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बाज़ार से प्लास्टिक का नहीं बल्कि खुद बीज बो कर उगाया अपना क्रिसमस ट्री!

अपने क्रिसमस ट्री के साथ एलन

क्रिसमस का इंतजार सबको होता है खासकर कि बच्चों को। एक हफ़्ता पहले से ही बच्चे अपने स्कूल, घरों में क्रिसमस के पेड़ की सजावट शुरू कर देते हैं। अक्सर, क्रिसमस के लिए हम बाज़ार से प्लास्टिक के नकली पेड़ लेकर आते हैं। बेशक, सितारे, बर्फ की बूंदों, तोहफ़ों और मोतियों के साथ एलईडी लाइट्स से सजा हुआ यह क्रिसमस का पेड़ बहुत ही खुबसूरत लगता है।

पर, इस क्रिसमस पर केरल में वायनाड जिले के अम्बलावाया गाँव के निवासी एलन ने कुछ अलग ही तरह का क्रिसमस पेड़ बनाया। एलन अभी नौवीं कक्षा में पढ़ रहे हैं, लेकिन इस बच्चे की समझदारी बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा है।

दरअसल, एलन ने क्रिसमस डे के लिए एक इको-फ्रेंडली तरीके से क्रिसमस पेड़ बनाया है। इसके लिए एलन ने एक बड़े बांस के फ्रेम को मिट्टी से अच्छे से ढका और फिर इस मिट्टी में कंगनी (मलयालम में थीना) के बीज बो दिए। कंगनी या टांगुन, मोटे अन्नों/अनाजों में दूसरी सबसे अधिक बोई जाने वाली फसल है, खासतौर पर पूर्वी एशिया में। इसे ‘चीनी बाजरा’ भी कहते हैं।

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क्रिसमस पेड़ का आकर और उसमें बोये गये बीज (साभार: सतीश कुमार फेसबुक पेज)

एलन हर दिन इन पौधों में पानी भी देते हैं। लगातार 3-4 दिन तक पानी देने से, सभी बीज अंकुरित हो जायेंगे और फिर यह एक हरे-भरे क्रिसमस पेड़ की तरह दिखाई देगा।

एलन और उसके इस इको-फ्रेंडली क्रिसमस पेड़ के बारे में एक फेसबुक यूजर सतीश कुमार ने अपनी एक पोस्ट के जरिये बताया। सतीश ने लिखा कि उसने जब रास्ते में एलन में और उसकी इस पहल को देखा तो उसने निश्चय किया कि इसे और भी लोगों से साँझा किया जाना चाहिए।

पर सतीश ने खेद भी जताया है कि वह इस पोस्ट को जल्द से जल्द शेयर करना चाहता था और इसलिए, इन बीजों को अंकुरित होने तक का इंतजार नहीं कर पाया। हालांकि, उसे पौधे उगने के बाद की तस्वीर भी डालनी चाहिए थी।

एलन की यह पहल यकीनन काबिल-ए-तारीफ है। बाज़ार से प्लास्टिक आदि से बने नकली क्रिसमस ट्री खरीदने की बजाय हमें बच्चों को हरियाली का महत्व समझाते हुए उन्हें खुद का पेड़ उगाने की सलाह देनी चाहिए।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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