लोगों की छतें रंगकर औऱ जमीन में संगमरमर तराशकर अपना घर संवार रही हैं राधा और सविता!

किसी निर्माणाधीन इमारत के बनने की कल्पना कीजिए। आपकी कल्पना में ठेकेदार से लेकर मजदूर, बढ़ई, पेन्टर, सब पुरूष ही होंगे। हकीकत भी इस कल्पना के करीब ही है। ऐसी जगहों पर महिलाएं काम करती भी हैं तो वो मजदूरी का ही काम करती हैं। इसके लिए उन्हें पैसे भी नाम मात्र के ही मिलते हैं। जबकि, अगर इन्हें मौका मिले तो अपने कौशल से न सिर्फ अपनेआप को पुरूषों से बेहतर सिद्ध कर सकती हैं, बल्कि सारे काम बिना किसी पुरूष सहयोगी के निबटा सकती हैं।