रामधारी सिंह दिनकर की कविता – ‘समर शेष है’ !

आज रामधारी सिंह दिनकर के जन्मदिन पर हम आपके लिए उनकी एक ऐसी कविता लाये है जो उन्होंने आजादी के ठीक सात वर्ष बाद लिखी थी। आज़ादी को 69 साल बीत गए। पर दिनकर की ये कविता मानो आज ही की लिखी हुई तस्वीर ज्ञात होती है। कविता का नाम है - 'समर शेष है'।

पुस्तक समीक्षा : केदारनाथ सिंह की कविता संग्रह ‘अकाल में सारस’!

‘अकाल में सारस’ ऐसी ही कविताओं का संग्रह है, जिसमे 1983-87 के मध्य रची गयी कवितायेँ संकलित हैं। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत यह संकलन कविता को भाषा और भाव दोनों ही स्तर पर ‘भारत’ की जमीन पर खड़ा करता है। ये कविताएँ पाठक के साथ संवाद करती हैं और कविता और मनुष्य के बीच के शाश्वत सम्बन्ध को व्यक्त करती हैं।

बेटियों को समर्पित प्रसून जोशी की नयी कविता, जो आपसे पूछ रही है, “शर्म आ रही है ना?”

बरसो तक लड़-लड़ के एक-एक करके हमारी बेटियों ने सभी क्षेत्रो में अपना परचम फैराया है, फिर चाहे वो कला हो, राजनीति हो या खेल। हाल ही में हुए रिओ ओलिंपिक में देश का नाम रौशन करने वाली साक्षी मलिक, पी.वी. सिन्धु और दीपा करमाकर जैसी खिलाड़ी इस बात की जिंदा मिसाल है। इन्ही को और इनके ही जैसी देश की हर बेटी को समर्पित है प्रसून जोशी की नयी कविता, जिसे पढ़कर आप अपने आप से, अपने समाज से एक बार ज़रूर पूछेंगे,"शर्म आ रही है ना ?"

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है – राम प्रसाद बिस्मिल !

बिस्मिल की यह गज़ल सभी क्रान्तिकारी जेल से पुलिस की गाडी में अदालत जाते हुए, अदालत में मजिस्ट्रेट को चिढ़ाते हुए और अदालत से लौटकर वापस जेल आते हुए एक साथ गाया करते थे। बिस्मिल की शहादत के बाद उनका ये गीत क्रान्तिकारियों के लिए मन्त्र बन गयी थी। न जाने कितने क्रांतिकारी इसे गाते हुए हँसते हँसते फांसी पर चढ़ गए थे।

किसान : मैथिलीशरण गुप्त !

बाहर निकलना मौत है, आधी अँधेरी रात है, है शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है. तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते, यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते