भूमिका मशहूर अभिनेता इरफ़ान खान ने निभाई है और इसका नाम भी ‘टोक्यो ट्रायल’ रखा गया है।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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