सरकारी स्कूल की ईमारत गिरा दिए जाने पर गांववालों ने मिलकर किराये के मकान में चलाये रखा स्कूल!

सिर्फ ईमारत न होने के कारण गाँव का ये एकमात्र स्कूल बंद न हो जाए इसलिए गांववालों ने मिलकर ये फैसला लिया।

मुंबई आकर भीख मांगने और गजरे बेचने को मजबूर किसानो के बच्चो को देश का पहला सिग्नल स्कूल दिखा रहा है जीने की नई राह !

मोहन उन हज़ारो किसानो के बच्चो में से एक है जो अपना गाँव, अपना खेत और अपना घर छोड़कर रोज़गार की तलाश में मुंबई आते है। पर यहाँ भी गरीबी और भुखमरी उनका साथ नहीं छोडती। ऐसे में शिक्षा के बारे में सोचना तक उन्हें दूर की बात लगती है। पर अब देश के पहले सिग्नल स्कूल के खुल जाने से मोहन जैसे कई बच्चो को अपने भविष्य को सुधारने का मौका मिल रहा है।

सरकारी स्कूल में पढाने के लिए रोज 8 किमी पहाड़ चढ़ते है यह शिक्षक!

विपरीत परिस्थितियों में पढ़ने का जज्बा तो आपने खूब देखा होगा, लेकिन पढाने का ऐसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है। पिछले सात साल और नौ महीनों से एक अध्यापक आठ किलोमीटर, पहाड चढ़कर बच्चों को पढाने जाते हैं। असलियत तो ये है कि उन्हीं के इस कठिन परिश्रम की वजह से यह प्राथमिक विद्यालय आज तक चल रहा है। सरकारी अकूल के इस अध्यापक की जज्बे भरी कहानी से देशभर के सरकारी अध्यापक सीख लें, तो देश के सरकारी स्कूल भी भविष्य की शिक्षित पीढियां पैदा कर सकते हैं।

इस गाँव के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, फिर एक दिन इन तीन लड़कियों ने सबकुछ बदल दिया!

ये कहानी उन तीन लड़कियों और उनके कभी न थकने वाले हौसले की हैं जिसने एक गाँव की शिक्षा व्यवस्था की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी। ये गाँव उत्तर प्रदेश में वाराणसी के नजदीक है। इन लड़कियों ने ताने भी सुने और अपमान भी सहा पर अपनी लड़ाई जारी रखी। उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि आज इस गाँव के ९०% बच्चे प्रतिदिन स्कूल जाते हैं।

१५ अक्टूबर को बच्चे बिना बैग के स्कूल जाकर मनाएंगे डॉ. कलाम का जन्मदिन !

महाराष्ट्र सरकार ने, स्वर्गीय डॉ. ए.पी.जे अब्दुल कलाम के जन्मदिन को मनाने का एक अनोखा तरीका अपनाया है। इस दिन बच्चो को बिना बैग के स्कूल जाने की छूट दी जाएगी तथा उन्हें पाठ्यक्रम से हटकर किताबे पढने का मौका दिया जायेगा।