मिलिए एक शिक्षक से जो अपनी सिमित आय में भी देखभाल कर रहे है कई बुजुर्गों और अनाथों की!

एक छोटी से छोटी कोशिश भी दुनियां को बेहतर बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण पहल है। और हम सब मिलकर छोटी-छोटी कोशिश कर सकते हैं। आज की कहानी है ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश की।

उंगलियाँ गंवाने पर भी नहीं छोडा मोची का काम; साहस और स्वाभिमान की मिसाल है दिल्ली के दिनेश दास!

दिनेश पेशे से मोची है और दिल्ली के द्वारका इलाके के एक सड़क के किनारे बैठकर पिछले बीस सालो से अपना काम करते आ रहे है। चाहे होली हो या दिवाली, चाहे ईद हो या क्रिसमस, सड़क के इसी धुल भरे किनारे पर दिनेश आपको धुप, बारिश, सर्दी या गर्मी में अपना काम करते नज़र आ जायेंगे। पर जो नज़र नहीं आएँगी वो है उनकी उँगलियाँ।

पुणे के प्रकाश केलकर, किसानो और सैनिकों को दे रहे है अपने जीवन भर की पूँजी!

भारत में अधिकतर लोगो को बचत करने की आदत है। जहाँ इस बचत का एक हिस्सा बच्चो की पढाई, शादी और अन्य खर्चो के लिए रखा जाता है, वहीँ इसका एक बड़ा हिस्सा हम अपने बुढापे के लिए संभाले रखते है। पुणे के रहने वाले 73 वर्षीय प्रकाश केलकर ने भी अपनी सारी उम्र यहीं किया।लेकिन अब उन्होंने अपनी सारी कमाई जवानों, किसानों और कुछ एनजीओ को देने का फैसला किया है।

एक डॉक्टर, जिन्होंने अपने गाँव में 11 डैम बनवाकर किया सूखे का इलाज!

डॉ अनिल जोशी ने अपने मरीजों की मदद करने का बीड़ा उठाया और एक आयुर्वेदिक डॉक्टर से जल सरंक्षणवादी बन गए।

BITS पिलानी के इस छात्र ने अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा वृद्धाश्रम को दान कर, की एक खूबसूरत बदलाव की पहल!

आज की पीढ़ी इन परंपराओं को बनाये रखने के साथ साथ इनमे कुछ ऐसे बदलाव भी कर रही है जिससे समाज का भला हो। BITS, पिलानी में पढ़ रहे नमन मुनॉट ने भी ऐसे ही एक बदलाव की पहल की है। उन्होंने अपनी पहली तनख्वाह का 20 फीसदी हिस्सा वृद्धाश्रम को दान में दे दिया।

बिना हाथों के इस युवक ने तैराकी में जीते तीन स्वर्ण पदक!

हौसले की उड़ान बिना परों के होती है। बेशक़ तिनके का भी सहारा न हों जूनून उफनते पानी को पार कर ही जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी है हमारे आज के नायक, विश्वास की। जिनका खुद में विश्वास उन्हें लाख मुश्किलों के बीच से निकाल कर आज दुनियां के शिखर पर ले आया है।

येरवडा जेल के किशोर अपराधियों को जीना सिखा रही हैं 21 वर्षीय नीतिका !

पुणे में एक छात्रों का समूह येरवडा जेल के किशोर अपराधियों के सुधार और कल्याण के लिए काम कर रहा है। इन बच्चों की काउंसलिंग से लेकर आत्मविशवास बढाने की गतिविधियों से इन्हें बाहरी दुनियां का सामना करने की ताक़त मिल रही है।

एक युवा का फेसबुक पेज कैसे हजारो बच्चो के चेहरे पर मुस्कान बिखरे रहा है!

सड़क पर जन्म लेने वाले और अपनी सारी जिन्दगी इन्ही सडको के किनारे बिता देने वाले अनाथ और बेसहारा बच्चो को कई बार अपने माता पता तक का पता नहीं होता तो अपने जन्मदिन दिन का पता होना तो बहुत दूर की बात है। पर एक शख्स ने, जन्मदिन का पता न होने पर भी इन बच्चो का जन्मदिन मनाने का एक बेहतरीन तरीका ढूंड निकाला है।

दृष्टिहीनों की ज़िंदगी में रौशनी के लिए किसान ने अपने गाँव में खोला ब्लाइंड स्कूल!

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ के एक छोटे से गाँव में एक किसान ने 30 दृष्टिहीन बच्चों की जिंदगीयों में रौशनी भर दी है। दृष्टिबाधित बच्चों का आवासीय स्कूल बनाकर वे उनको शिक्षा दे रहे हैं।

सरकारी स्कूल में पढाने के लिए रोज 8 किमी पहाड़ चढ़ते है यह शिक्षक!

विपरीत परिस्थितियों में पढ़ने का जज्बा तो आपने खूब देखा होगा, लेकिन पढाने का ऐसा जज्बा कम ही देखने को मिलता है। पिछले सात साल और नौ महीनों से एक अध्यापक आठ किलोमीटर, पहाड चढ़कर बच्चों को पढाने जाते हैं। असलियत तो ये है कि उन्हीं के इस कठिन परिश्रम की वजह से यह प्राथमिक विद्यालय आज तक चल रहा है। सरकारी अकूल के इस अध्यापक की जज्बे भरी कहानी से देशभर के सरकारी अध्यापक सीख लें, तो देश के सरकारी स्कूल भी भविष्य की शिक्षित पीढियां पैदा कर सकते हैं।

ईमानदारी का दूसरा नाम है मुंबई के टैक्सी ड्राईवर, गदाधर मंडल !

५३ वर्षीय गदाधर मंडल मुंबई में टैक्सी चलाते है और अपनी ईमानदारी की वजह से जाने जाते है। मोबाइल फ़ोन टैक्सी में भूलने वाले ग्राहकों को गदाधर ढूंडकर फ़ोन वापस करते है इसलिये उनकी एक अलग पहचान बन चुकी है। सन २००४ से लेकर २०१४ तक उन्होंने तक़रीबन १४ मोबाइल ग्राहकों को लौटाये है।

अपने काम के प्रति इन पुलिस कर्मियों के समर्पण को देखकर, आदर से आपका सर खुद-ब-खुद झुक जायेगा!

इस चिलचिलाती गर्मी में, जब सडकें तप रही है, जाम में फंसी गाड़ियां हॉर्न बजा रही हो और इनके बीच ही कई घंटों तक का काम करना हो, तो यकीनन यह किसी भी रूप में आसान नहीं कहलायेगा। पर ऐसी ही स्थिति से रोज़ जूझ रहे ट्रैफिक पुलिस वालों की तरफ हमारा ध्यान यदा कदा ही जाता है। और यदि खुद को उनकी जगह खड़ा करें तो हमे समझ भी आएगा कि यह कार्य वास्तव में प्रशंसनीय है। ऐसी ही प्रशंसा के काबिल वो पुलिसवाले भी हैं जो ड्यूटी पर हो या न हो.. अपना फ़र्ज़ निभाने से कभी पीछे नहीं हटते।

अपनी आधी तनख्वाह गरीब छात्रों की किताबो में खर्च कर देता है यह कोलकाता का यह शिक्षक !

हावड़ा के सरकारी स्कूल में टीचर ध्रुबज्योति सेन अपनी तनख्वाह के आधे पैसे से ऐसे बच्चों को पढ़ने में मदद करते है। ध्रुबज्योति गणित पढ़ाते हैं और ऐसे बच्चों के लिए आज हरदम तैयार खड़े हैं। दसवीं पास कर चुके ऐसे छात्र जो विज्ञान में रुचि रखते हैं, उन्हें ध्रुबज्योति निशुल्क पढ़ाते हैं।

नीरजा भनोट की अनोखी  कहानी –एक विमान परिचारिका जिसने ३६० जानें बचाई।

सितम्बर १९८६ में आतंकवादियों ने कराची में एक हवाई जहाज का अफहरण कर लिया। इस विमान की मुख्य परिचारिका, नीरजा भनोट ने अपने अदम्य साहस से ३६० यात्रियों की जान बचाई और तीन बच्चो को बचाते हुए स्वयं शहीद हो गयी। इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से नवाज़ा गया। आईये जाने नीरजा की कहानी!

सेवानिवृत होने के बाद भी निहार जैसे सैनिक करते है देश सेवा

महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर, चंद्रपुर में रहते हुए भी एक सेवानिवृत्त सैनिक देश की सेवा का अपना धर्म निभाता चला जा रहा है। और इस महान कार्य में उनकी पत्नी कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दे रही है। छोटे छोटे बदलाव से भारत को बेहतर भारत बनाने वाले निहार और सपना हलदर से मिले।