नोट बंदी के बाद अपनी दरियादिली से लोगो का दिल जीत रहे ये लोग!

पुराने पांच सौ और हज़ार के नोट बंद हो जाने से जहाँ आम जनता को कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है वहीँ आम भारतियों के बीच संयम और सोहार्द की कहानियां भी सामने आ रही है। देश में काले धन के खिलाफ इस जंग में अपना पूरा योगदान करते ऐसे ही तीन कहानियां आज हम आपके सामने ला रहे है।

रांची में नेत्रहीन छात्राओं को स्कूल दे रहा कॉल सेंटर की ट्रेनिंग !

बृजकिशोर नेत्रहीन विद्यालय में छात्राओं को कॉल सेंटर में काम करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जल्द ही अब कॉल सेंटरों की बागडोर ये नेत्रहीन लड़कियां संभालेंगी। यह पूर्वी भारत का पहला और देश का दूसरा ऐसा नेत्रहीन बैच होगा जो कॉल सेंटर में आपकी मोबाइल सेवाओं संबंधी समस्याओं का समाधान करेगा।

‘तितलियां’ – युवाओं की एक पहल जो झुग्गी के बच्चों की बेरंग ज़िन्दगी में रंग भर रही है!

बच्चे, बचपन और उनके चेहरे की मुस्कान को बचाने के लिए रांची में युवाओं की एक टोली आगे आई है। तितलियां नाम की संस्था रांची के युवा बिजनसमैन अतुल गेरा ने स्थापित की है। इस संस्था से रांची के कई युवा जुड़े है जो गरीब बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए लगातार काम कर रहे है। मिलिए इन युवाओं की टोली से जो अपने जज्बे से रांची के झुग्गियों में रहने वाली बच्चियों की बेरंग जिंदगी में अपने जज्बे से रंग भर रहे है।

साठ बर्षो से जल, जंगल और जमीन बचाने की मुहीम चला रहा है झारखंड का ये वाटरमैन !

बीते 60 वर्ष से सिमोन की जिंदगी में कुछ भी नहीं बदला लेकिन हजारों गांव वालों की जिंदगी में बदलाव लाने का श्रेय इस शख्स को जाता है। 84 साल की उम्र में भी सिमोन ऊरांव सुबह साढ़े चार बजे उठकर खेत और जंगल की ओर निकल पड़ते है, कई तरह की मुसीबतों का सामना कर सिमोन ने अपने गांव के पास सालों पहले पौधारोपण किया था , जो आज जंगल का रूप ले चुके है और रोजाना सुबह उठकर वो इन पेड़ों और पौधो की एक झलक लेने निकल जाते है।

रांची के डॉ मुखर्जी जो पांच रुपये में करते हैं मरीजों का ईलाज !

महंगे ईलाज के इस युग में कुछ फरिश्ते अभी भी है, जो भगवान बनकर गरीबों के ईलाज के लिए तत्पर है। इनके लिए डॉक्टर की उपाधि भगवान का दिया एक तोहफा है जो जरूरतमंदों की भलाई करने के लिए है, ना कि सिर्फ और सिर्फ कमाई करने के लिए। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही चिकित्सकों में से एक है जिन्होनें अपने पेशे के साथ- साथ सामाजिक कर्तव्य को आज भी जिंदा रखा है।

स्वयं सहायता समूह से जुडी परहिया जनजाती की महिलाओं का जीवन बना खुशहाल !

सतबरवा की परहिया जनजाती की महिलाओं की जिंदगी में आ रहा है बदलाव! १० रुपये की साप्ताहिक बचत से महिलाओं के जीवन में खुशहाली लौटी है। आईए आपको ले चलते है सतबरवा के रब्दा गांव जहां इस आदिम जनजाती के करीब १५० लोग रहते है और बदहाली से खुशहाली की ओर आगे बढ़ रहे है।