कैंसर ने दृष्टि छीनी, पर आईएएस बनने के सपने की ओर बढ़ रही हैं नागपुर की भक्ति घटोळे!

नागपुर की भक्ति घटोळे की नौ साल की उम्र में ही कैंसर ने दृष्टि छीन लीं, लेकिन फिर भी उनके सपने और जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया और आज भक्ति सफलता के स्तम्भ स्थापित करते हुए अपने आइएएस बनने के सपने की ओर बढ़ रही हैं।

मुंबई के 300 छात्रों ने 2 साल तक हर रविवार साथ मिलकर काम किया और इस गाँव में बना दिये 107 शौचालय।

मुंबई के किशिनचंद चेलारम महाविद्यालय के छात्रो ने सभी को प्रभावित करते हुये पलघर जिले के कारवाले गाँव में 107 शौचालय निर्मित किए हैं जिसमें गाँव में रह रहे हर परिवार के लिए एक शौचालय है।

कौन बनेगा करोड़पति के एक एपिसोड को देख कर मिली प्रेरणा; अब कर रहे है हज़ारो किसानों की मदद!

कौन बनेगा करोड़पति शो में आयी एक प्रतिभागी की संघर्ष की कहानी सुनी तो अभिजीत फाल्के ने विदर्भ के किसानो की मदद करने की ठानी। उन्हे कार्यशालाओं के माध्यम से न सिर्फ जैविक खेती के आधुनिक तरीके सिखाये, साथ ही बिचौलियों को समाप्त कर उन्हे सीधा ग्राहकों से जोड़ा, उनका खोया आत्मविश्वास लौटाया और आज ये किसान विदेशों में भी अपना उत्पाद बेच रहे हैं।

अपने बेटे की मृत्यु के बाद, पुणे की इस महिला ने अपने दिल और घर के दरवाजे जख्मी पशुओं के लिए खोल दिए!

पद्मिनी स्टम्प और डॉ रवींद्र कासबेकर—पुणे के रहने वाले ये दोनों पशु-प्रेमी मानवता के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इनकी पहल, "मिशन पॉसिबल" एक ट्रस्ट हैं जो बेघर जानवरों को बचाता है और उनका इलाज और देखरेख भी करता है। उनका लक्ष्य है कि विदेशी पालतुओं की बजाय इन आवारा पशुओं पर ज्यादा ध्यान दिया जायें और उन्हें एक प्यारा घर मिले।

एक और महावीर और गीता – मिलिए कुश्ती में लडको को पछाड़ने वाली महिमा राठोड से!

हाल ही में रिलीज़ हुई दंगल फिल्म को देखकर हम सभी भावुक हुए, पर 16 साल की महिमा जब ये फिल्म अपने पिता के साथ देखने गयी तो उसके आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। कारण था फिल्म में दिखाए महावीर सिंह फोगाट का अपनी बेटियों के लिए किया गया संघर्ष जो की हु-ब-हु महिमा के पिता राजू राठोड की कहानी से मिलती जुलती है।

पुणे के प्रकाश केलकर, किसानो और सैनिकों को दे रहे है अपने जीवन भर की पूँजी!

भारत में अधिकतर लोगो को बचत करने की आदत है। जहाँ इस बचत का एक हिस्सा बच्चो की पढाई, शादी और अन्य खर्चो के लिए रखा जाता है, वहीँ इसका एक बड़ा हिस्सा हम अपने बुढापे के लिए संभाले रखते है। पुणे के रहने वाले 73 वर्षीय प्रकाश केलकर ने भी अपनी सारी उम्र यहीं किया।लेकिन अब उन्होंने अपनी सारी कमाई जवानों, किसानों और कुछ एनजीओ को देने का फैसला किया है।

बानू शेख सफी : एक कचरा बिनने वाली से एक कामयाब नर्स बनने का सफ़र!

एक कचरा बिनने वाली से एक कामयाब नर्स बनने का सफ़र बानू शेख सफी के लिए इतना आसान नहीं था। महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के रविदास नगर की रहने वाली बानू जब सिर्फ तीन साल की थी तब उनके पिता का देहांत हो गया। जिस उम्र में बच्चे अपने जीवन का पहला पाठ पढ़ते है, उस उम्र में बानू को जिंदगी को कई सबक एक साथ सिखा दिए। नन्ही सी बानू को अपने परिवार का पेट पालने के लिए अपनी माँ और डेढ़ साल की छोटी बहन, शमा के साथ कचरा बीनने का काम शुरू करना पड़ा।

मुंबई आकर भीख मांगने और गजरे बेचने को मजबूर किसानो के बच्चो को देश का पहला सिग्नल स्कूल दिखा रहा है जीने की नई राह !

मोहन उन हज़ारो किसानो के बच्चो में से एक है जो अपना गाँव, अपना खेत और अपना घर छोड़कर रोज़गार की तलाश में मुंबई आते है। पर यहाँ भी गरीबी और भुखमरी उनका साथ नहीं छोडती। ऐसे में शिक्षा के बारे में सोचना तक उन्हें दूर की बात लगती है। पर अब देश के पहले सिग्नल स्कूल के खुल जाने से मोहन जैसे कई बच्चो को अपने भविष्य को सुधारने का मौका मिल रहा है।

भारत की पहली महिला नाई, शांताबाई की अद्भुत कहानी!

अपने स्वर्गीय पति का व्यवसाय आगे चलाकर शांताबाई ने अपने परिवार को सहारा दिया।पुरुष-प्रधान समाज में सिर्फ पुरुषो द्वारा ही चलाये जानेवाले व्यवसाय को अपनाकर, वो भारत की पहली महिला नाई बनी।

स्कूल बैग के बोझ से परेशान दो छात्रों ने प्रेस कांफ्रेस में बतायी अपनी तकलीफ।

विद्या निकेतन स्कूल के 12 वर्षीय दो छात्रों ने भारी बस्ते से होने वाली परेशानी को बताने के लिए संवाददाता सम्मेलन करने की इच्छा जाहिर की।

समाज को बेहतर बनाने के लिए ‘उद्देश सोशल फाउंडेशन’ के युवा करा रहे हैं लोगों से लोगों की मदद!

उमरखेड गाँव के युवकों ने उद्देश सोशल फाउंडेशन की स्थापना करके समाज का कल्याण और गरीबो की मदद करने का जिताजागता उदाहरण दिया है। आईये जानते है इस संस्था और आयोजित विभिन्न कार्यक्रम के बारे में।

मुंबई के डब्बावाले अपने डिब्बे में खाने के साथ साथ पहुंचा रहे है अंगदान करने का सन्देश !

अपने सामाजिक सरोकारों के लिए अनूठी पहचान बना चुके मुंबई डब्बावालों की टीम अब आम लोगों को टिफिन के साथ-साथ अंग दान पर जागरुक भी कर रही है। अंग दान पर जागरुकता के अभाव में कई तरह के मिथक समाज में फैले है। इन मिथको को तोड़ने और आम आदमी को अंग दान से जोड़ने की श्रीमद राजचंद्रन अंगदान कार्यक्रम से जुड़कर मुंबई डब्बावाले समाज को आईना दिखाने का काम कर रहे है।

ज़ंजीर: एक बहादुर कुत्ता, जिसने 1993 मुंबई बम धमाकों में हजारों लोगों की जान बचाई !

बम निरोधक दस्ते के साथ काम करते हुए 'जंजीर' ने लगभग 3329 किलोग्राम से ज्यादा आरडीएक्स विस्फोटक, 600 डेटोनेटर, 249 हैण्ड ग्रेनेड और 6000 राउण्ड्स से ज्यादा कारतूस ढूँढ निकाला। जंजीर की बहादुरी के कारण ही मुंबई में सीरियल बम धमाकों में से तीन बम धमाके टल गए और अनगिनत लोगों की जान बच गई।

अपने काम के प्रति इन पुलिस कर्मियों के समर्पण को देखकर, आदर से आपका सर खुद-ब-खुद झुक जायेगा!

इस चिलचिलाती गर्मी में, जब सडकें तप रही है, जाम में फंसी गाड़ियां हॉर्न बजा रही हो और इनके बीच ही कई घंटों तक का काम करना हो, तो यकीनन यह किसी भी रूप में आसान नहीं कहलायेगा। पर ऐसी ही स्थिति से रोज़ जूझ रहे ट्रैफिक पुलिस वालों की तरफ हमारा ध्यान यदा कदा ही जाता है। और यदि खुद को उनकी जगह खड़ा करें तो हमे समझ भी आएगा कि यह कार्य वास्तव में प्रशंसनीय है। ऐसी ही प्रशंसा के काबिल वो पुलिसवाले भी हैं जो ड्यूटी पर हो या न हो.. अपना फ़र्ज़ निभाने से कभी पीछे नहीं हटते।

महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े हुए गाँव को अपना जीवन समर्पित कर विकसित किया इस डॉक्टर दम्पति ने !

डॉ. रविन्द्र कोल्हे और डॉ. स्मिता कोल्हे ने मेलघाट के वासियों की ज़िन्दगी बदल दी है। उन्होंने उस इलाके की स्वास्थ्य सुविधाओं को एक नया आयाम दिया है और लोगों को बिजली, सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध कराये हैं। आईये जाने उनके इस अद्भुत सफ़र की कहानी।