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Sujata and Taniya Biswas, founders of saree brand Suta

Suta: दो बहनों ने खड़ा किया 50 करोड़ का साड़ी ब्रांड; 16,000 बुनकरों को कर रही हैं सशक्त

सुजाता और तान्या विश्वास का दूर-दूर तक कपड़ों और फैशन की दुनिया से कोई संबंध नहीं था। लेकिन साड़ियों से प्रेम इतना गहरा था कि दोनों ने अपनी कॉरपोरेट नौकरियां छोड़, ‘Suta’ ब्रांड बनाया है। यहां खूबसूरत साड़ियां तो बनती ही हैं, साथ ही बुनकरों को भी सशक्त बनाने की कोशिश की जा रही है।

1 अप्रैल 2016 को सुजाता और तान्या बिस्वास ने अपने कॉरपोरेट करियर को अलविदा कहा और ‘सूता (Suta)’ (जिसका अर्थ है ‘धागा’) नाम का एक ब्रांड बनाने के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया। अपने ब्रांड के तहत बुनकर और कारीगर समुदायों को सशक्त बनाने की कोशिश के साथ-साथ, उन्होंने पारंपरिक शिल्पकला पर भी ध्यान केंद्रित किया। यह ब्रांड मुख्य रूप से बेहतरीन किस्मों की सूती साड़ियां, जामदानी बुनाई, मलमल, मलकेश और बनारसी साड़ियों के लिए जाना जाता है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए सुजाता बताती हैं, “वैसे तो Suta ब्रांड काफी हद तक अलग-अलग परंपराओं की कॉटन (सूती) साड़ियों के लिए जाना जाता है, लेकिन हम शुद्ध मलबेरी सिल्क के साथ-साथ हैंडलूम इक्कत और लिनन के साथ भी काम करते हैं। Suta ब्रांड के तहत सिल्क और कॉटन पर,  हैंड बाटिक, ब्लॉक-प्रिंटिंग, कढ़ाई आदि जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।”

सुजाता ने बताया कि फैशन या कपड़ों से जुड़ा कोई बैकग्राउंड न होने के बावजूद, दोनों बहनों ने एक ऐसा ब्रांड शुरू करने की ज़रूरत और चाह महसूस की, जो बुनकर और कारीगर समुदाय पर सकारात्मक प्रभाव डाले और भारत की खो रही कला को पुनर्जीवित करे।

वह कहती हैं, “हमारे पास 16,000 बुनकर और कारीगर हैं, जो हमारे साथ कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर काम करते हैं। हम उनके परिवार के दूसरे सदस्यों को भी रोजगार देते हैं।”

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एक पैशन प्रॉजेक्ट कैसे बना करोड़ों का बिजनेस?

Weaving machine
Weaving machine

दो बहनों की रचनात्मक जिज्ञासाओं और व्यक्तिगत प्रेरणाओं की नींव पर खड़ा हुआ एक पैशन प्रॉजेक्ट, छह साल बाद आज एक बिजनेस में बदल चुका है, जिसने लगभग 50 करोड़ रुपये का टर्नओवर बनाया है और 150 से ज़्यादा फुलटाइम कर्मचारियों के लिए काम करने की एक ‘खुशहाल जगह’ बन गया है।

तान्या कहती हैं, “हमारी इच्छा थी कि हमारे कीमती शिल्प और बुनाई की विरासत को आधुनिक संदर्भ में जगह मिले और जमीनी स्तर पर उसका प्रभाव हो। Suta हमारी उसी चाह और सोच का परिणाम है।”

ब्रांड ने हाल ही में पुरुषों के लिए कुर्ते लॉन्च किए हैं और जल्द ही महिलाओं के कुर्ते भी लॉन्च करने वाली है। इसके अलावा, यहां पहले से ही लाउंजवेयर, होम डेकॉर, हैंडबैग, ज्वेलरी आदि की काफी वरायटी मौजूद हैं।

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वह कहती हैं, “हम बहुत सारे वर्टिकल में शामिल हो रहे हैं, लेकिन हम विशेष रूप से साड़ियों के लिए वन-स्टॉप-शॉप जगह के लिए जाने जाते हैं। अगर आप आज साड़ी पहनना चाहती हैं, तो आप इसे हमारे किसी भी स्टोर से ले सकती हैं और पहन सकती हैं।” 

Suta की शुरुआत कैसे हुई?

सुजाता और तान्या के पिता रेलवे में नौकरी करते थे। नौकरी के सिलसिले में वे देश के कई हिस्सों में रहे। पिता के साथ दोनों बहनों ने भी कई जगहें देखीं। वे ज्यादातर भारत के पूर्वी हिस्से में रहते हुए बड़े हुए, जहां उनका कई अलग-अलग संस्कृतियों, व्यंजनों, समुदायों और पहनावे के विकल्पों से परिचय हुआ। उनके बचपन की यादों का एक बड़ा हिस्सा उनकी माँ और दादी की साड़ियों का संग्रह भी है। 

सुजाता याद करते हुए बताती हैं, “इंजीनियरिंग की डिग्री और एमबीए करने के बाद, मैंने ब्रांडिंग और स्टील उद्योग में काम किया, जिसके बाद मैंने ई-कॉमर्स बिज़नेस की पढ़ाई के लिए आईआईटी-बॉम्बे में पीएचडी के लिए अप्लाई किया। यही वह समय था, जब तान्या और मैंने अपना बिज़नेस शुरू करने के बारे में सोचना शुरू किया।”

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साल 2013 में, तान्या भी अपनी बहन के पास मुंबई आ गईं। उन्होंने IIM लखनऊ से एमबीए किया था और IBM के लिए कंसल्टेंट के रूप में काम कर रही थीं। वैसे तो दोनों बहनों को अपनी-अपनी नौकरी पसंद थी, लेकिन वे जैसा चाहती थीं, उनकी नौकरियां उस तरह से जीवन को प्रभावित नहीं कर रही थीं। इसी वजह एक साल बाद, उन्होंने अपने बिजनेस पर काम करना शुरु कर दिया। 

प्लेन मलमल की साड़ियां बनाने को नहीं था कोई तैयार

There is a story behind every product Suta puts out
There is a story behind every product Suta puts out

अगले दो वर्षों तक, दोनो बहनें सीख रही थीं, गलतियाँ कर रही थीं, धोखा खा रहीं थी। साथ ही, उनकी भारत के विभिन्न कोनों में सही कपड़े और कुशल बुनकरों की तलाश भी जारी थी। कुशल बुनकरों की उनकी खोज, उन्हें पश्चिम बंगाल के सुदूर कोनों तक ले गई, जहाँ फ़िलहाल उनके दो कारखाने हैं – एक नदिया जिले में शांतिपुर और दूसरा धनियाखली में।

उन्होंने मध्य प्रदेश, मेघालय, वाराणसी (विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ियों का घर), ओडिशा में मनियाबंध और गुजरात में कच्छ जिले सहित कुछ अन्य स्थानों का दौरा भी किया। इन यात्राओं ने कपड़े के प्रति उनके प्रेम को और गहरा बनाया। उस समय को याद करते हुए सुजाता कहती हैं, “इन गांवों की यात्रा करने पर, साड़ियों के लिए हमारा प्यार भी बढ़ गया। लोग अक्सर हमें बताते थे कि साड़ी विशेष अवसरों के लिए होती है या बुजुर्ग महिलाएं मंदिर में दर्शन आदि के दौरान इसे पहनती हैं।”

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वह कहती हैं, “हम उस धारणा को बदलना चाहते थे और साड़ियों को रोजमर्रा की जिंदगी में वापस लाना चाहते थे। हमने, एक महीन, हल्की और मुलायम सूती मलमल की साड़ियों से शुरुआत की। हमने जिन बुनकरों से संपर्क किया, वे स्टार्च के बिना सादी मलमल साड़ियाँ बनाने के लिए सहमत नहीं थे। क्योंकि आमतौर पर ग्रामीण पश्चिम बंगाल में मलमल साड़ियों पर कशीदाकारी की जाती है। उन्होंने हमें बताया कि सादी साड़ियां केवल विधवाओं द्वारा पहनी जाती थीं। सादी मलमल साड़ियों का ज्यादा बाजार नहीं था और केवल कुछ बुनकर ही इसे बना रहे थे और आखिर में हमें वे बुनकर मिल गए।”

चखा असफलता का स्वाद भी

सुजाता आगे बताती हैं कि शुरुआत में बुनकरों को उन्होंने कोई डिजाइन नहीं दिया था। वह एक रंग की सादी साड़ियां बना रहे थे। वह कहती हैं कि इन साड़ियों को वे लॉन्च करना चाहती थीं, क्योंकि वे युवाओं के जीवन में इन्हें वापस लाना चाहती थीं। उन्होंने इन साड़ियों को 1,250 रुपये (जीएसटी के साथ, 1,313 रुपये) में बेचना शुरू किया। यह सब वे फुलटाइम जॉब करते हुए कर रही थीं।

तान्या बताती हैं, “कितना भी काम हो, मैं वीकेंड पर वापस आती थी। हमें जो भी ऑर्डर मिलते थे, हम दोनों वीकेंड पर पैकिंग और शिपिंग किया करते थे। यह सब हमने खुद किया और तब हमारे पास कोई कर्मचारी नहीं था। जब हमने 2016 में अपनी नौकरी छोड़ी, तो हमारे पास एक कर्मचारी था, जो पैकिंग और लेबलिंग का काम करता था। इसके अलावा, हमारे पास दो बुनकर थे, जो हमारे साथ फुलटाइम काम कर रहे थे। इससे पहले दो साल तक हम अपने बिज़नेस पर काम कर रहे थे, अपना शूट कर रहे थे, बिजनेस मॉडल का पता लगा रहे थे। हमने बहुत सारी प्रदर्शनियाँ भी आयोजित कीं, कई असफलताओं को सहा और पता लगाया कि हमारे ग्राहक कौन लोग हो सकते थे।”

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Suta की हर साड़ी के पीछे है एक कहानी

जब दोनों बहनों ने सूता लॉन्च किया, तो दोनों तैयार थीं और दोनों ने करीब 3 लाख रुपये का निवेश किया। उन्होंने बहुत ही साधारण साड़ियों को लोगों के लिए सुलभ बनाने की अपनी यात्रा शुरू की।

इन्होंने बेहतरीन गुणवत्ता के साथ पतली बॉर्डर या बिना बॉर्डर के साथ सरल डिजाइन बनाने पर ध्यान केंद्रित किया। ये दोनों बहने अपने साथ काम करने वाले बुनकरों को सालभर बाजार दरों से ऊपर नियमित काम दे रही थीं। धीरे-धीरे यह बात फैली और उनके साथ काम करने वाले इच्छुक बुनकरों की बाढ़ सी आ गई। जल्द ही, उनके साथ ढेरों बुनकर आ गए और भारत भर के युवा ग्राहक, विशेष रूप से 18 से 25 वर्ष की आयु के बीच, इनकी साड़ियाँ लोकप्रिय होने लगीं। 

सुजाता बताती हैं कि यह ब्रांड महज सामान बेचने के लिए नहीं है। वह कहती हैं, “हमारे कई उत्पादों के पीछे, हम अपने सोशल मीडिया हैंडल पर कहानियां लिखते हैं कि एक विशेष साड़ी क्यों बनाई जाती है, उत्पाद के पीछे की कहानी और इसे बनाने की प्रक्रिया भी लिखते हैं। हालाँकि, सबसे बड़ा मकसद बहुत सारे बुनकरों के साथ काम करना और उन्हें साल भर काम देना है।”

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वह कहती हैं कि वह बुनकरों के साथ केवल काम नहीं करतीं, बल्कि उन्हें डिजाइन करने की प्रक्रिया में भी शामिल करती हैं, जहां वे सुझाव दे सकते हैं। सुजाता कहती हैं, “यह एकतरफा रिश्ता नहीं है।”

लॉकडाउन में खड़ा रहा बिजनेस

Co-founders of Suta, popularly known for sarees
Co-founders of Mumbai-based Suta: Taniya and Sujata Biswas

तान्या कहती हैं कि कोविड 19 के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान, जब कई ब्रांड नहीं बिक रहे थे, तब भी लोग सूता खरीद रहे थे।

वह कहती हैं, “ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम इस बारे में बात करते रहे कि हम इस कठिन समय में बुनकरों के लिए क्या कर रहे हैं। महामारी के दौरान, ज्यादातर बुनकर हमारे साथ थे, भले ही हमारे पास न तो समय था और न ही नकदी और यही हमें दूसरों से अलग करता है।”

बुनकरों के साथ अपने घनिष्ठ संबंध के अलावा, सूता का मकसद अपने ग्राहकों के साथ भी घनिष्ठ संबंध बनाना है। ग्राहकों के अपने ‘परिवार’ को ‘सूता क्वींस’ कहते हुए ये अपने सोशल मीडिया पर कहानियों के साथ उनकी तस्वीरें पोस्ट करती हैं। इन पोस्ट्स में वह या तो ग्राहक पर या साड़ी के पीछे की कहानी पर चर्चा करती हैं।

Suta : बुनकरों के साथ, बुनकरों के लिए करते हैं काम

सूता के बारे में जो बात सबसे अलग है, वह है बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, कश्मीर और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बुनकरों के साथ उनका काम। शुरुआती वर्षों में, इन बुनकरों के साथ विश्वास पैदा करना और उन्हें अपने साथ जोड़ना एक बड़ा काम था।

तान्या कहती हैं, “पैसा एक महतवपूर्ण चीज है! हमने सुनिश्चित किया कि उन तक भुगतान समय पर पहुंचे। सूता के शुरुआती दिनों में, जब वे हमें साड़ियाँ देते थे, तो हम उनकी जाँच कर, तुरंत ही उनका भुगतान भी कर देते थे। कुछ मामलों में, हमने यह भी सुनिश्चित किया कि अगर बुनकर की पत्नी, जिसने किसी विशेष साड़ी बुनाई में उसकी मदद की है, तो उसका बैंक अकाउंट हो और काम समान रूप से विभाजित हो।”

बुनकरों को अपने साथ जोड़ने की प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए सुजाता कहती हैं, “हमारी टीम बुनकरों से मिलती है। ये बुनकर अपने नमूने दिखाते हैं और हमारी टीम गुणवत्ता के लिए प्रोडक्ट की जांच करती है और उन्हें ट्रेनिंग देती है कि हम एक ब्रांड के रूप में कैसे काम करते हैं।”

उन्होंने आगे बताया, “इसके बाद, बुनकर उन्हें धोते हैं और उन पर सूता स्टिकर लगाते हैं। एक बार अंतिम जांच हो जाने के बाद, वे ऑनबोर्ड हो जाते हैं और फिर हम व्हाट्सएप या ईमेल के माध्यम से ऑनलाइन डिजाइन भेजते हैं। हम उनके साथ कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर काम करते हैं। जैसे ही तैयार साड़ियाँ हमारे हब तक पहुँचती हैं (उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में हमारे दो कारखाने हैं), औरा क्यूसी (गुणवत्ता की जाँच) की जाती है, भुगतान तुरंत बुनकर के बैंक खाते में जमा कर दिया जाता है, भले ही हमारी साड़ियां बिकी हों या नहीं।”

कैसे तय करते हैं दाम?

तान्या कहती हैं कि बुनकर उनके साथ लंबे समय तक काम इसलिए करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि हमारे पास उनके लिए हमेशा काम है। उनका भुगतान इस बात पर आधारित नहीं है कि हम उनके बनाए गए प्रोडक्ट कब बेचते हैं। हमारा क्यूसी काफी तेजी से होता है, क्योंकि हमारे पास हमारे कारखानों में इसकी देखरेख करने वाली एक बड़ी टीम है। साथ ही, हमारा वेतन ढांचा बाजार की तुलना में थोड़ा अधिक है, क्योंकि हमारा क्यूसी काफी सख्त है। ”

बुनकरों और कारीगरों को प्रति उत्पाद के आधार पर भुगतान किया जाता है। दाम, हर उत्पाद की जटिलता पर निर्भर करता है। यह हैंडलूम, जेकक्वार्ड लूम, पावरलूम और अन्य तकनीकों के आधार पर भी अलग-अलग है।

सूता (Suta) का बुनकरों के साथ फुलटाइम कॉन्ट्रैक्ट है और प्रत्येक बुनकर का वेतन उनके द्वारा बनाई जाने वाली वस्तुओं की संख्या, उनके कौशल और बुनाई तकनीक पर निर्भर करता है। कुछ कारीगर केवल मौसमी उत्पाद (जैसे बाटिक साड़ी) बनाते हैं, जिसमें लीड टाइम मानक साड़ियों की तुलना में अधिक लंबा हो सकता है। इसलिए उन्हें सरल/कम लीड टाइम उत्पादों पर प्रीमियम मूल्य निर्धारण दिया जाता है।

खराब व पुरानी साड़ियों का भी करते हैं इस्तेमाल

Sujata & Tanya Biswas & Members of Team Suta, a brand known for its sarees
Members of Team Suta, a brand known for its sarees

पश्चिम बंगाल में बेगमपुर हैंडलूम क्ल्स्टर डेवलपमेंट सोसाइटी से जुड़े बुनकरों के समूह का प्रबंधन करने वाले सेलेन कुमार कुंडू, सूता के साथ काम करने के अुनभव के बारे में बात करते हुए कहते हैं, “हम सूती साड़ी बनाते हैं। 2018 में, हम सुता से मिले जब वे बेगमपुर में साड़ी खोजने आई थीं। उन्होंने हमें ढूंढा और हमारी साड़ियों के बारे में पूछताछ की। उन्हें हमारी साड़ियां बेहद पसंद थीं और अब तक लगातार खरीद रहे हैं।”

वह कहते हैं, “अगर कुछ नहीं तो वे हर साल कम से कम 1800 पीस खरीदते हैं। सुता हमसे सूती साड़ियाँ खरीदती हैं, जिनमें 100/100, 80/100 और 40/60 धागे होते हैं।” इसके अलावा, जब किसी बुनकर का कोई विशेष कलेक्शन काम नहीं करता है या उत्पाद में कोई रंग या डिज़ाइन गड़बड़ होता है, तो सूता इन्वेंट्री वापस नहीं भेजती है। इसके बजाय, वे या तो दोषपूर्ण उत्पादों को दूसरे तरह से निकालने के बारे में सोचते हैं और ऐसी साड़ियों को ब्लॉक प्रिंटिंग और कढ़ाई जैसी तकनीकों से बेहतर बनाते हैं या फिर उन्हें अपसाइकल कर देते हैं।

क्या है Suta Earth?

सूता, ‘सूता अर्थ’ नाम से एक पहल भी चलाती है, जिसके तहत लोगों से पुरानी साड़ियाँ लेकर, उनसे बैग्स बनाया जाता है। तान्या कहती हैं, “जब भी साड़ियों में कोई खराबी होती है, तो हम उन्हें खेश साड़ियां (पुरानी साड़ियों को जोड़कर नई साड़ी बनाना) बनाने के लिए रख देते हैं। कभी-कभी बुनकर करघा बंद कर देते हैं और बाहर चले जाते हैं और जब वे वापस आते हैं, तो साड़ी के बीच में एक निश्चित रेखा बन जाती है। यह लाइन काफी खराब दिखती है और अक्सर, ग्राहक इसे इस्क्सचेंज करना चाहते हैं। उस लाइन को कवर करने के लिए, हम ब्लॉक प्रिंट या कढ़ाई कर देते हैं, ताकि लाइन छिपी रहे।” सूता ने इन कामों के लिए अलग-अलग यूनिट बनाई है।

कोविड के दौरान बुनकरों की काफी मदद की

बुनकरों के साथ सूता (Suta) का जुड़ाव कोविड-19 महामारी के दौरान और बढ़ गया। कोलकाता के एक कारीगर मार्टिन घोष कहते हैं, “हमने अक्टूबर 2020 के आसपास सूता को एक ईमेल लिखा था, जिसमें बताया गया था कि कैसे महामारी में हमें परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हमने पूछा कि क्या सूता किसी काम में हमारी मदद कर सकती है। उनकी टीम ने हमसे मुलाकात की और हमारा काम देखा। उन्हें यह पसंद आ गया और नवंबर 2020 तक, सूता ने हमें काम देना शुरू कर दिया था।”

मारिन और उनके कारीगरों की टीम सुता के लिए कुशन, साड़ी और पर्दे बनाती है। वह बताते हैं, “हम फ्रेंच नॉट्स, कांथा कढ़ाई, बुलियन इत्यादि बनाते हैं। हमें बाटिक सिल्क और मलमल पर काम करने के लिए सूता से कपड़े भी मिलते हैं। पिछले साल हमें उनसे बहुत काम मिला। हमें उनसे हाथ से कढ़ाई करने के लिए लगभग 200-250 साड़ियां भी मिली। उन्होंने हमें जो काम दिया, उसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। उनके द्वारा दिए गए काम के कारण 700-800 कारीगर अपनी आजीविका कमा सकने में सक्षम हुए। इसके लिए हम हमेशा के लिए आभारी हैं।”

आगे क्या है लक्ष्य?

Weavers and artisans are at the heart of Suta
Weavers and artisans are at the heart of Suta

इसी तरह, कश्मीर के एक पश्मीना बुनकर जान मोहम्मद, पिछले पांच वर्षों से सूता के साथ शॉल, स्टोल, कपड़े, मफलर और टोपी बनाने का काम कर रहे हैं, महामारी के प्रभाव के बारे में बात करते हुए वह कहते हैं, “लॉकडाउन के दौरान, हमारे पास काम कम था, लेकिन सूता ने उस कठिन समय में हमारा साथ दिया और हम इसके लिए बहुत आभारी हैं।” 

भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए सुजाता कहती हैं कि सूता (Suta) का लक्ष्य भारत के विभिन्न हिस्सों से और अधिक बुनकरों को जोड़ना है, ताकि कोई भी पारंपरिक शिल्प खो न जाए। वह कहती हैं, “अधिक बुनकरों को जोड़ने के अलावा, हमारा कुछ और लक्ष्य है ही नहीं।”

इसके अलावा वह कहती हैं, “हम भविष्य में पूरी तरह से प्राकृतिक रेशों के साथ काम करना चाहते हैं और मिंत्रा और नायका फैशन जैसे अधिक स्टोर और ई-कॉमर्स के माध्यम से अपनी पहुंच का विस्तार करना चाहते हैं। भले ही मार्जिन में सुधार हो या न हो, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ यह जुड़ाव, कम से कम उत्पादों की मात्रा बढ़ाने और बुनकरों के लिए अधिक ऑर्डर देने में तो मदद करेंगे ही।”

मूल लेखः रिनचेन नॉर्बू वांगचुक

संपादनः अर्चना दुबे

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