विदेशी लेखकों, एक्टरों और राजनयिकों को आसान और मजेदार तरीकों से हिंदी सिखा रहीं पल्लवी सिंह

भाषा मानवीयता का पुल है, हमें जोड़ती है। वैश्वीकरण के इस दौर में हम दुनियां भर में आवास-प्रवास करते रहते हैं, हमारे देश में भी लाखों विदेशी आते हैं और उनकी मुहब्बत कहिए या कौतुहल कि उनमें से अधिकतर यहीं बस जाते हैं। ऐसे लोग हमेशा भाषा का अवरोध झेलते हुए देश में रहने के बाद भी अलग-थलग से नज़र आते हैं। इन्हें हमसे जोड़ने के लिए संवाद अनिवार्य है और संवाद के लिए समान भाषा जरूरी होती है।

मुंबई के 300 छात्रों ने 2 साल तक हर रविवार साथ मिलकर काम किया और इस गाँव में बना दिये 107 शौचालय।

मुंबई के किशिनचंद चेलारम महाविद्यालय के छात्रो ने सभी को प्रभावित करते हुये पलघर जिले के कारवाले गाँव में 107 शौचालय निर्मित किए हैं जिसमें गाँव में रह रहे हर परिवार के लिए एक शौचालय है।

मिलिए झारखंड के एक ऐसे व्यक्ति से जिसने जुहू तट पर अब तक 50 जानें बचाई है!

बंटी राव, जुहू तट पर तैनात एक स्वयंसेवक लाइफ गार्ड है जो किसी भी आपात की स्थिति में आपकी मदद को तैयार रहता है ।

डम्पिंग यार्ड से एक हरे-भरे पार्क के रूप में, माहिम नेचर पार्क का शानदार रूपान्तरण!

धारावी बस डीपो के पास स्थित माहिम नेचर पार्क कभी एक डम्पिंग यार्ड हुआ करता था, जहां पूरे मुंबई शहर से ला कर रोज़ सैकड़ो टन कचरा डाला जाता था। 1977 में प्रशासन द्वारा इसका उपयोग बंद कर दिये जाने पर तीन लोगों ने इसके स्वरूप को बदलने की ठानी और आज यह मुंबई शहर में प्रकृति प्रेमियो का पसंदीदा स्थान बन गया है।

मिलिए एक शिक्षक से जो अपनी सिमित आय में भी देखभाल कर रहे है कई बुजुर्गों और अनाथों की!

एक छोटी से छोटी कोशिश भी दुनियां को बेहतर बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल है। और हम सब मिलकर छोटी-छोटी कोशिश कर सकते हैं। आज की कहानी है ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश की।

मुंबई पुलिस के इस जांबाज़ हवलदार ने नंगे पाँव पहाड़ चढ़ कर बचाई एक शख्स की जान!

आत्महत्या करने का इरादा रखने वाले एक शख्स के पहाड़ पर चढ़ने की खबर जैसे ही मुंबई पुलिस को मिली तो वे घटनास्थल पर तुरंत पहुँच गए। स्थिति बेहद नाज़ुक थी पर हवलदार सुहास नेवसे की हिम्मत और सूझ बुझ से इस शख्स को बचा लिया गया।

कचरे से संगीत पैदा करते ‘धारावी रॉक्स बैंड’ के होनहार बच्चे!

कचरा बीनने वाले बच्चो का जीवन बेहद कठोर होता है। सारा दिन गंदगी में से कचरा बीनना, उन्हें अपने ही झोपड़े में लाकर चुनना और फिर जैसे तैसे अपना पेट भरना- बस यही उनका जीवन था। इन बच्चो का बचपन, उनकी गरीबी की बिमारी की वजह से दम तोड़ चुका था। विनोद सिर्फ इनके स्वास्थ्य और बाकी अधिकारों के लिए ही नहीं बल्कि इनके नीरस और कठोर जीवन में थोड़ी सी मिठास लाने के लिए भी कुछ करना चाहते थे। इसी सोच की नींव पर शुरुआत हुई, थिरकते, गुनगुनाते और गुदगुदाते संगीत से भरे बैंड, 'धारावी रॉक्स' की!

मुंबई आकर भीख मांगने और गजरे बेचने को मजबूर किसानो के बच्चो को देश का पहला सिग्नल स्कूल दिखा रहा है जीने की नई राह !

मोहन उन हज़ारो किसानो के बच्चो में से एक है जो अपना गाँव, अपना खेत और अपना घर छोड़कर रोज़गार की तलाश में मुंबई आते है। पर यहाँ भी गरीबी और भुखमरी उनका साथ नहीं छोडती। ऐसे में शिक्षा के बारे में सोचना तक उन्हें दूर की बात लगती है। पर अब देश के पहले सिग्नल स्कूल के खुल जाने से मोहन जैसे कई बच्चो को अपने भविष्य को सुधारने का मौका मिल रहा है।

गणपति की 5 ऐसी मूर्तियाँ, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाएंगी!

गणेश चतुर्थी आने वाली है और लोग गणपति की मूर्तियों की खरीदारी में जुट चुके हैं। ये मूर्तियाँ प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की बनी हुई होती हैं जो स्वाभाविक तरीके से पानी में घुलती नहीं हैं और इन्हें पेंट करने वाले रंग भी पर्यावरण को दूषित करते हैं। इन नुकसानों को ध्यान में रखते हुए कई लोग और संगठन इसका विकल्प ढूंढने में लगे हैं और कुछ इसमें सफल भी हुए हैं।

मुंबई के डब्बावाले अपने डिब्बे में खाने के साथ साथ पहुंचा रहे है अंगदान करने का सन्देश !

अपने सामाजिक सरोकारों के लिए अनूठी पहचान बना चुके मुंबई डब्बावालों की टीम अब आम लोगों को टिफिन के साथ-साथ अंग दान पर जागरुक भी कर रही है। अंग दान पर जागरुकता के अभाव में कई तरह के मिथक समाज में फैले है। इन मिथको को तोड़ने और आम आदमी को अंग दान से जोड़ने की श्रीमद राजचंद्रन अंगदान कार्यक्रम से जुड़कर मुंबई डब्बावाले समाज को आईना दिखाने का काम कर रहे है।

निःशुल्क टिफ़िन सेवा के बदले बुजुर्गों की दुआएं बटोर रहे है मुंबई के मार्क !

आई सी कॉलोनी, बोरीवली, मुंबई में रहने वाले, ४० वर्षीय मार्क डी’सूजा ने अपनी ख़ुशी उन वृद्धो की मुस्कान में खोज ली है जिन्हें वे पिछले तीन सालों से मुफ्त टिफ़िन सेवा दे रहे हैं। आइये जानते हैं मार्क का ये सफ़र।

अपने हाथों से ही प्लास्टिक मुक्त पर्यावरण बनाने में जुटे हैं ये वृद्ध दंपत्ति ।

सूरत के गौरंग और स्मिता देसाई, वीर सावरकर बाग में जगह-जगह फैले प्लास्टिक के कचरे को उठाकर कूड़ेदान में फेंकते हैं।

ईमानदारी का दूसरा नाम है मुंबई के टैक्सी ड्राईवर, गदाधर मंडल !

५३ वर्षीय गदाधर मंडल मुंबई में टैक्सी चलाते है और अपनी ईमानदारी की वजह से जाने जाते है। मोबाइल फ़ोन टैक्सी में भूलने वाले ग्राहकों को गदाधर ढूंडकर फ़ोन वापस करते है इसलिये उनकी एक अलग पहचान बन चुकी है। सन २००४ से लेकर २०१४ तक उन्होंने तक़रीबन १४ मोबाइल ग्राहकों को लौटाये है।

मिलिए अक्षय कुमार को गौरवान्वित करने वाली 19 साल की श्रेया नाइक से !

अक्षय कुमार के इंस्टिट्यूट की छात्रा ने छेड़खानी करने का प्रयास करने वाले गुंडे से अकेले ही न सिर्फ लोहा ले लिया बल्कि उसे अपने सामने गिडगिडाने पर भी मजबूर कर दिया।

एक इंजिनियर जिसने टैक्सी ड्राईवर बनकर लोगो को जीवन दान दिया !

पेशे से मैकेनिकल इंजिनियर, विजय ठाकुर ने अपना पहला बच्चा महज इसलिए खो दिया क्यूंकि रात के समय कोई टैक्सी वाला उन्हें अस्पताल तक ले जाने के लिए तैयार नहीं था। वे चाहते थे कि जो हादसा उनके साथ हुआ, वो किसी और के साथ न हो और इसलिए वे अपनी नौकरी छोड़कर टैक्सी ड्राईवर बन गए।