इस दंपत्ति के प्रयासों से सड़को पर भीख मांगने वाले बच्चे आज विदेश में पढ़ रहे हैं!

चेन्नई के एक दंपत्ति, उमा एवं मुथूराम, द्वारा संचालित संस्था 'सुयम चेरीटेबल ट्रस्ट' एक एनजीओ है जो सड़कों और गलियों में रहने वाले गरीब परिवारों को पुनर्वासित करने में जुटी हुई हैं। इनके प्रयासों से गरीब और भीख माँगने वाले बच्चे भी विदेशों और प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। चेन्नई के एक दंपत्ति, उमा एवं मुथूराम, द्वारा संचालित संस्था 'सुयम चेरीटेबल ट्रस्ट' एक एनजीओ है जो सड़कों और गलियों में रहने वाले गरीब परिवारों को पुनर्वासित करने में जुटी हुई हैं। इनके प्रयासों से गरीब और भीख माँगने वाले बच्चे भी विदेशों और प्रतिष्ठित संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

इन पांच आसान तरीकों से देश में मिट सकती है निरक्षरता!

देश में साक्षरता बढ़ाने के तमाम प्रयासों के बाबजूद साक्षरता दर वैश्विक औसत की तुलना में लगातार गिर रही है। रेणु शर्मा ने इस समस्या के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करते हुए देश की साक्षरता दर में बढ़ोतरी के सुझाव दिए हैं, जिससे हम अपनी साक्षरता दर वैश्विक राज्यों की साक्षरता के स्तर पर पहुंचा सकें।

अपनी घरेलू सहायक के साथ मिलकर सैकड़ों गरीब बच्चों को पढ़ा रही है नोयडा की मीना निझवान!

हममें से शायद ही कोई होगा जो समाज को कुछ देने की ख्वाहिश न रखता हो। हम सब सामाजिक मदद करना चाहते हैं, लेकिन अक्सर अकेले होने की वजह से या कहाँ से शुरू करें इन सवालों से जूझते रहते हैं। और अपने रोजमर्रा की ज़िन्दगी में खो जाते हैं। ये कहानी आपके इन सवालों को रास्ता दिखाएगी।

‘तितलियां’ – युवाओं की एक पहल जो झुग्गी के बच्चों की बेरंग ज़िन्दगी में रंग भर रही है!

बच्चे, बचपन और उनके चेहरे की मुस्कान को बचाने के लिए रांची में युवाओं की एक टोली आगे आई है। तितलियां नाम की संस्था रांची के युवा बिजनसमैन अतुल गेरा ने स्थापित की है। इस संस्था से रांची के कई युवा जुड़े है जो गरीब बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए लगातार काम कर रहे है। मिलिए इन युवाओं की टोली से जो अपने जज्बे से रांची के झुग्गियों में रहने वाली बच्चियों की बेरंग जिंदगी में अपने जज्बे से रंग भर रहे है।

सरकारी स्कूल में पढाने के लिए रोज 8 किमी पहाड़ चढ़ते है यह शिक्षक!

विपरीत परिस्थितियों में पढ़ने का जज्बा तो आपने खूब देखा होगा, लेकिन पढाने का ऐसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है। पिछले सात साल और नौ महीनों से एक अध्यापक आठ किलोमीटर, पहाड चढ़कर बच्चों को पढाने जाते हैं। असलियत तो ये है कि उन्हीं के इस कठिन परिश्रम की वजह से यह प्राथमिक विद्यालय आज तक चल रहा है। सरकारी अकूल के इस अध्यापक की जज्बे भरी कहानी से देशभर के सरकारी अध्यापक सीख लें, तो देश के सरकारी स्कूल भी भविष्य की शिक्षित पीढियां पैदा कर सकते हैं।

विदेश में पढ़ रही दो भारतीय छात्राएं, मोबाइल फ़ोन के ज़रिये मुफ्त में सीखा रही है अंग्रेजी !

शिक्षा में एक छोटा सा बदलाव पीढियां बदल देता है। पर भारत में ज्यादातर अशिक्षित लोग आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ देते हैं और जाहिर है कि स्कूल छूटने के बाद पढ़ाई भी छूट जाती है। वही वक्त की मांग कुछ ऐसी है कि शहरों में रिक्शा चालक से लेकर छोटे-छोटे काम करने वालों तक अंग्रेजी बोलना और समझना सबके लिए जरुरी हो गया है। लेकिन इन्हें सिखाने का जिम्मा कौन उठाये? सिर्फ अंग्रेजी सीखने के लिए स्कूल वापस जाना इनके लिए संभव नहीं है और न ही कोचिंग क्लासेस की महँगी फीस देना। ऐसे में दो अंडरग्रेजुएट लडकियों की एक पहल, इनकी ज़िंदगी में रौशनी भर रहा है।

इस गाँव के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, फिर एक दिन इन तीन लड़कियों ने सबकुछ बदल दिया!

ये कहानी उन तीन लड़कियों और उनके कभी न थकने वाले हौसले की हैं जिसने एक गाँव की शिक्षा व्यवस्था की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी। ये गाँव उत्तर प्रदेश में वाराणसी के नजदीक है। इन लड़कियों ने ताने भी सुने और अपमान भी सहा पर अपनी लड़ाई जारी रखी। उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि आज इस गाँव के ९०% बच्चे प्रतिदिन स्कूल जाते हैं।

ATM की रौशनी में गरीब बच्चो को पढाता है ये सुरक्षाकर्मी !

माजरा, देहरादून के रहने वाले बिजेंदर एक ATM में सुरक्षाकर्मी के रूप में काम करते है। पर जैसे ही दिन ढलता है और सडको की बत्त्तियाँ जलती है तब बिजेंद्र जो करते है वो किसी को भी प्रोत्साहित करने के लिए काफी है।

भारत और जापान के कलाकार मिल कर सजा रहे है बिहार के इस गाँव के स्कूल की दीवारों को !

बिहार राज्य में स्थित सुजाता गाँव में हर साल निरंजना पब्लिक वेलफेयर स्कूल ‘वाल आर्ट फेस्टिवल’ का आयोजन करते है। भारत और जापान दोनों देशो के असंख्य कलाकार इस उत्सव में शामिल होने के लिये ३ हफ्ते इसी गाँव में आकर रहते है।

एक मसीहा जिसने केरल के मछुआरों को शराब से मुक्ति दिलाकर नया जीवनदान दिया !

एफ. एम्. लेजर ने देखा कि केरल के मछुआरों में गरीबी का मुख्य कारण शराब है। फिर क्या था, उन्होंने इसको बदलने की ठान ली। इसके साथ-साथ उन्होंने महिलाओं और वृद्धों को साक्षर बनने में भी मदद की। इतना ही नही उन्होंने विकलांगो के लिए एक तिपहिया भी बनाया है। दृढ निश्चय वाले इस इंसान की मेहनत अब रंग ला रही है और इसका असर पूरे राज्य में दिख रहा है।

परंपरा की बली चढ़ती लड़कियों की मदद कर रही है ‘संवेदना’!

मध्य प्रदेश का बेदिया समुदाय हर लड़की के जन्म पर उत्सव मनाता है –पर यहाँ वजह कुछ और ही है। एक संस्था- 'संवेदना' ने पहल की है और बीड़ा उठाया है इस समुदाय को शिक्षा एवं जीविका के दूसरे विकल्प प्रदान करने का। आईये देखे कैसे -