इस राखी में लगे बीज को बोयियें और जुड़े रहिये इन्हें बनाने वाले किसानो और बुनकरों से !

ग्राम आर्ट प्रोजेक्ट ने खास राखियाँ तैयार की हैं जो उन्हें बनाने वाले कामगरों की कहानी कहती हैं। पहली बार ग्राहक उन किसानो से जुड़ेंगे जिन्होंने इस राखी के लिए कपास उगाया है और उन बुनकरों को जानेगे जिन्होंने इसके धागे बुने है।

अपने काम के प्रति इन पुलिस कर्मियों के समर्पण को देखकर, आदर से आपका सर खुद-ब-खुद झुक जायेगा!

इस चिलचिलाती गर्मी में, जब सडकें तप रही है, जाम में फंसी गाड़ियां हॉर्न बजा रही हो और इनके बीच ही कई घंटों तक का काम करना हो, तो यकीनन यह किसी भी रूप में आसान नहीं कहलायेगा। पर ऐसी ही स्थिति से रोज़ जूझ रहे ट्रैफिक पुलिस वालों की तरफ हमारा ध्यान यदा कदा ही जाता है। और यदि खुद को उनकी जगह खड़ा करें तो हमे समझ भी आएगा कि यह कार्य वास्तव में प्रशंसनीय है। ऐसी ही प्रशंसा के काबिल वो पुलिसवाले भी हैं जो ड्यूटी पर हो या न हो.. अपना फ़र्ज़ निभाने से कभी पीछे नहीं हटते।

भीख मांगकर पाला बेसहारो को! हज़ारो की माई – सिंधुताई सपकाळ !

आज़ादी के महज़ १५ महीनो बाद, देश, चाचा नेहरू का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मना रहा था। इसी दिन यानी १४ नवंबर १९४८ को, पिंपरी मेघे, वर्धा गाँव के एक गरीब भैंस चराने वाले अभिमान साठे के घर एक बच्ची का जन्म हुआ। किसी को नहीं पता था कि बाल दिवस के दिन पैदा हुई ये लड़की एक दिन हज़ारो बच्चों की माई बन जायेगी।