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Wildlife protection

तमिलनाडु: इस किसान के प्रयास से इलाके में हिरणों की संख्या हुई तीन से 1800, जानिए कैसे!

तमिलनाडु के पुदुपलायम में रहने वाले 70 वर्षीय आर गुरुसामी ने 1998 में अपनी गायों और बकरियों के साथ तीन हिरणों को चरते देखा। इसके बाद उन्होंने हिरणों को आसरा देने के लिए अपनी 50 एकड़ जमीन खाली छोड़ दी। आज वहां करीब 1800 हिरण रहते हैं। पढ़िए इंसानों और बेजुबानों के बीच जद्दोजहद की यह प्रेरक कहानी!

तमिलनाडु के पुदुपलायम गांव में 50 एकड़ खाली जमीन है, जिसे बीते 20 सालों में हिरणों के अलावा बकरियों और गायों जैसे कई पालतू जानवरों ने अपना घर बना लिया है। आस-पास में न कोई जंगल है। ऐसे में आप सवाल पूछ सकते हैं कि आखिर यह कैसे हुआ? 

आपके सवाल के जवाब में हम आपको इसी गांव में रहने वाले आर गुरुसामी की कहानी सुनाने जा रहे हैं। दरअसल, यह आर गुरुसामी के प्रयासों का नतीजा है। उन्होंने इन बेजुबानों को आसरा देने (Wildlife Protection) के लिए अपनी जमीन पर खेती नहीं की। उनके गांव में कभी सिर्फ तीन हिरण थे, लेकिन आज वहां सैकड़ों हिरण रहते हैं।

यह कैसे हुआ?

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इस विषय में गुरुसामी ने द बेटर इंडिया को बताया, “यह बात 1998 की है। मैंने एक दिन अपनी बकरियों के साथ तीन हिरणों को घास चरते देखा। मैं यह देखकर हैरान रह गया, क्योंकि हिरण घास चरने के लिए मवेशियों का पीछा कर रहे थे। फिर, वे कभी नहीं गए और यहां अक्सर आने लगे।”

70 वर्षीय गुरुसामी का मानना है कि ये हिरण खाने-पानी की तलाश में पश्चिमी घाट के मेट्टुपालयम जंगल से आए थे, जो पास में ही है।

“वर्षा में कमी के कारण, यह क्षेत्र बीते 25 वर्षों से सूखे का सामना कर रहा है। पहले कौशिक नदी में सालों भर पानी रहता था, लेकिन अब सूख जाती है। खेती में पानी के अत्यधिक बर्बादी के कारण, भूजल स्तर भी कम हो गया है। हिरणों ने इसी वजह से जंगल छोड़ा होगा”, उन्होंने बताया।

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Wildlife Protection
Deer at Gurusamy’s farm and peacocks in the hindsight.

वह आगे कहते हैं, “मेरे पास 60 एकड़ पुश्तैनी जमीन है। मैं उन दिनों 15 एकड़ में मक्का, कपास और मौसमी सब्जियों की जैविक खेती करता था। मैंने 45 एकड़ जमीन गायों और बकरियों को चरने और देशी पौधों को उगाने के लिए छोड़ दिया था। मैं अपने जैविक खाद को बनाने के लिए गायों के गोबर का उपयोग करता हूं।”

गुरुसामी बताते हैं कि हिरणों ने उनके खेत को अपना घर बना लिया। यह देख उन्होंने अपनी खेती को 10 एकड़ तक सीमित कर दिया और 50 एकड़ जमीन बेजुबानों (Wildlife Protection) के लिए छोड़ दिया।

गुरुसामी कहते हैं कि उन्हें हिरणों के प्रति दया आती है और वह उन्हें न तो कोई नुकसान पहुंचाना चाहते हैं और न ही उन्हें दूर भगाना। वह कहते हैं, “मैंने कई बार देखा कुत्ते, हिरणों पर हमला कर देते हैं और मैं उन्हें बचाना चाहता था। मुझे अहसास हुआ कि मेरे खेत उन्हें बाहरी खतरों से दूर रखेंगे।”

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गुरुसामी ने बताया कि उन तीन हिरणों में से एक नर था और बाकी मादा थीं। जैसे ही हिरणों ने प्रजनन शुरू किया, लेकिन हर कोई इस बेजुबान के प्रति दयाभाव नहीं रखता था। 

वह कहते हैं, “धीरे-धीरे यहां हिरणों की संख्या बढ़ने लगी, लेकिन 2005 तक स्थानीय लोगों को इसके बारे में पता नहीं था। फिर, हिरणों की संख्या इतनी हो गई कि वे चरने के लिए लोगों के खेतों तक जाने लगे। इससे किसानों को खतरा महसूस हुआ। उस समय हमारे इलाके में बारिश की कमी थी। इसलिए हिरण पानी की तलाश में दूसरे खेतों तक चले जाते थे। इससे फसलों को नुकसान होता था। कुछ लोगों ने इसकी शिकायत वन विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों से की।”

जल्द ही, स्थानीय अखबार में काम करने वाले एक पत्रकार को इस घटना के बारे में पता चला और उन्होंने इलाके में बढ़ रहे हिरणों के विषय में लिखा। इस खबर को पढ़ने के बाद, कई शहरी लोग गुरुसामी के गांव हिरण देखने आने लगे।

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गुरुसामी को इस बात से कोई शिकायत नहीं है और वह समझते हैं कि किसान हिरणों को एक खतरा क्यों मानते थे।

वह कहते हैं, “किसान पहले ही पानी की कमी से जूझ रहे थे और उत्पादन कम हो रहा था। हिरणों ने उनके नुकसान को और बढ़ा दिया, जो उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने हिरणों को भगाने के लिए कुछ कुत्तों को पालना शुरू कर दिया।”

हिरणों का पीछा करने से वे काफी डर जाते थे और इधर-उधर भागने के दौरान सड़क हादसों का भी शिकार हो जाते थे। हिरणों की बढ़ती आबादी ने शिकारियों को भी आकर्षित किया। शिकारियों ने मांस और व्यापार के लिए उन्हें निशाने पर लेना शुरू कर दिया था।

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A dead deer falling a victim of road accident.

गुरुसामी ने किसानों को समझाने की काफी कोशिश की, लेकिन सब बेकार रहा। वह कहते हैं, “उन्होंने मेरी एक न सुनी और इस बारे में कलेक्टर को बता दिया। मैं लोगों को बेजुबानों के प्रति जागरूक करने और उनकी सोच को बदलने के लिए आज भी संघर्ष कर रहा हूं। मुझे मेरे दोस्त सी बालसुंदरम का साथ हमेशा मिला। उन्होंने कई एकड़ में फैले अपने नारियल के बगीचे को हिरणों के लिए खोल दिया।”

गुरुसामी ने बालासुंदरम के साथ मिलकर 2008 और 2010 में शिकारियों की दो टीमों को भी पकड़ा था।

वह कहते हैं, “हमने इसकी सूचना वन विभाग को दी। उन्होंने हमेशा हमारी मदद का वादा किया। हिरणों को बाहर निकलने से रोकने के लिए, मैंने अपने खेत में एक-दो तालाब भी बनवाए। गर्मी के दिनों में इन तालाबों को वन विभाग के अधिकारी भर देते हैं।”

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सेंथिल कुमार जो कि तिरुपुर के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर हैं, ने बताया, “बीते दो दशकों के दौरान यहां हिरणों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। अगस्त 2021 की गणना के अनुसार, यहां हिरणों की संख्या करीब 1800 है।”

सेंथिल कहते हैं कि विभाग गुरुसामी को वन्यजीवों को बचाने (Wildlife Protection) और उनकी जरूरतों को समझने में हरसंभव मदद करता है। वह कहते हैं, “हिरणों के अवैध शिकार और उनकी गतिविधियों को रोकने के लिए, वन रक्षकों द्वारा चौबीसों घंटे गश्ती की जाती है।”

सुरक्षित जगह की तलाश

धीरे-धीरे, गुरुसामी को अपने मुहिम में कुछ गैर सरकारी संगठनों और पर्यावरणविदों की भी मदद मिलने लगी। 

इस विषय में के. रवींद्रन, जो कि एक पर्यावरणविद और तिरुपुर स्थित नेचर सोसाइटी एनजीओ के अध्यक्ष हैं, कहते हैं, “मैं गुरुसामी के कार्यों को 2010 से देख रहा हूं। हिरणों को बचाने और उनकी संख्या को बढ़ाने के लिए उनका प्रयास सराहनीय है। हिरण एक शाकाहारी जानवर है और आसपास उनको शिकार बनाने वाला कोई मांसाहारी जानवर नहीं रहता है। इसके अलावा, उन्होंने अपनी खेत में केला और टैपिओका जैसे फलों को लगाया है, जिसे लोग मिनी फॉरेस्ट समझ लेते हैं।”

रवींद्रन कहते हैं कि शिकारियों के खतरे को कम होने से हिरणों की आबादी में तेजी से वृद्धि हुई। यह एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे टुकड़ों में बंटा जंगल पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा कर सकता है और खाद्य श्रृंखला को बाधित कर सकता है।

Flock of deer at Gurusamy’s farm land.

वह कहते हैं,  “मैंने अपनी पहली यात्रा के दौरान वहां करीब 110 हिरण देखे और आज इनकी संख्या उससे कई गुना ज्यादा है। वन्यजीवों की सुरक्षा (Wildlife Protection) के लिए जिला कलेक्टर और वन विभाग के अधिकारी अक्सर यहां आते रहते हैं।”

लेकिन, गुरुसामी ने दिनोंदिन बढ़ते खतरों को देखते हुए, अधिकारियों से हिरणों को किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने की अपील की। रवीन्द्रन को भी यही लगता है कि हिरणों की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है, लेकिन इसकी भी अपनी चुनौतियां हैं।

वह कहते हैं, “हिरण एक संवेदनशील जानवर है। एक झटके या लंबे समय तक पीछा करने से यह काफी थक सकती है और उनकी मौत हो सकती है। इसलिए हिरणों को दूसरी जगह पर शिफ्ट करने के लिए एक धीमी, लेकिन दीर्घकालिक योजना की जरूरत होगी। उनके साथ शिकारियों जैसा बर्ताव नहीं किया जा सकता है। हम अधिकारियों की मदद के लिए हल तलाश रहे हैं।”

हिरणों की अनिश्चित भविष्य के बावजूद, गुरुसामी कहते हैं कि वह वन्यजीवों को बचाना (Wildlife Protection) जारी रखेंगे। 

“मुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं है। मैं हिरणों को बचाने के लिए किसानों से लड़ूंगा। राज्य सरकार ने किसानों को पानी की समस्या से दूर करने के लिए सिंचाई पाइपलाइन योजना को मंजूरी दी है। ऐसे में, हिरणों के लिए पानी की तलाश में खतरा बढ़ सकता है। इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को कम करने के लिए, जल्द ही कोई हल निकालना होगा। यदि कुछ विशेषज्ञ हमारी मदद करें, तो यह बहुत बढ़िया होगा,” गुरुसामी अंत में कहते हैं।

मूल लेख – हिमांशु नित्नवरे

संपादन- जी एन झा

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